लखनऊः यूपी के साढ़े तीन करोड़ से अधिक बिजली उपभोक्ताओं को फिलहाल बड़ी राहत मिली है। जून माह के बिजली बिलों में प्रस्तावित 10 प्रतिशत फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज (एफपीपीएएस) पर रोक लग गई है। राज्य विद्युत नियामक आयोग (यूपीईआरसी) ने इस बढ़ोतरी को लेकर उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) से सात दिन के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है।
दरअसल, यूपीपीसीएल ने 29 मई को जारी एक आदेश में कहा था कि मार्च 2026 के लिए निर्धारित फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज को जून 2026 के बिजली बिलों में वसूला जाएगा। इसके तहत सभी श्रेणी के उपभोक्ताओं पर बिजली खपत के आधार पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव था। यह शुल्क ईंधन लागत और बिजली खरीद पर बढ़े खर्च की भरपाई के लिए लगाया जाना था।
आदेश का हुआ था भारी विरोध
हालांकि, आदेश जारी होते ही इसका व्यापक विरोध शुरू हो गया। भीषण गर्मी, अघोषित बिजली कटौती और बढ़ती महंगाई के बीच अतिरिक्त बोझ डालने के फैसले को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार और बिजली विभाग को घेर लिया। कांग्रेस ने इसे राज्य सरकार की विफलता बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की, जबकि समाजवादी पार्टी ने इसे आम उपभोक्ताओं पर दोहरी मार करार दिया।
विवाद बढ़ने के बाद नियामक आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए यूपीपीसीएल से पूछा है कि 10 प्रतिशत सरचार्ज की गणना किन नियमों और आधारों पर की गई। आयोग ने यह भी जानना चाहा है कि इसमें दो वर्ष पुराना वित्तीय घाटा या बकाया राशि किस आधार पर शामिल की गई।
उपभोक्त संगठनों आरोप- ठीक से नहीं हुई गणना
उपभोक्ता संगठनों का आरोप है कि यूपीपीसीएल ने स्थापित नियमों से हटकर करीब 1,400 करोड़ रुपये का पुराना बकाया भी सरचार्ज की गणना में जोड़ दिया। जबकि नियमानुसार केवल हाल के महीनों में बिजली खरीद लागत और वास्तविक खर्च के अंतर के आधार पर ही फ्यूल सरचार्ज निर्धारित किया जा सकता है।
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने इस मामले में नियामक आयोग के समक्ष जनहित प्रत्यावेदन दायर किया था। उन्होंने कहा था कि अगर सही वित्तीय गणना की जाती तो उपभोक्ताओं पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय बिजली बिलों में लगभग 2 प्रतिशत तक राहत मिल सकती थी। वर्मा ने कहा था कि बिजली खरीद लागत को वास्तविक से अधिक दर्शाकर उपभोक्ताओं पर करीब 1,610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार डालने की कोशिश की गई।

