नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 12 दिसंबर को केंद्र सरकार से एक याचिका के संबंध में जवाब मांगा है जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की संपत्ति जब्त करने की शक्ति को चुनौती दी गई है। कर्नाटक के एक मौजूदा विधायक ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसमें ईडी को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत बिना न्यायिक जांच के संपत्ति जब्त करने की शक्ति को चुनौती दी है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने शु्क्रवार को इस याचिका पर सुनवाई के दौरान एक नोटिस जारी किया है और इसे पीएमएलए की न्याय प्रक्रिया की संवैधानिकता पर सवाल उठाने वाले लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया।
ईडी द्वारा जब्त की गई संपत्ति वैध या अवैध
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई चिंताओं में से एक यह है कि ईडी द्वारा संपत्ति की जब्ती वैध है या नहीं, इसकी जांच करने के लिए नियुक्त न्याय निर्णायक प्राधिकरण न्यायिक पृष्ठभूमि से नहीं आता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की कि अधिनियम (पीएमएलए) में “कुछ खामी” प्रतीत होती है और सवाल उठाया कि कैसे एक गैर-न्यायिक सदस्य संपत्ति के अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों से जुड़े जटिल मामलों का फैसला कर सकता है।
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा की गई सभी प्रार्थनाओं पर नोटिस जारी किया है जिनमें न्यायनिर्णय प्राधिकारी की संरचना और पीएमएलए की धारा 20 और 21 की वैधता को चुनौती देने वाली प्रार्थनाएं भी शामिल हैं। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि इस मामले की सुनवाई पीएमएलए की धारा 6 की वैधता से संबंधित लंबित मामलों के साथ ही की जाए।
सुनवाई के दौरान विधायक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और रंजीत कुमार उपस्थित हुए और उन्होंने तर्क दिया कि कानून के प्रावधान ईडी को जवाबदेही से मुक्त होकर कार्य करने की अनुमति देते हैं, जिससे सत्ता का व्यापक दुरुपयोग होता है।
रोहतगी ने न्यायालय को बताया कि चुनौती दोहरी है – पहली, पीएमएलए की धारा 20 और 21 को लेकर, जो ईडी को बिना कारण बताए 180 दिनों तक संपत्ति और अभिलेखों को अपने पास रखने की अनुमति देती हैं और दूसरी – पीएमएलए निर्णायक प्राधिकरण की संरचना को लेकर जिसमें वर्तमान में केवल एक सदस्य है जो न्यायिक पृष्ठभूमि से नहीं है।
इस मामले में याचिका कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के विधायक ने दायर की है। उन्होंने याचिका में आरोप लगाया कि बैंक खातों, सावधि जमा, आभूषण और वाहनों सहित उनकी सभी संपत्तियों को ईडी द्वारा बिना कोई कारण बताए या कार्रवाई को चुनौती देने का अवसर दिए बिना जब्त या फ्रीज कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि इस तरह की व्यापक शक्तियों से ईडी को न्यायिक जांच शुरू होने से पहले कम से कम छह महीने तक बेरोकटोक काम करने की छूट मिल जाती है।
प्रवर्तन निदेशालय की वेबसाइट से लिए गए हैं आंकडे़
उन्होंने बताया कि पूरे देश में केवल एक ही व्यक्ति – एक कॉस्ट अकाउंटेंट – निर्णायक प्राधिकारी के रूप में कार्य कर रहा है और उसने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों द्वारा की गई लगभग 99 प्रतिशत कुर्क और रोक को मंजूरी दे दी है।
उन्होंने आगे कहा कि ये आंकड़े प्रवर्तन निदेशालय की अपनी वेबसाइट से लिए गए हैं जिससे पता चलता है कि प्राधिकरण बिना सोचे-समझे केवल एक “अनुमोदन निकाय” के रूप में कार्य कर रहा है।
इस याचिका के मुताबिक, यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है। इसमें तर्क दिया गया है कि ईडी प्रभावित व्यक्ति को कोई लिखित “विश्वास करने के कारण” बताए बिना 180 दिनों तक संपत्ति जब्त, फ्रीज और अपने पास रख सकती है जिससे उन्हें उस महत्वपूर्ण अवधि के दौरान कानूनी सहायता प्राप्त करने से रोका जा सकता है।
याचिका में आगे यह भी बताया गया है कि कानून में 180 दिनों के बाद ही न्यायनिर्णय का प्रावधान है जब ईडी संपत्ति को अपने पास रखने की अवधि बढ़ाने के लिए न्यायनिर्णय प्राधिकारी से आवेदन करती है। तब तक कार्रवाई की वैधता की जांच करने के लिए कोई मंच नहीं है।
याचिका में यह भी मांग की गई कि पीएमएलए न्यायनिर्णय प्राधिकरण की प्रत्येक पीठ में कम से कम एक न्यायिक सदस्य शामिल होना चाहिए।

