अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। इस पल का पूरी दुनिया इंतजार कर रही थी। रिपोर्टों की मानें तो दोनों देशों के बीच 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं, लेकिन कई रणनीतिक विशेषज्ञ, विपक्षी नेता और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे अमेरिका की मजबूरी में की गई वापसी के रूप में देख रहे हैं।
करीब साढ़े तीन महीने तक चले युद्ध, अरबों डॉलर के सैन्य खर्च और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बाद दोनों देशों के बीच जिस समझौते का मसौदा सामने आया है, उसमें ईरान को तेल निर्यात की छूट, जमे हुए अरबों डॉलर के फंड तक पहुंच और 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज जैसे बड़े आर्थिक लाभ मिलने की बात कही जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में ट्रंप प्रशासन की रणनीतिक जीत है या फिर एक ऐसे युद्ध से सम्मानजनक निकास, जिसकी कीमत अमेरिका के लिए लगातार बढ़ती जा रही थी?
ईरान को क्या मिलेगा?
मसौदे के अनुसार सबसे बड़ा फायदा आर्थिक मोर्चे पर होगा।
– ईरान को तत्काल तेल निर्यात की अनुमति मिलेगी।
– अमेरिकी वित्त मंत्रालय 60 दिनों की वार्ता अवधि के दौरान ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और उनसे जुड़ी बैंकिंग, बीमा तथा परिवहन सेवाओं के लिए छूट जारी करेगा।
– अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की मदद से 300 अरब डॉलर तक का विकास एवं पुनर्निर्माण कार्यक्रम शुरू किया जाएगा।
– विभिन्न देशों में जमे ईरानी धन और परिसंपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराया जाएगा।
– संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को तय समयसीमा के भीतर हटाने का वादा किया गया है।
– ईरान का दावा है कि युद्ध के कारण उसकी अर्थव्यवस्था को 250 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ है। ऐसे में यह पैकेज तेहरान के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
फंड कहां से आएगा और अमेरिका को बदले में क्या चाहिए?
समझौते का सबसे चर्चित पहलू 300 अरब डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) के विकास पैकेज से जुड़ा है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि यह राशि सीधे अमेरिकी करदाताओं के धन से नहीं दी जाएगी। रिपोर्टों के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात, कतर समेत अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भागीदारी से यह फंड तैयार किया जाएगा। इसके अलावा निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भी इस परियोजना में शामिल करने की योजना है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि ईरान को आर्थिक राहत और निवेश का लाभ तभी मिलेगा, जब वह समझौते की सभी शर्तों का पूरी तरह पालन करेगा।
बदले में अमेरिका की सबसे बड़ी प्राथमिकता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। वाशिंगटन चाहता है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करने की किसी भी संभावना को समाप्त करे, अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को निष्क्रिय बनाए और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को निगरानी की पूरी अनुमति दे। इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय नौवहन को बाधित न करे और ऐसी क्षेत्रीय गतिविधियों पर अंकुश लगाए, जिनसे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह पूरी तरह “परफॉर्मेंस-बेस्ड” समझौता है। यानी आर्थिक सहायता, प्रतिबंधों में ढील और अन्य लाभ किसी एकमुश्त पैकेज के रूप में नहीं मिलेंगे, बल्कि ईरान द्वारा तय शर्तों के पालन और उसके व्यवहार के आधार पर चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाएंगे।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। उनका दावा है कि सैन्य दबाव की वजह से ईरान बातचीत की मेज पर आया। लेकिन कई विशेषज्ञ और विपक्षी नेता इससे सहमत नहीं हैं। आलोचकों का तर्क है कि तीन महीने के युद्ध, अरबों डॉलर के सैन्य खर्च, वैश्विक तेल आपूर्ति में व्यवधान और घरेलू राजनीतिक दबाव के बाद अमेरिका को अंततः उसी ईरान के साथ समझौता करना पड़ा, जिसे वह कमजोर करना चाहता था।
आलोचकों का कहना है कि साल 2018 में जिस ‘ओबामा 2015 परमाणु समझौते’ (JCPOA) को ट्रंप ने भयानक और ईरान को रिश्वत देना कहकर फाड़ दिया था, आज वे खुद हुबहू उसी रास्ते पर चल रहे हैं। गौरतलब है कि समझौते से पहले ट्रंप ने यह दावा किया था कि ईरान के साथ जो डील होने जा रही है वह ऐतिहासिक है और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुई ‘जेसीपीओए’ डील से कहीं बेहतर होगा।
क्या यह अमेरिका की जीत है या मजबूरी में किया गया समझौता?
हालांकि शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉबर्ट ए. पेप ने इस समझौते को अमेरिका की विनाशकारी रणनीतिक हार करार दिया है। वहीं, डेमोक्रेटिक सांसद सेथ मौलटन ने इसे ट्रंप द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता को सौंपा गया आत्मसमर्पण का दस्तावेज तक कह दिया।
अमेरिका-ईरान समझौते पर उठ रहे सवालों को उस समय और बल मिला, जब अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ सीबीएस न्यूज के कार्यक्रम ‘फेस द नेशन’ में समझौते का बचाव करते नजर आए। इंटरव्यू के दौरान हेगसेथ ने दावा किया कि पूरे संघर्ष के दौरान अमेरिका ने होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखा था। लेकिन कार्यक्रम की होस्ट ने उनसे पूछा कि अगर वाशिंगटन वास्तव में इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर नियंत्रण रखता था, तो फिर उसे इसे खोलने और सामान्य आवाजाही बहाल करने के लिए तेहरान के साथ लंबी बातचीत करने की जरूरत क्यों पड़ी?
इसके बाद हेगसेथ से यह भी पूछा गया कि क्या इस समझौते का अंतिम परिणाम वही नहीं है, जो युद्ध शुरू होने से पहले था? यानी होर्मुज फिर से खुल जाएगा, तेल और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही सामान्य हो जाएगी और क्षेत्रीय तनाव कम हो जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि महीनों तक चले युद्ध, भारी सैन्य खर्च और जान-माल के नुकसान के बावजूद अमेरिका को रणनीतिक रूप से हासिल क्या हुआ?
इस सवाल का हेगसेथ ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। आलोचकों का कहना है कि यह समझौता व्यवहारिक रूप से 2015 के परमाणु समझौते की तरह ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समझौते तक पहुंचने के लिए कूटनीतिक बातचीत हुई थी, जबकि इस बार उससे पहले एक महंगा और लंबा सैन्य संघर्ष हुआ।
यही वजह है कि कई विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को अमेरिका की रणनीतिक सफलता के बजाय एक ऐसी स्थिति के रूप में देख रहे हैं, जहां महीनों की लड़ाई और तनाव के बाद वाशिंगटन को अंततः उन्हीं शर्तों के करीब पहुंचना पड़ा, जिन्हें वह पहले कूटनीतिक रास्ते से स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
ट्रंप की क्या मजबूरी थी? क्यों रोकना पड़ा युद्ध?
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता केवल कूटनीतिक पहल का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक दबाव भी काम कर रहे थे। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु ढांचे को कमजोर करने के उद्देश्य से सैन्य अभियान शुरू किया था, लेकिन संघर्ष उम्मीद से कहीं अधिक लंबा खिंच गया।
मई के मध्य तक अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुमान के अनुसार युद्ध पर 25 से 29 अरब डॉलर तक का प्रत्यक्ष सैन्य खर्च हो चुका था। दूसरी ओर, खाड़ी क्षेत्र में तनाव और समुद्री मार्गों पर व्यवधान के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुए, जिससे तेल की कीमतों में तेजी आई और इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं तक पहुंचा। संघर्ष के दौरान तटस्थ जहाजों पर हुए हमलों में तीन भारतीय क्रू सदस्यों सहित कई लोगों की मौत ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना को जन्म दिया।
घरेलू राजनीति भी ट्रंप प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन रही थी। नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतें सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम बन चुकी थीं। इसके अलावा आगामी 4 जुलाई को अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। ऐसे में व्हाइट हाउस नहीं चाहता था कि लंबा खिंचता युद्ध इस ऐतिहासिक अवसर पर राजनीतिक और सार्वजनिक असंतोष का कारण बने।

