नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को सोमवार को एक और बड़ा झटका लगा। इस बार ये संसद से आया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रे ने राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। साथ ही उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में पहले ही पार्टी अपने विधायकों के एक बड़े गुट की ओर से बगावत से जूझ रही है।
अपने इस्तीफे में रे ने कहा कि पश्चिम बंगाल की जनता ने 15 वर्षों के शासन के बाद भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों और शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, रोजगार तथा कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में कथित विफलताओं के कारण तृणमूल कांग्रेस को नकार दिया है। उन्होंने विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन को ऐतिहासिक जनादेश बताया और कहा कि वह जनता के फैसले का सम्मान करते हुए टीएमसी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे रहे हैं।
रे का इस्तीफा पार्टी नेतृत्व के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। हाल ही में उन्होंने चेतावनी दी थी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में दिखाई दे रही असंतोष की लहर संसद तक भी पहुंच सकती है।
दरअसल, कुछ दिन पहले ही तृणमूल कांग्रेस के 80 में से लगभग 60 विधायकों ने निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता मानने का समर्थन किया था। इस घटनाक्रम ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी थी और पहले आशंका जताई जा रही थी कि इसी तरह की बगावत सांसदों के बीच भी देखने को मिल सकती है।
सुखेंदु शेखर रे का इस्तीफा अब पार्टी के भीतर चल रहे संकट का एक और बड़ा असर माना जा रहा है, जिसकी आंच तृणमूल सांसदों तक पहुंच चुकी है।
इस्तीफे के बाद क्या बोले सुखेंदु शेखर रे?
इस्तीफा देने के बाद रे ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर की संदिग्ध मौत मामले का जिक्र करते हुए अपने पुराने आरोप दोहराए। उन्होंने कहा, ‘मैंने पुलिस आयुक्त और आरजी कर के प्रिंसिपल से हिरासत में पूछताछ की मांग की थी। आज भी मेरा मानना है कि सबूतों से छेड़छाड़ में उनकी मुख्य भूमिका थी।’
उन्होंने आगे कहा, ‘उसी समय मुझे एहसास हो गया था कि टीएमसी का पतन निकट है। आरजी कर की घटना ने पार्टी के खिलाफ बड़े पैमाने पर जनआक्रोश पैदा किया, लेकिन नेतृत्व ने कभी यह आत्ममंथन नहीं किया कि जनता उनसे क्यों दूर हो रही है। टीएमसी का लोगों से जुड़ाव टूट चुका है।’
माना जाता है कि आरजी कर आंदोलन के दौरान ही रे और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद गहराने लगे थे। हालांकि, इसके बावजूद कई अहम मुद्दों पर वह पार्टी नेतृत्व के साथ खड़े दिखाई दिए थे। जब ममता बनर्जी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, तब भी रे उनके साथ थे।
टीएमसी से रहा लंबा जुड़ाव
सुखेंदु शेखर रे पहली बार 2011 में राज्यसभा पहुंचे थे। तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें लगातार तीन बार राज्य सभा के लिए नामित किया। वर्षों तक वह पार्टी के प्रमुख संसदीय चेहरों में शामिल रहे।
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जब ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ रही थीं, तब रे को भी वहां भेजा गया था। हालांकि, उस समय यह आरोप लगा था कि पार्टी नेतृत्व ने उनकी राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। बहरहाल, 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद रे ने सोशल मीडिया के जरिए खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने भ्रष्टाचार समेत कई मुद्दों पर पार्टी की तीखी आलोचना की थी।
उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों के बाद पार्टी नेतृत्व और उनके बीच बढ़ती दूरी की अटकलें लगाई जा रही थीं। अब राज्यसभा और पार्टी दोनों से उनके इस्तीफे ने उन अटकलों पर मुहर लगा दी है। सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर से और भी इस्तीफे सामने आ सकते हैं, जिससे तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
यह भी पढ़ें- फाल्टा के ‘पुष्पा’…TMC के पूर्व विधायक जहांगीर खान नेपाल बॉर्डर के पास गिरफ्तार

