नई दिल्ली: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का बुर्का हटाए जाने को लेकर जारी विवाद के बीच दिग्गज गीतकार और स्क्रीनराइटर जावेद अख्तर का बयान भी सुर्खियों में आ गया है। जावेद अख्तर अपने बेबाक विचारों और खुलकर बोलने के लिए जाने जाते हैं। ‘शोले’ के राइटर ने एक बार फिर महिलाओं के चेहरा ढकने के विचार पर सवाल उठाकर एक नई बहस छेड़ दी है।
एक इवेंट में बोलते हुए अख्तर ने महिलाओं से चेहरा ढकने की उम्मीद करने के पीछे के सामाजिक तर्क पर सवाल उठाया। इस सेशन में स्टूडेंट्स और दूसरे लोग भी मौजूद थे। एक महिला के सवाल के जवाब में अख्तर ने कहा कि उनके अनुसार चेहरा ढकना अक्सर निजी आजादी से कम और समाज के अदृश्य दबाव से ज्यादा जुड़ा हुआ है।
अपने चेहरे पर शर्म क्यों: जावेद अख्तर
SOA लिटरेरी फेस्टिवल-2025 में सेशन के इंटरैक्टिव हिस्से के दौरान एक युवा लड़की ने अख्तर की उन पिछली बातों का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने उन महिलाओं के बीच बड़े होने की बात कही थी जो बुर्का नहीं पहनती थीं। युवती ने पूछा कि क्या खुद को ढकने से कोई महिला अपने आप कमजोर हो जाती है? इस पर अख्तर का जवाब सीधा और बिना लाग-लपेट वाला रहा।
उन्होंने पलट कर पूछा, ‘आपको अपने चेहरे पर शर्म क्यों आनी चाहिए?’ अख्तर ने कहा कि वे मानते हैं कि कपड़ों में शालीनता होनी चाहिए, फिर चाहे ये पुरुषों का परिधान हो या महिलाओं का, दोनों पर समान रूप से यह लागू होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि रिवीलिंग कपड़े, चाहे पुरुष पहनें या महिलाएं, गरिमापूर्ण नहीं लगते। अगर कोई आदमी स्लीवलेस शर्ट पहनकर ऑफिस या कॉलेज आता है, तो यह अच्छी बात नहीं है। उसे अच्छे कपड़े पहनने चाहिए। और एक महिला को भी अच्छे कपड़े पहनने चाहिए।’
इसके बाद अख्तर ने साफ किया कि शालीनता और चेहरा ढकना एक ही बात नहीं है। अख्तर ने साथ ही अच्छे कपड़े पहनने और चेहरा छिपाने के बीच एक फर्क का जिक्र किया। उन्होंने एक औरत के चेहरे को ऐसी चीज मानने के पीछे के लॉजिक पर सवाल उठाया कि इसे छिपाना क्यों जरूरी है।
‘चेहरे को ढकना क्यों…मर्जी का मतलब ब्रेनवॉश किया गया है’
अख्तर ने कहा, ‘लेकिन वह अपना चेहरा क्यों ढकती है? उसके चेहरे में ऐसा क्या अश्लील, गंदा या गरिमाहीन है कि उसे ढका जाता है? क्यों? क्या वजह है?’
अख्तर के अनुसार यह विचार कि चेहरा ढकना हमेशा एक पर्सनल पसंद होती है, करीब से देखने पर सही नहीं लगता। उन्होंने तर्क दिया कि कई औरतें आजादी से चुनने से बहुत पहले ही अपने आस-पास के माहौल से प्रभावित हो जाती हैं।
उन्होंने कहा, ‘यह पीयर प्रेशर है। अगर वह कहती है कि वह यह अपनी मर्जी से कर रही है, तो उसका ब्रेनवाश किया गया है।’ उन्होंने आगे कहा कि परिवार के सदस्यों और आस-पास के सोशल सर्कल की मंजूरी एक बड़ी भूमिका निभाती है, ‘क्योंकि उसे पता होता है कि उसकी जिंदगी में कुछ लोग इस बात की तारीफ करेंगे कि उसने ऐसा किया है।’
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अख्तर ने सवाल किया कि अगर समाजिक दबाव नहीं रहेगा तो क्या चेहरा ढकने का चलन रहेगा। उन्होंने कहा, ‘अगर आप उसे छोड़ दें, तो कोई अपना चेहरा क्यों ढकेगा? क्या उसे अपने चेहरे से नफरत है? क्या उसे अपने चेहरे पर शर्म आती है? क्या? क्यों?’
बाद में अख्तर ने गुरुवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, जो लोग मुझे थोड़ा-बहुत भी जानते हैं, वे जानते हैं कि मैं पर्दे के पारंपरिक कॉन्सेप्ट के कितना खिलाफ हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी भी तरह से यह मान लूँ कि नीतीश कुमार ने एक मुस्लिम महिला डॉक्टर के साथ जो किया है, वह सही है। मैं इसकी कड़ी शब्दों में निंदा करता हूँ। नीतीश कुमार को उस महिला से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए।’

