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श्रीदेवी की चेन्नई में 4.7 एकड़ जमीन को लेकर क्या है विवाद? मद्रास होईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यवाही पर लगाई रोक

श्रीदेवी ने साल 1988 में चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर संबंदा मुदलियार के परिवार से 4.77 एकड़ जमीन खरीदी थी। और पिछले लगभग 37-38 वर्षों से यह संपत्ति उनके परिवार के कब्जे में है।

दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी द्वारा चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड (ईसीआर) पर खरीदी गई 4.7 एकड़ जमीन को लेकर चल रहे विवाद में मद्रास हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस टीवी तमिलसेल्वी की पीठ ने चेंगलपट्टू की अतिरिक्त जिला अदालत में चल रही मुकदमे की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है।

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, श्रीदेवी ने साल 1988 में चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर संबंदा मुदलियार के परिवार से 4.77 एकड़ जमीन खरीदी थी। और पिछले लगभग 37-38 वर्षों से यह संपत्ति उनके परिवार के कब्जे में है।

श्रीदेवी से जुड़े जमीन को लेकर विवाद क्या है?

विवाद तब शुरू हुआ जब 2025 में नटराजन और शिवगामी, जो चंद्रशेखरन मुदलियार की दूसरी पत्नी के बेटे और बेटी बताए जाते हैं, उन्होंने खुद को कानूनी वारिस बताकर सर्टिफिकेट हासिल किया और चेंगलपट्टू अतिरिक्त जिला कोर्ट में सिविल मुकदमा दायर कर न सिर्फ हिस्सेदारी मांगी, बल्कि 1988 में हुए बिक्री दस्तावेजों को रद्द करने की भी मांग की।

इस दावे को चुनौती देते हुए श्रीदेवी के पति बोनी कपूर ने अपनी बेटियों जान्हवी कपूर और खुशी कपूर के साथ चेंगलपट्टू कोर्ट में याचिका दायर कर मुकदमा खारिज करने की मांग की थी। हालांकि, 1 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त जिला अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि मामले में पूरी सुनवाई जरूरी है। इसके बाद कपूर परिवार ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट में दायर याचिका में कपूर परिवार ने आरोप लगाया कि दावेदारों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कानूनी वारिस का प्रमाणपत्र हासिल किया। उनका कहना है कि संपत्ति के मूल मालिक एम.सी. संबंदा मुदलियार थे, जिनकी संपत्ति का बंटवारा 1960 में ही हो चुका था।

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बोनी कपूर परिवार ने यह भी दलील दी कि चंद्रभानु की शादी एमसी चंद्रशेखरन से उस समय हुई थी, जब उनकी पहली शादी पहले से ही वैध थी। ऐसे में दूसरी शादी कानूनन अमान्य मानी जाएगी और उससे जुड़े वारिसों का दावा भी नहीं बनता। आईएएनएस के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि इस अहम तथ्य को छिपाकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई।

साथ ही, परिवार ने सवाल उठाया कि 1988 के सौदे को चुनौती देने के लिए 2025 तक इंतजार क्यों किया गया, जबकि मूल मालिक का निधन 1995 में हो चुका था और तब तक किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी।

दावेदारों ने क्या कहा?

वहीं, दावेदारों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उन्हें 2023 में ही इस संपत्ति और कथित अनियमितताओं की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने 2025 में मामला दर्ज कराया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कपूर परिवार ने 2023 में गलत तरीके से ‘पट्टा’ (भूमि स्वामित्व से जुड़ा राजस्व रिकॉर्ड) हासिल किया।

जस्टिस टी.वी. तमिलसेल्वी की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फिलहाल निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। अंतिम सुनवाई की तारीख 26 मार्च तय की गई है। यह आदेश कपूर परिवार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, क्योंकि अब अंतिम सुनवाई तक मामले में कोई आगे की कार्रवाई नहीं होगी।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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