25 जून 1975 की मध्य रात्रि को तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से देश में आपातकाल लगाने की घोषणा (proclamation) पर हस्ताक्षर करवाया था। ये तो काफी पुरानी बात हो गई। अब एक वाकया बिहार से जुड़ा है। बिहार में श्री देवानंद कुंवर राज भवन (अब लोक भवन) में दूसरे तल पर अपने कमरे में सो रहे थे। आधी रात हो गई थी, तभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वस्त सचिव चंचल कुमार राज भवन पहुंचे। साथ में एक फाइल थी। उन्होंने राज्यपाल के प्रमुख सचिव, परिसहाय से निवेदन किया कि महामहिम को जगा कर उनका हस्ताक्षर करवाया जाये। सभी ने कहा रख दीजिए। कल सुबह सिग्नेचर हो जाएगा । चंचल कुमार ने समझाया कि नीतीश जी आज ही ऑर्डर जारी करना चाहते हैं। इसीलिए अर्जेंट है।
एक ओएसडी को जगाया गया। वे महामहिम के करीब थे। उन्होंने दो तीन बार कमरे का दरवाजा खटखटाया, तब नींद से डिस्टर्ब हो होकर राज्यपाल जी आए और पूछा “क्या इमरजेंसी है, नीतीश कुमार के सचिव ने बताया कि मुख्यमंत्री जी आज ही की तारीख पर नए महाधिवक्ता की नियुक्ति का आदेश जारी करना चाहते हैं, नहीं तो कल बीजेपी जो सरकार में पार्टनर है, वो किसी अन्य वकील के लिए दबाव डालेगी। राज्यपाल ने अनुशंसा पर सिग्नेचर कर दिया। अभी इसी सप्ताह तत्कालीन महाधिवक्ता प्रशांत कुमार शाही ने इस्तीफा दिया और सरकार ने उसे स्वीकृति के लिए लोक भवन तब भेजा जब राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद आता हसनैन रात का डिनर लेने के बाद सोने जा रहे थे।
कुछ और ऐसी कहानियां हैं। बिहार के एक राज्यपाल रहे गोपाल कृष्ण गांधी कलकत्ता से इंडियन एयरलाइंस की जहाज से उतर कर राज्य सरकार के हेलीकॉप्टर पर सवार हो मोतिहारी जाने लगे थे, तभी राज्य के मुख्य सचिव एक फाइल लेकर दौड़े और सिग्नेचर करने का निवेदन किया, राज्यपाल ने उद्देश्य जानना चाहा तो बताया गया दस व्यक्ति जिसमें मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री शामिल हैं, उन्हें विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करने का प्रस्ताव है। महामहिम ने पूरी सूची नहीं देखी ओर सिग्नेचर कर दिया।
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बिहार के एक और राज्यपाल रहे बूटा सिंह ने 2005 में राष्ट्रपति शासन में काम किया और अपने दो सलाहकारों की सिफारिश पर करीब 20 उच्च पुलि अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया। उन्हीं के बिरादरी के मुख्य सचिव थे जी एस कांग साहेब, जो राज्यपाल से नाराज हो गए क्योंकि उनको बाइपास किया गया था।
मुख्य सचिव गुस्से में छुट्टी पर चले गए। इतिहास में पहली बार राज्यपाल को मुख्य सचिव के आवास पर जाकर मान मनौवल करना पड़ा। एक और राज्यपाल रहे गोविंद नारायण सिंह, जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे, उन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद से असहमति मोल ली। नवंबर महीने में गंगा नदी किनारे छठ पूजा की छटा देखने के लिए सरकारी नाव पर गंगा तट भ्रमण के इच्छुक थे और मुख्यमंत्री की भी यही कामना थी।
अभी हाल में महाराष्ट्र में तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी को 6 साल पहले तो शनिवार अहले सुबह देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री की शपथ दिलानी पड़ी थी।

