नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 24 नवंबर को केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस जारी करते हुए उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें आयकर अधिनियम के उस प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई है जो 2000 रुपये से कम का “गुमनाम” नकद दान प्राप्त करने की अनुमति देता है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि पारदर्शिता की यह कमी चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता को कमजोर करती है क्योंकि यह मतदाताओं को राजनैतिक धन के स्रोत, जिसमें दानकर्ता और उनके स्रोत शामिल हैं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित करती है। इससे वे वोट डालते समय तर्कसंगत, बुद्धिमानी और पूरी तरह से सूचित निर्णय लेने से वंचित रह जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को भेजा नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य को नोटिस भेजकर याचिका के संबंध में जवाब मांगा है। याचिका में चुनाव आयोग को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वह किसी राजनैतिक दल के पंजीकरण और चुनाव चिन्ह के आवंटन के लिए एक शर्त के रूप में निर्धारित करे कि कोई भी राजनैतिक दल नकद में कोई राशि नहीं प्राप्त कर सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी। इस याचिका में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13 ए के खंड डी को असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द करने की मांग की। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 2024 के उस फैसले का भी जिक्र किया है जिसमें चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से वकील जयेश के. उन्नीकृष्णन ने दायर याचिका में कहा “याचिकाकर्ता यह निर्देश देने की मांग कर रहा है कि राजनीतिक दल किसी भी राशि का भुगतान करने वाले व्यक्ति का नाम और अन्य सभी विवरण उजागर करें और कोई भी राशि नकद में प्राप्त न की जाए ताकि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता बनी रहे।”
आयकर अधिनियम की धारा 13 ए राजनैतिक दलों की आय से संबंधित विशेष प्रावधानों का विवरण देती है। याचिका में कहा गया है कि अधिनियम में धारा 13ए को शामिल किया गया था और किसी राजनीतिक दल को प्रतिभूतियों पर ब्याज, गृह संपत्ति से आय या अन्य स्रोतों से प्राप्त आय और स्वैच्छिक योगदान के माध्यम से प्राप्त किसी भी आय को कुल आय की गणना से छूट दी गई है।
याचिका में क्या मांग की गई?
याचिका में चुनाव आयोग को सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों की फॉर्म 24 ए अंशदान रिपोर्ट की जांच करने और उनसे प्राप्त अंशदान राशि जमा कराने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसके लिए पता और पैन नंबर नहीं दिया गया है।
इसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग को चुनाव चिन्ह आदेश, 1968 के तहत चूककर्ता राजनैतिक दलों को नोटिस जारी करने निर्देश जारी किया जाना चाहिए कि निर्धारित अवधि के भीतर पूर्ण विवरण के साथ फॉर्म 24 ए अंशदान रिपोर्ट जमा न करने पर आरक्षित चिन्ह को निलंबित या वापस क्यों न लिया जाए?
याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाना चाहिए कि सभी राजनीतिक दलों के खाते निर्धारित प्रारूप में रखे जाएँ और उसके द्वारा नियुक्त स्वतंत्र लेखा परीक्षकों द्वारा उनका लेखा-परीक्षण किया जाए।
इसमें केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को पिछले पांच वर्षों के आयकर अधिनियम की धारा 142 और 143 के तहत राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल किए गए आयकर रिटर्न और लेखा परीक्षा रिपोर्टों की जांच करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
इस याचिका में यह भी मांग की गई कि सीबीडीटी को आयकर अधिनियम की धारा 13 ए और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 सी की आवश्यकताओं का पालन न करने पर जुर्माना और अभियोजन के लिए उचित कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29सी राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त दान की घोषणा से संबंधित है।

