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थार रेगिस्तान जैसी तपन… क्यों देश की सबसे गर्म ‘भट्टी’ बनता जा रहा है बांदा?

बांदा और पूरे बुंदेलखंड की एक पुरानी और बुनियादी समस्या पानी की कमी रही है। लेकिन पानी की यह कमी सिर्फ प्यास या खेती तक सीमित नहीं है, इसका सीधा संबंध बढ़ते तापमान से है…

उत्तर प्रदेश का बांदा (Banda) शहर अब सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि देश और दुनिया के नक्शे पर भीषणतम गर्मी का एक ऐसा ‘हॉटस्पॉट’ बन चुका है, जहां का पारा आए दिन 48 डिग्री के आंकड़े को लांघ रहा है। मई-जून के महीनों में दोपहर होते ही यहाँ की सड़कों पर ऐसा सन्नाटा पसर जाता है, मानो अघोषित कर्फ्यू लग गया हो। बिजली के ट्रांसफार्मरों को फटने से बचाने के लिए उन पर पानी की बौछारें मारनी पड़ रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि बांदा अचानक इस कदर क्यों तप उठा? क्या यह सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग है, या इसके पीछे कोई गहरी इंसानी साजिश और प्रशासनिक लापरवाही छिपी है?

तंदूर की तरह आग उगलती तारकोल की सड़कों ने बांदा के अनियोजित विकास और चरमराते इको सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। स्थिति यह है कि सुबह 9 बजे के बाद अगर कोई बहुत जरूरी काम न हो, तो आम लोग घरों से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ती मई की इस आग बरसाती गर्मी से न सिर्फ इंसान, बल्कि घरेलू पशुओं और वन्यजीवों तक पर आफत आ गई है। आखिर बांदा में थार रेगिस्तान जैसी तपन के पीछे की क्या वजहें हैं। क्यों यहाँ इतनी भीषण गर्मी पड़ रही, इसकी परतों में जाएं तो कई वजहें सामने नजर आती हैं।

गायब होते जंगल और ‘हीट आइलैंड’ बनता बांदा

बांदा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता अर्जुन पी. वर्मा द्वारा सह-लेखित एक हालिया अध्ययन में 1991-92 से 2021-22 के बीच के तीन दशकों के आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक इस अध्ययन में चौंकाने वाला सच सामने आया कि बांदा ने अपने घने जंगलों का लगभग छठा हिस्सा खो दिया है और खुले जंगलों में भी इसी तरह की भारी गिरावट दर्ज की गई है।

शोधकर्ता वर्मा कहते हैं, “इसके पीछे बड़े पैमाने पर खनन और जंगल की जमीन पर खेती का अतिक्रमण मुख्य वजह है।” वे अपना निजी अनुभव साझा करते हुए इस गर्मी की भयावहता का कुछ यूं बयां करते हैं- “अब मैं खुद सुबह 9:30 बजे के बाद फील्ड में रिसर्च के लिए नहीं जा पाता। शाम तक दफ्तर के अंदर ही बंद रहना पड़ता है।”

चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो अगले दो दशकों में बांदा के कई हिस्से पूरी तरह बंजर हो सकते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक, साल 2005 से अब तक जिले का कुल वन क्षेत्र लगभग 120 वर्ग किलोमीटर से घटकर महज 95 वर्ग किलोमीटर रह गया है, यानी घने जंगलों में 17.55 प्रतिशत की सीधी कमी दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर ध्रुव सेन सिंह इस स्थिति को वैज्ञानिक रूप से समझाते हुए कहते हैं- “हरियाली खत्म होने, नमी कम होने, जल स्रोतों के सूखने और रेत के फैलाव ने बांदा को एक ‘हीट आइलैंड’ बना दिया है। दिनभर जमीन तवे की तरह तपती रहती है और रात में जब तक यह ठंडी होने की प्रक्रिया में होती है, उससे पहले अगली सुबह फिर तेज धूप शुरू हो जाती है। यही वजह है कि यहाँ के लोगों को रात में भी कोई राहत नहीं मिलती।”

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पानी की कमी और ‘कुदरती कूलिंग सिस्टम’ का फेल होना

बांदा और पूरे बुंदेलखंड की एक पुरानी और बुनियादी समस्या पानी की कमी रही है। लेकिन पानी की यह कमी सिर्फ प्यास या खेती तक सीमित नहीं है, इसका सीधा संबंध बढ़ते तापमान से है। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है, जिसे वाष्पीकरण कहते हैं।

सामान्य परिस्थितियों में जब जमीन, पौधों और तालाबों-नदियों जैसे जलस्रोतों में पर्याप्त पानी होता है, तो सूरज की गर्मी का एक बड़ा हिस्सा उस पानी को भाप (वाष्प) में बदलने में खर्च होता है। इससे आसपास का तापमान नियंत्रित रहता है, यह प्रकृति का अपना ‘इन-बिल्ट’ एयर कंडीशनर है। लेकिन बांदा में कम बारिश, भूजल पर अत्यधिक दबाव और सतही जलस्रोतों की कमजोरी के कारण तालाब सूख चुके हैं और खेतों की मिट्टी सूखी है। जब मिट्टी में नमी ही नहीं बचती, तो यह प्राकृतिक ठंडक पूरी तरह गायब हो जाती है। सूखी मिट्टी सूरज की गर्मी को बहुत जल्दी पकड़ती है, दिनभर तवे की तरह तपती है और रात भर उस गर्मी को हवा में छोड़ती रहती है।

पहाड़ों का ‘पाताल तोड़’ दोहन और नष्ट होती जल प्रणाली

बांदा को इस मानवीय त्रासदी के मुहाने पर खड़ा करने में सबसे बड़ा हाथ अनियंत्रित और अवैध खनन का है। बुंदेलखंड के जल-अधिकार कार्यकर्ता और पर्यावरणविद आशीष सागर लंबे समय से केन नदी को बचाने के लिए अपने संगठन ‘प्रवास’ के जरिए जमीनी संघर्ष कर रहे हैं। इसके साथ ही ‘बुंदेलखंड जल मंच’ और देश के कई मशहूर पर्यावरणविदों ने भी बांदा के इस ‘मैन-मेड संकट’ पर लगातार गहरी चिंता जताई है। आशीष सागर साफ शब्दों में कहते हैं कि, “बांदा के पारिस्थितिकी तंत्र को खनन माफियाओं ने पूरी तरह से रौंद डाला है। जिले में ग्रेनाइट और लाल मौरम खनन की खदानों से पूरा ईको सिस्टम ध्वस्त है। बांदा और आसपास के क्षेत्र की 25 फीसदी पहाड़ियां पाताल तोड़ खनन के कारण दफन हो चुकी हैं।”

Tweet by Ashish Sagar Dixit in Hindi referring to Uttar Pradesh conditions, mentioning districts and dates (17–19 May) and numbers (46, 47, 48), with claims about meteorological teams issuing alerts.

बांदा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के मौसम विज्ञान विभाग के प्रमुख दिनेश साहा के मुताबिक, “खनन गतिविधियों ने नदियों को तेजी से सुखाया है, जिससे भूजल रिचार्ज कम हुआ है। जंगल कटने से मिट्टी की नमी घट गई है, जबकि स्टोन क्रशर यूनिट्स की उड़ने वाली धूल ने मिट्टी और वनस्पति दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ये सभी कारक मिलकर गर्मी को और भयावह बना रहे हैं।”

यह विनाश विंध्य पर्वतमाला की पहाड़ियों पर साफ दिखाई देता है। बबेरू के गौरी खानपुर गांव के किसान और सामाजिक कार्यकर्ता बंद गोपाल का कहना है कि विंध्य की करीब 25 प्रतिशत पहाड़ियां या तो पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि इन पहाड़ियों में मौजूद बलुआ पत्थर बारिश का पानी सोखकर स्पंज की तरह धीरे-धीरे भूजल स्तर को रिचार्ज करता था। लेकिन लगातार होने वाली हैवी ब्लास्टिंग और खनन ने इस प्राकृतिक वाटर-रिचार्ज प्रणाली को लगभग नष्ट कर दिया है।

नदियों का बदला चेहरा और दिन-रात होते खनन

पहाड़ों की तरह बांदा की नदियां भी सबसे बड़े पर्यावरणीय दोहन का शिकार हुई हैं। केन नदी, जो बांदा जिले में करीब 100 किलोमीटर का सफर तय करती है, वहां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सख्त दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाकर भारी मशीनें नदी के भीतर उतारकर बालू खनन कर रही हैं।

स्थानीय पत्रकार और कार्यकर्ता रामलाल जयन के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, केवल अकेले केन नदी से हर दिन लगभग 55 हजार टन लाल बालू निकाली जा रही है। अब यह अंधाधुंध खनन रंज, बगई, यमुना, मंदाकिनी और बाघिन जैसी छोटी नदियों तक फैल चुका है, जहां ग्रामीणों के मुताबिक जलस्तर भयानक तेजी से गिर रहा है।

सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता उमा शंकर पांडे इस तबाही को रेखांकित करते हुए कहते हैं- “अत्यधिक और अवैध खनन ने नदी की उस प्राकृतिक बालू को ही खत्म कर दिया, जो पानी को रोककर रखने और भूजल को रिचार्ज करने में मदद करती थी। अब नदियों के नीचे सिर्फ एक सूखी, चट्टानी सतह बची है, जिससे बारिश का पानी ठहरने के बजाय तेजी से बह जाता है और जमीन के अंदर समा नहीं पाता।”

Active mining site with red soil, many dump trucks lined up and excavators working around piles of earth and water pools forming a quarry interior.
बांदा में खनन की एक तस्वीर इमेजः एक्सआशीष सागर दीक्षित

क्या है समाधान?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका समाधान क्या है। मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित और ‘जल पुरुष’ के नाम से प्रसिद्ध राजेन्द्र सिंह और बुंदेलखंड जल मंच के कार्यकर्ताओं का मानना है कि बांदा को बचाने का एकमात्र तरीका पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना है। बुंदेलखंड में चंदेल और बुंदेला राजाओं के समय बनाए गए ऐतिहासिक तालाबों और कुओं को गहरा किया जाए ताकि वे मानसून के पानी को रोक सकें। जब जमीन में पानी ठहरेगा, तो ‘वाष्पीकरण’ की प्राकृतिक प्रक्रिया दोबारा शुरू होगी और शहर का तापमान 2 से 3 डिग्री तक तुरंत गिर जाएगा।

वहीं, विशेषज्ञों की मानें तो बांदा को ‘हीट आइलैंड’ बनने से रोकने के लिए सबसे पहले अवैध और अंधाधुंध रेत खनन पर सख्ती से रोक लगानी होगी। दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल्स (SANDRP) ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि केन नदी में मशीनों से हो रहा अत्यधिक खनन नदी की प्राकृतिक जलधारण क्षमता खत्म कर रहा है और भूजल रिचार्ज को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

संगठन ने नदी के भीतर मशीनों से खनन पर पूर्ण प्रतिबंध, नदी तटों पर हरित क्षेत्र विकसित करने और पोस्ट-माइनिंग पर्यावरणीय पुनर्स्थापन को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की है। खनन केवल पारंपरिक और सीमित तरीके से हो, ताकि नदी की निचली चट्टानी सतह उजागर न हो और रेत का स्पंज बना रहे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नदी के बहाव क्षेत्र के भीतर खनन पट्टे ही नहीं दिए जाने चाहिए, क्योंकि इससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह और जलचक्र दोनों प्रभावित होते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बांदा जैसे तेजी से गर्म होते इलाकों में मियावाकी पद्धति के जरिए छोटे लेकिन घने शहरी जंगल विकसित करना एक प्रभावी उपाय हो सकता है। इस तकनीक में कम जगह में नीम, पीपल, बरगद और महुआ जैसे स्वदेशी पौधों को घनी मात्रा में लगाया जाता है। इससे तेजी से हरित क्षेत्र विकसित होता है और स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिल सकती है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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