14 अगस्त को रिलीज होने जा रही राजकुमार संतोषी निर्देशित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ केवल एक नई पीरियड फिल्म नहीं है। यह हिंदी रंगमंच के सबसे चर्चित, सबसे अधिक मंचित और सबसे ज्यादा बहस पैदा करने वाले नाटकों में से एक असगर वजाहत के ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्म्या ई नई’ पर आधारित है। लगभग साढ़े तीन दशक पहले लिखे गए इस नाटक ने भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप तक दर्शकों को झकझोरा। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर यह कहानी आधारित थी, वहीं इसे कई बार विरोध, सेंसरशिप और मंचन-प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।
फिल्म में शबाना आजमी उस अमर किरदार ‘माई’ की भूमिका निभा रही हैं जिसने इस नाटक को कालजयी बनाया। सनी देओल सिकंदर मिर्जा बने हैं, जबकि प्रीति जिंटा उनकी पत्नी और करण देओल उनके बेटे की भूमिका में नजर आएंगे। यह वही फिल्म है जिसे पहले ‘लाहौर 1947’ नाम से बनाया जा रहा था। राजकुमार संतोषी करीब दो दशक से इस कहानी को बड़े पर्दे पर लाने का सपना देख रहे थे और उन्होंने इसके फिल्म अधिकार असगर वजाहत से दो बार खरीदे।
आखिर क्या है ‘जिस लाहौर नई वेख्या’ की कहानी?
कहानी 1947 के विभाजन के बाद शुरू होती है। लखनऊ से विस्थापित होकर पाकिस्तान पहुंचे सिकंदर मिर्जा का परिवार लाहौर की एक विशाल हवेली में बसता है। लेकिन वहां पहले से एक बुजुर्ग हिंदू महिला, रतनलाल जौहरी की मां, रह रही होती है। पूरा परिवार उन्हें निकालने की कोशिश करता है, मगर धीरे-धीरे वही बूढ़ी मां पूरे मुस्लिम परिवार की आत्मीय सदस्य बन जाती है। माई की मृत्यु के बाद यह सवाल खड़ा होता है कि उसका अंतिम संस्कार किस रीति से किया जाए।
वर्षों तक मुस्लिम परिवार के साथ रहने के बावजूद वह अपनी अंतिम सांस तक हिंदू ही रहती है। ऐसे में मौलवी से सलाह ली जाती है, लेकिन यह सहमति बनती है कि उसका दफन नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने अपना धर्म नहीं बदला था। इसके बाद माई का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार करने का निर्णय लिया जाता है और उसकी अंतिम यात्रा की तैयारियां शुरू होती हैं।
कट्टरपंथी पहलवान याकूब को जब यह पता चलता है कि एक हिंदू महिला का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया जाएगा और मौलवी भी इस फैसले का विरोध नहीं कर रहे हैं, तो वह उग्र हो उठता है। नफरत और सांप्रदायिक उन्माद में अंधा होकर वह मौलवी की हत्या कर देता है। इसी त्रासद घटना के साथ नाटक यह सवाल छोड़ जाता है कि धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने वाले लोग दरअसल किसी भी धर्म की मूल मानवीय शिक्षाओं को नहीं समझते। खुद असगर वजाहत कई बार कह चुके हैं कि यह नाटक किसी धर्म या समुदाय की नहीं, बल्कि इंसानियत, सह-अस्तित्व और सांझी संस्कृति की कहानी है।
कैसे जन्मा यह नाटक?
असगर वजाहत को इस नाटक का बीज उर्दू पत्रकार संतोष कुमार से मिला। विभाजन के दौरान उनके भाई कृष्ण कुमार गोर्टू दंगों में मारे गए थे। बाद में संतोष कुमार लाहौर गए और लौटकर उन्होंने एक यात्रा संस्मरण लिखा, जिसमें एक ऐसी हिंदू वृद्धा का उल्लेख था जो विभाजन के बाद भी अपने घर में अकेली रह गई थी और उसे विश्वास था कि उसका परिवार एक दिन लौटेगा। यहीं से असगर वजाहत की कल्पना ने आकार लिया और धीरे-धीरे यह कहानी दुनिया के सबसे चर्चित हिंदी नाटकों में बदल गई।
जब 1989 में नाटक लिखा गया तो शुरुआती दौर में कई निर्देशक इसे मंचित करने में रुचि नहीं दिखा रहे थे। बाद में रंगमंच के दिग्गज हबीब तनवीर ने इसे हाथ में लिया। 22 सितंबर 1990 को इसका पहला बड़ा मंचन हुआ और फिर देखते ही देखते इसकी ख्याति देश-दुनिया में फैल गई। हबीब तनवीर और उनकी संस्था नया थिएटर ने इसे सैकड़ों बार मंचित किया। इसके बाद यह मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, उर्दू, अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में अनूदित हुआ।
पाकिस्तान में हुई थी बैन
हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत का चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्म्या ई नई’ पिछले तीन दशकों से रंगमंच की दुनिया में एक मिसाल माना जाता है। इस नाटक ने भारत से लेकर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान तक दर्शकों को प्रभावित किया। हालांकि पाकिस्तान में इस नाटक को बैन कर दिया गया था। असगर वजाहत ने एक साक्षात्कार में बताया था कि पाकिस्तान में प्रशासन ने मंचन की अनुमति न देने के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए थे- नाटक में एक मौलवी की हत्या दिखाई गई है, जिससे इस्लाम की छवि खराब होती है। दूसरा, हिंदू वृद्धा ‘माई’ को नैतिक रूप से सबसे ऊंचे स्थान पर दिखाया गया है। तीसरा यह कि नाटककार एक भारतीय हैं।
वजाहत के अनुसार, इन तर्कों के आधार पर कुछ प्रस्तुतियों को मंजूरी नहीं मिली। हालांकि यह भी सच है कि पाकिस्तान में इस नाटक के कई मंचन हुए और उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता मिली। कराची के चर्चित रंगकर्मी खालिद अहमद ने जब इसका उर्दू संस्करण मंचित करने की कोशिश की तो प्रशासन ने अनुमति नहीं दी। बाद में जर्मन सांस्कृतिक केंद्र गोएथे सेंटर में इसके शो हुए, जहां दर्शकों की इतनी भीड़ उमड़ी कि लोगों को पेड़ों की शाखाओं पर बैठकर नाटक देखना पड़ा।
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन ने लिखा था, “आज पाकिस्तान को जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह सहिष्णुता है। यह नाटक उसी की वकालत करता है।” अंग्रेजी पत्रिका हेराल्ड ने भी इसकी सराहना करते हुए लिखा था कि असगर वजाहत ने मौलवी के चरित्र को खलनायक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान के रूप में प्रस्तुत किया है।
हालांकि विवाद केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा। 2009 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के भारत रंग महोत्सव में कराची की प्रसिद्ध नृत्यांगना और रंगकर्मी सीमा किरमानी अपने दल के साथ इस नाटक का मंचन करने दिल्ली आई थीं। कुछ हिंदू कट्टरपंथी संगठनों ने इसका विरोध किया। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच नाटक का मंचन तो हो गया, लेकिन बाद का लखनऊ दौरा रद्द करना पड़ा।
इसी तरह इसकी एक चर्चित मिसाल मुंबई के बांद्रा स्थित रंग शारदा सभागार की है। जहां नाटक का मराठी रूपांतरण मंचित किया जा रहा था। निर्देशित वामन केंद्रे कर रहे थे। मराठी अनुवाद शफात खान ने किया था। सभी शो हाउसफुल चल रहे थे।
एक प्रदर्शन के दौरान मध्यांतर में अचानक बैकस्टेज हंगामा मच गया। शफात खान जब वहां पहुंचे तो देखा कि खुद को शिवसेना का स्थानीय नेता बताने वाला एक व्यक्ति निर्माता और निर्देशक को धमका रहा है। उसका कहना था कि यह नाटक तुरंत बंद किया जाए, अन्यथा इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। कुछ देर बाद वह व्यक्ति गुस्से में वहां से चला गया। लेकिन नाटक बंद नहीं हुआ।
कुछ दिन बाद अंतिम शो के बाद वही व्यक्ति फिर बैकस्टेज पहुंचा। इस बार उसका अंदाज बिल्कुल बदला हुआ था। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने जेब से सौ-सौ रुपये के नोटों की गड्डियां निकालीं और निर्माता के हाथ में देते हुए कहा, “मुझे माफ कर दीजिए। उस दिन मैंने आधा नाटक देखा था, इसलिए गलत समझा। आज पूरा नाटक देखा है। यह नाटक बंद नहीं होना चाहिए। अगर पैसों की जरूरत पड़े तो मुझे जरूर बताइएगा।”
इसी तरह की घटना ऑस्ट्रेलिया के सिडनी से भी जुड़ी है। सिडनी में जब कुमुद मीरानी के निर्देशन में इस नाटक का मंचन हुआ तो दर्शकों की अद्भुत प्रतिक्रियाएं सामने आई। एक इंटरव्यू में असगर वजाहत कहते हैं कि निर्देशक ने मुझे भी फीडबैक भेजे। कि जिन लोगों ने शो देखे, उनकी क्या प्रतिक्रिया थीं। इसमें एक प्रतिक्रिया बड़े मजे की थी। एक आदमी ने लिखा कि मैं अपनी पत्नी के साथ नाटक देखने के लिए गया। और मेरी पत्नी को आंखों की एक बीमारी थी। जिसको आई डेप्थ कहते हैं। सूखी आंखें। ऑपरेशन से ठीक करना था। पत्नी को नाटक देखकर कुछ ऐसा लगा। अपने अनुभव, अतीत या कुछ चीजों को यादकर वह इतना रोई कि अगले दिन जब वह डॉक्टर के पास गई तो डॉक्टर ने बोला कि अब ऑपरेशन की जरूरत नहीं है। तुम्हारी वो नर्व खुल गई है।
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