नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 जुलाई) को केंद्र सरकार के 2021 के ऑफिस मेमोरैंडम (OM) को रद्द कर दिया। इस मेमोरैंडम में उन प्रोजेक्ट्स को पिछली तारीख से एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस (EC) देने का नियम बनाया गया था, जो पहले से एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस लिए बिना ही शुरू हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के तहत अब प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले पर्यावरण मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल पंचोली की बेंच ने साफ किया कि केंद्र सरकार के पास असाधारण मामलों में जनहित में ‘उचित और सीमित दायरे वाली माफी की अधिसूचना’ जारी करके ‘एक्स पोस्ट फैक्टो’ (बाद में मंजूरी) या पिछली तारीख से मंजूरी देने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने हालांकि कहा कि ऐसा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 3 के तहत वैध संशोधन नोटिफिकेशन के जरिए ही किया जाना चाहिए न कि ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए।
खास बात यह है कि कोर्ट ने पाया कि 2021 के OM ने 2006 के एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) नोटिफिकेशन की जगह ले ली थी जो प्रोजेक्ट्स के लिए पहले से EC लेना जरूरी बनाता है।
बताते चलें कि 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम एक प्रशासनिक आदेश है और यह उन प्रोजेक्ट्स के लिए पर्यावरण मंजूरी (EC) देने की एक स्थायी व्यवस्था बनाता है जिन्हें पहले EC लिए बिना शुरू किया गया था। यह 2006 के नोटिफिकेशन के तहत EC देने के लिए जांच के तरीके और मानदंडों, दोनों में काफी बदलाव करता है। इस तरह 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम एक प्रशासनिक निर्देश के जरिए डेलिगेटेड लेजिस्लेशन (सौंपे गए कानून) की जगह ले लेता है जो कानून के अनुसार मान्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि 2006 के EIA नोटिफिकेशन के तहत पहले से EC (पर्यावरण मंजूरी) लेना आम तौर पर जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी उचित नोटिफिकेशन के जरिए इसमें बदलाव न किया जाए तब तक इसमें ‘एक्स-पोस्ट-फैक्टो’ (काम शुरू होने के बाद मिलने वाली) EC देने या ऐसे प्रोजेक्ट्स को बनाए रखने की कोई गुंजाइश नहीं है, जिनका निर्माण या कामकाज वैध EC के बिना शुरू हो गया हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 2021 के OM (ऑफिस मेमोरेंडम) में जिस “हमेशा चलने वाली माफी योजना” (perpetual amnesty scheme) की परिकल्पना की गई थी वह भारत के पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और उसके तहत जारी 2006 के EIA नोटिफिकेशन में दी गई मंजूरी की सीमा से बाहर थी।
2021 के OM (ऑफिस मेमोरैंडम) को किया रद्द
इसलिए कोर्ट ने 2021 के OM को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। हालांकि कोर्ट ने पिछली तारीख से मंजूरी (retrospective clearances) के मामले में 2017 में जारी एक नोटिफिकेशन को सही ठहराया। कोर्ट ने बताया कि संशोधन वाला यह नोटिफिकेशन खास मकसद के लिए और एक तय समय-सीमा वाला नियम (delegated legislation) था जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 और जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 21 के तहत आता है।
खास बात यह है कि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी साफ कर दिया कि आज के फैसले का असर उन प्रोजेक्ट्स पर अपने-आप नहीं पड़ेगा जिन्हें 2021 के OM या 2017 के नोटिफिकेशन का फायदा मिला है।
कोर्ट ने हालांकि आदेश दिया कि 2017 के नोटिफिकेशन या 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत पर्यावरण मंजूरी (EC) के लिए अब कोई और आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अदालत ने केंद्र को यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में पिछली तारीख से लागू होने वाली (retrospective) EC न दी जाए जब तक कि 1986 के एक्ट की धारा 3 के तहत इसके लिए कोई खास नोटिफिकेशन जारी न किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि आज का उसका फैसला सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करके उचित मामलों में ‘एक्स पोस्ट फैक्टो’ (काम हो जाने के बाद दी जाने वाली) पर्यावरण मंजूरी देने से नहीं रोकेगा।
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वनशक्ति मामले में दायर की गई समीक्षा याचिका
गौरतलब है कि अदालत का यह फैसला ‘वनशक्ति’ मामले में दायर एक समीक्षा याचिका (Review Petition) पर आया है जो पिछली तारीख से लागू होने वाली पर्यावरण मंजूरी (EC) देने से जुड़ा था।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के उस फैसले से जुड़ा है जिसमें पिछली तारीख से EC (पर्यावरण मंज़ूरी) देने की इजाजत दी गई थी। इससे पहले मई 2025 में ‘वनशक्ति बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि कोई भी प्रोजेक्ट पहले मंजूरी लिए बिना कानूनी तौर पर शुरू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने उस समय कहा था कि पिछली तारीख से मंजूरी देना पर्यावरण कानून और संवैधानिक सिद्धांतों, दोनों का उल्लंघन है। इसलिए कोर्ट ने 2017 के नोटिफिकेशन और 2021 के OM (आधिकारिक ज्ञापन) को रद्द कर दिया जिनमें पिछली तारीख से EC देने की इजाजत दी गई थी।
हालांकि नवंबर 2025 में कोर्ट ने मई 2025 के फैसले के खिलाफ एक रिव्यू पिटीशन को मंजूरी दे दी जिससे पुराने समय से लागू होने वाली ECs (पर्यावरण मंजूरी) फिर से बहाल हो गईं। यह फैसला ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स ऑफ इंडिया’ (CREDAI) की रिव्यू पिटीशन पर सुनाया गया था। उन्होंने तर्क दिया था कि उस फैसले से रियल एस्टेट इंडस्ट्री और उससे जुड़े दूसरे सेक्टरों को काफी परेशानी हो रही थी।
वनशक्ति ने नवंबर 2025 के इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की जिसमें पहले से दी गई मंजूरी की अनुमति देने वाली किसी भी व्यवस्था का विरोध किया गया था।
आज अपने फैसले में अदालत ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन को रद्द कर दिया लेकिन 2017 की अधिसूचना की वैधता को बरकरार रखा। अदालत के फैसले में केंद्र सरकार को भविष्य में पूर्व आयोग व्यवस्था में अपवादों की अनुमति देने का भी प्रावधान है बशर्ते यह वैध रूप से प्रस्तुत संशोधन अधिसूचना के माध्यम से किया जाए, न कि कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से।
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