नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में सालों से पढ़ा रहे लगभग 25,000 अंशकालिक अनुदेशकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें अनुदेशकों के मानदेय में वृद्धि का विरोध किया गया था। इस फैसले के साथ ही अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रति माह मानदेय देने का रास्ता साफ हो गया है और उनकी नौकरी जाने का का खतरा भी टल गया है।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अनुबंध की अवधि खत्म होने के बाद भी अगर अनुदेशकों को काम पर रखा गया और उन्हें अन्य नौकरी करने से रोका गया, तो ऐसी नियुक्ति को केवल ‘संविदात्मक’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों में ऐसे पद स्वतः सृजित माने जाएंगे और सरकार इन्हें अस्थायी बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती।
‘अनुचित श्रम व्यवहार’ पर अदालत की फटकार
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछे। अदालत ने कहा, “जब भारत पढ़ेगा, तभी भारत बढ़ेगा। आपको मानदेय देने में क्या समस्या है?” खंडपीठ ने 2013 से मानदेय को 7,000 रुपये पर स्थिर रखने को अनुचित श्रम व्यवहार की श्रेणी में रखा। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक मानदेय में संशोधन न करना अन्याय है और अनुदेशकों को सम्मानजनक पारिश्रमिक से वंचित नहीं किया जा सकता। आदेश के अनुसार, मानदेय में नियमित अंतराल पर या कम से कम वार्षिक आधार पर संशोधन होना चाहिए।
6 महीने के भीतर बकाया भुगतान का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संशोधित मानदेय का भुगतान 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी रूप से शुरू किया जाए। साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि साल 2017-18 से अब तक का सारा बकाया (Arrears) आज यानी 4 फरवरी, 2026 से छह महीने के भीतर अनुदेशकों को अनिवार्य रूप से भुगतान किया जाए।
9 साल से था विवाद
यह विवाद साल 2017 में शुरू हुआ था जब उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत अनुदेशकों का मानदेय 8,470 रुपये से बढ़ाकर 17,000 रुपये करने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद इस फैसले को लागू नहीं किया गया। इसके खिलाफ अनुदेशकों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने 9 प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान का आदेश दिया था, जिसे बाद में डबल बेंच ने केवल एक साल के लिए सीमित कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के मूल आदेश को बरकरार रखते हुए अनुदेशकों के पक्ष में पूर्ण न्याय किया है।

