वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एच-1बी वीजा फीस मामले में बड़ा झटका लगा है। अमेरिका की एक संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1बी वीजा आवेदनों पर लगाए गए 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) के अतिरिक्त शुल्क को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति प्रशासन कांग्रेस की मंजूरी के बिना कोई नया टैक्स नहीं लगा सकता।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में एच-1बी वीजा कार्यक्रम को लेकर एक सख्त नीति लागू की थी। इसके तहत एच-1बी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं के लिए उच्च वेतन मानक अनिवार्य किए गए थे और प्रत्येक नए एच-1बी आवेदन पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाया गया था।
इस नीति को 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरलों ने अदालत में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई करते हुए बोस्टन के अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन ने फैसला सुनाया कि यह शुल्क किसी प्रशासनिक प्रतिबंध के बजाय एक टैक्स के समान है, जिसे लागू करने का अधिकार राष्ट्रपति को कांग्रेस ने नहीं दिया है।
जस्टिस सोरोकिन ने अपने 42 पन्नों के फैसले में कहा कि एच-1बी वीजा पर लगाया गया शुल्क वास्तव में एक टैक्स था, जबकि इसके लिए कांग्रेस ने कार्यपालिका को कोई वैधानिक अधिकार नहीं दिया है।
न्यायाधीश ने कहा, “एच-1बी याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लगाने की अनुमति किसी भी कानून में नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के पास आव्रजन (इमिग्रेशन) मामलों में व्यापक अधिकार जरूर हैं, लेकिन वे संवैधानिक सीमाओं और कांग्रेस द्वारा निर्धारित अधिकारों से बंधे हुए हैं।
अदालत ने ट्रंप प्रशासन के दलील को किया खारिज
ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क विदेशी नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश को नियंत्रित करने की राष्ट्रपति की शक्ति का हिस्सा है, लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। न्यायाधीश ने कहा कि जिन आव्रजन कानूनों का हवाला दिया गया है, वे राष्ट्रपति को नियम और शर्तें लगाने का अधिकार तो देते हैं, लेकिन नया टैक्स लगाने का नहीं।
फैसले में कहा गया कि “टैक्स को प्रतिबंध नहीं कहा जा सकता” और अमेरिकी संविधान के तहत कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। अदालत ने यह भी पाया कि संबंधित सरकारी एजेंसियों ने आवश्यक नियम निर्माण प्रक्रिया का पालन नहीं किया और इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत लगाने का पर्याप्त औचित्य भी नहीं बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि यह नीति शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती थी, जहां विदेशी विशेषज्ञों की बड़ी भूमिका है। अदालत ने आखिर में इस नीति को अवैध घोषित करते हुए पूरे देश में इसे तत्काल प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया।
फैसले का नेताओं ने किया स्वागत
अदालत के इस फैसले का डेमोक्रेटिक सांसदों, राज्य अधिकारियों और नीति विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे अमेरिकी कंपनियों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को राहत मिलेगी, जो उच्च कुशल विदेशी पेशेवरों पर निर्भर हैं।
भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि यह फैसला ऐसी अवैध नीति को समाप्त करता है, जो अमेरिका की आर्थिक प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचा सकती थी। उनके अनुसार एच-1बी कार्यक्रम नवाचार को बढ़ावा देता है, महत्वपूर्ण उद्योगों में अमेरिकी नेतृत्व को मजबूत करता है और रोजगार सृजन में मदद करता है।
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के दुरुपयोग को रोकना जरूरी है, लेकिन अत्यधिक कुशल पेशेवरों के लिए अनावश्यक बाधाएं खड़ी करना अमेरिका के हित में नहीं है।
इस मामले में कई राज्यों की ओर से कानूनी लड़ाई का नेतृत्व करने वाले रॉब बोंटा ने फैसले को नियोक्ताओं और सार्वजनिक संस्थानों पर डाले गए “अवैध और महंगे बोझ” के खिलाफ बड़ी जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह शुल्क शिक्षकों, डॉक्टरों, नर्सों, शोधकर्ताओं और अन्य विशेषज्ञ पेशेवरों की भर्ती को कठिन और महंगा बना देता।
वहीं, फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज ने कहा कि अदालत का फैसला रोजगार-आधारित आव्रजन प्रणाली में स्थिरता और निष्पक्षता बहाल करेगा। संगठन के नीति एवं रणनीति प्रमुख खंडेराव कंद ने कहा कि वैश्विक प्रतिभाओं तक पहुंच बनाए रखना अमेरिका की प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों की निरंतर प्रगति के लिए आवश्यक है।
अमेरिकी सांसद सैनफोर्ड बिशप ने भी फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि अतिरिक्त शुल्क से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के अस्पतालों तथा स्वास्थ्य सेवा संस्थानों के लिए विशेषज्ञ पेशेवरों की भर्ती और अधिक कठिन हो जाती।
व्हाइट हाउस फैसले को देगा चुनौती?
अदालत के फैसले के बाद व्हाइट हाउस ने ट्रंप का बचाव किया है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के पास किसी भी श्रेणी के विदेशियों के प्रवेश को रोकने का स्पष्ट कानूनी अधिकार है, जिन्हें वे अमेरिका के सर्वोत्तम हित में नहीं मानते हैं और उन्होंने ठीक यही किया।
टेलर रोजर्स ने कहा कि एच-1बी प्रोग्राम का दशकों से दुरुपयोग हो रहा था और राष्ट्रपति ट्रंप ने आखिरकार इसे ठीक करने के लिए कदम उठाया। वाशिंगटन में एक फेडरल जज पहले ही लगभग ऐसे ही एक आदेश को सही ठहरा चुके हैं और प्रशासन को भरोसा है कि अपील करने पर यह आदेश पलट दिया जाएगा।”
व्हाइट हाउस ने यह नहीं बताया कि वह कब अपील करेगा। हालांकि, प्रशासन के अधिकारियों ने संकेत दिया कि वे इस उपाय का बचाव करना जारी रखेंगे, क्योंकि यह एच-1बी प्रोग्राम पर निगरानी कड़ी करने की राष्ट्रपति ट्रंप की व्यापक कोशिश का हिस्सा है।
भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
एच-1बी वीजा अमेरिका का प्रमुख रोजगार आधारित वीजा कार्यक्रम है, जिसके तहत हर साल 65,000 विदेशी पेशेवरों को वीजा जारी किया जाता है। इसके अलावा उच्च डिग्रीधारक उम्मीदवारों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं। यह वीजा आमतौर पर तीन वर्ष के लिए दिया जाता है और बाद में तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
इस कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ भारतीय पेशेवरों को मिलता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, स्वीकृत एच-1बी वीजा में 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों की होती है। यही वजह है कि इस कार्यक्रम से जुड़ा कोई भी बड़ा नीतिगत बदलाव भारत और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए खासे मायने रखता है। आमतौर पर किसी विदेशी कर्मचारी के लिए एच-1बी वीजा आवेदन करने पर अमेरिकी कंपनियों को 2,000 से 5,000 डॉलर तक शुल्क देना पड़ता है।
समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

