विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी VB-G RAM-G एक्ट लागू हो गया है। इसने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह ली है जो 20 सालों तक ग्रामीण परिवारों को 100 दिनों की राजगार की गांरटी देता आ रहा था। VB-G RAM G को लेकर हालांकि विरोध भी है। कुछ राज्यों ने न तो इस नई योजना को लेकर कोई नोटिफिकेशन जारी किया है और न ही इसके लिए अभी बजट आवंटित किया गया है।
VB-G RAM G को लेकर विवाद तभी शुरू हो गया था जब पिछले साल दिसंबर में इसे संसद से पास कराया गया था। केंद्र सरकार इसे ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा सुधार बता रही है। दूसरी ओर कुछ राज्य इसका विरोध करते रहे हैं। विवाद की वजह केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय जिम्मेदारी को लेकर है। दिलचस्प बात यह है कि आपत्ति जताने वालों में सिर्फ विपक्ष शासित राज्य ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्य भी शामिल हैं।
क्या बदला है नए कानून में?
VB-G RAM-G कानून दिसंबर 2025 में संसद के शीतकालीन सत्र में पारित हुआ था। इसके तहत मनरेगा की जगह नई ग्रामीण रोजगार व्यवस्था लागू की गई है। सबसे बड़ा बदलाव रोजगार की अवधि में किया गया है। पहले प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन रोजगार की कानूनी गारंटी थी, जिसे अब बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।
इसके साथ ही पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम दैनिक मजदूरी 300 रुपये तय की गई है। हालांकि राज्यों को इससे अधिक मजदूरी तय करने की भी छूट है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु में यह दर 345 रुपये प्रतिदिन और हरियाणा में 409 रुपये प्रतिदिन अधिसूचित की गई है।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव फंडिंग के ढांचे में हुआ है। मनरेगा के तहत मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, जबकि सामग्री (मटेरियल) पर होने वाले खर्च में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी 75:25 थी। कुल मिलाकर राज्यों का वास्तविक वित्तीय बोझ कुल खर्च का 10 प्रतिशत से भी कम रहता था।
नई व्यवस्था में अब कुल खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र और 40 प्रतिशत राज्यों को वहन करना होगा। हालांकि हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए राज्यों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत ही रखी गई है।
राज्यों की सबसे बड़ी चिंता बढ़ता वित्तीय बोझ
यही नया फंडिंग मॉडल कई राज्यों की सबसे बड़ी आपत्ति बन गया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार अप्रैल में केंद्र के साथ हुई बैठक में मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना ने राज्यों पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर चिंता जताई थी।
इन राज्यों का कहना है कि पहले की तुलना में अब उन्हें कहीं अधिक धन खर्च करना पड़ेगा। इसके अलावा यदि किसी राज्य का खर्च केंद्र द्वारा तय किए गए मानक बजट से अधिक हो जाता है तो अतिरिक्त राशि भी राज्य सरकार को ही वहन करनी होगी।
सिर्फ फंडिंग ही नहीं, कई राज्यों ने मजदूरी दरों पर भी आपत्ति दर्ज कराई। बिहार ने दैनिक मजदूरी 255 रुपये से बढ़ाकर 413 रुपये करने की मांग की थी, जबकि जम्मू-कश्मीर ने इसे 272 रुपये से बढ़ाकर 311 रुपये करने का प्रस्ताव रखा था। कई राज्यों का तर्क है कि नई मजदूरी दरें अभी भी कम हैं।
कुछ राज्यों ने कृषि के व्यस्त मौसम में 60 दिनों तक रोजगार पर रोक लगाने के प्रावधान पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि ग्रामीण संकट के समय यही योजना सबसे अधिक सहारा देती है।
विरोध के बावजूद पंजाब ने लागू कर दिया कानून
VB-G RAM-G का सबसे मुखर विरोध करने वालों में पंजाब भी शामिल था। दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें नए कानून को दलित मजदूरों, ग्रामीण गरीबों, महिलाओं और पिछड़े वर्गों के हितों के खिलाफ बताया गया था।
पंजाब पहले ही भारी कर्ज के बोझ से जूझ रहा है और नई व्यवस्था के तहत राज्य की वित्तीय जिम्मेदारी काफी बढ़ने वाली है। इसके बावजूद 26 जून 2026 को पंजाब सरकार के ग्रामीण विकास एवं पंचायत विभाग ने अधिसूचना जारी कर 1 जुलाई से VB-G RAM-G लागू करने का फैसला कर लिया।
इसके बाद कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि यदि सरकार को कानून पर इतनी आपत्ति थी तो विधानसभा का प्रस्ताव क्या केवल दिखावे के लिए था। वहीं तमिलनाडु भी शुरू से इसके विरोध में था। वहां अब सरकार बदल गई है। ऐसे में नई टीवीके (TVK) सरकार ने बिना किसी बड़े विवाद के योजना लागू कर दी। हालांकि, साथ ही सीएम विजय ने पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्र को चिट्ठी लिखकर फंडिंग के फॉर्मूले पर विरोध भी जताया है और कहा है कि इससे राज्य पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से मंगलवार को जारी प्रेस रिलीज के अनुसार 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने बजट में VB-G RAM-G के लिए प्रावधान कर दिया है, जबकि 24 राज्यों ने इसे अधिसूचित भी कर दिया है।
इस बीच आलोचकों का मानना है कि कागज पर 125 दिनों के रोजगार की गारंटी आकर्षक दिखती है, लेकिन यदि राज्यों के पास पर्याप्त धन नहीं होगा तो इसका लाभ जमीन पर नहीं मिल पाएगा। उनका यह भी तर्क है कि केंद्र का बजटीय आवंटन लगभग मनरेगा के बराबर ही है। ऐसे में पहले जहां 100 दिनों की पात्रता के बावजूद परिवारों को औसतन करीब 50 दिन ही काम मिल पाता था, वहां अब 125 दिनों की गारंटी व्यवहार में कैसे पूरी होगी, यह बड़ा सवाल है।
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