अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी सैन्य हमला फिलहाल टाल दिया गया है। ट्रंप के मुताबिक, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेताओं के अनुरोध पर यह फैसला लिया गया, क्योंकि इस समय ईरान को लेकर गंभीर कूटनीतिक बातचीत चल रही है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि कतर के अमीर बिन हमद अल थानी, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने उनसे आग्रह किया था कि प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोका जाए। इन नेताओं का मानना है कि बातचीत के जरिए ऐसा समझौता संभव है, जिसमें ईरान के पास परमाणु हथियार न हों और जिसे अमेरिका सहित मध्य पूर्व के देश स्वीकार कर सकें।
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डेनियल केन और अमेरिकी सेना को निर्देश दिया है कि कल ईरान पर प्रस्तावित हमला नहीं किया जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता है तो अमेरिका बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहेगा।
गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमले किए थे। यह संघर्ष करीब 40 दिनों तक चला। बाद में 8 अप्रैल को ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी थी, लेकिन शांति वार्ता अब तक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है।
युद्धविराम के बाद 11 और 12 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई थी। पाकिस्तान की मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच कई प्रस्तावों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट को लेकर विवाद बना रहा और किसी व्यापक समझौते पर सहमति नहीं बन पाई।
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अमेरिका और ईरान की शर्तों में फंसी बातचीत
ईरानी न्यूज एजेंसी फार्स न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए कई कड़े प्रस्ताव रखे हैं। इनमें ईरान से लगभग 400 किलोग्राम समृद्ध यूरेनियम हटाकर अमेरिका भेजना, केवल एक परमाणु केंद्र को चालू रखने की अनुमति देना और ईरान की जमी हुई संपत्तियों का बड़ा हिस्सा जारी न करना शामिल है। अमेरिका चाहता है कि संघर्ष विराम और शांति वार्ता समानांतर रूप से आगे बढ़ें।
दूसरी ओर, ईरान ने भी बातचीत बहाल करने के लिए अपनी शर्तें रखी हैं। इनमें सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकना, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना, उसकी जमी हुई संपत्तियां बहाल करना, युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा देना और होर्मुज स्ट्रेट पर उसकी संप्रभुता को मान्यता देना शामिल है।
लेबनान को लेकर भी दोनों पक्षों में गंभीर मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि लेबनान में उसके समर्थित संगठन हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई रोकी जाए, जबकि इजराइल इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है।
इस बीच ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि शांति वार्त को लेकर चल रही बातचीत के दौरान अमेरिका ईरान के तेल प्रतिबंधों में छूट देने पर सहमत हो गया है। अमेरिका की तरफ से छूट का मतलब है कि कुछ समय के लिए बैन हटा दिए गए हैं, जबकि ईरान अमेरिका के कमिटमेंट के तहत देश के खिलाफ सभी बैन हटाने पर जोर दे रहा है।
रूस के तेल पर अमेरिकी छूट बढ़ी
इन सबके बीच अमेरिका ने रूस से तेल खरीद को लेकर एक अहम फैसला लेते हुए उस अस्थायी छूट (वेवर) की अवधि बढ़ा दी है, जिसके तहत पहले से समुद्र में मौजूद रूसी तेल की खेपों की डिलीवरी प्रतिबंधों के बावजूद जारी रह सकेगी। नई समयसीमा 17 जून तक बढ़ाई गई है। इसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो बड़ी मात्रा में रियायती रूसी कच्चा तेल खरीद रहे हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने स्पष्ट किया कि यह छूट केवल उन रूसी तेल खेपों पर लागू होगी जो पहले से जहाजों में लदी हुई हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह कदम वैश्विक कच्चे तेल बाजार को स्थिर रखने और ऊर्जा के लिहाज से संवेदनशील देशों तक तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए उठाया गया है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि रूस अब देश के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो चुका है। शिपिंग एनालिटिक्स फर्म क्लेपर के आंकड़ों के अनुसार, मार्च में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 22.5 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया, जो फरवरी के मुकाबले लगभग दोगुना था। अप्रैल में भी आयात 21 लाख बैरल प्रतिदिन के आसपास बना रहा। फिलहाल भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी तेल खरीद नीति पूरी तरह कीमत और ऊर्जा जरूरतों पर आधारित है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीद वेवर से पहले भी की, वेवर के दौरान भी की और अब भी कर रहा है।
हालांकि, अमेरिका की ओर से बार-बार अल्पकालिक छूट बढ़ाए जाने से बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। तेल कंपनियों के लिए लंबी अवधि की योजना बनाना और शिपिंग प्रबंधन करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इसके बावजूद भारत पश्चिमी प्रतिबंधों और अपनी ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहा है।

