नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (4 अगस्त) को केंद्र सरकार और इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) को एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का निर्देश दिया। इसके तहत ऐसी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया जिससे बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों को पेट्रोल पंपों पर ईंधन देने से इंकार किया जा सके।
अदालत ने इसके साथ ही ऐसे तकनीक पर आधारित ऐसा सिस्टम तैयार करने का आदेश दिया जिससे ऐसे वाहनों की अपने-आप पहचान कर उनपर जुर्माना लगाया जा सके।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार की पीठ ने सुनवाई के दौरान कई दिशा-निर्देश जारी किए। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों के खतरों को कम करने के लिए और सड़क दुर्घटना से पीड़ितों के लिए समय पर मुआवजा हेतु ये निर्देश जारी किए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने बिना इंश्योरेंस वाली गाड़ियों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों में बिना इंश्योरेंस वाली गाड़ियों के लिए ऑटोमैटिक ई-चालान बनाने के लिए ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को इंश्योरेंस डेटाबेस से जोड़ना, ट्रैफिक पुलिस को इंश्योरेंस स्टेटस की तुरंत जांच के लिए हैंडहेल्ड डिवाइस देना, नई गाड़ियों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की अवधि बढ़ाना और पुराने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों का तेजी से निपटारा करना शामिल है।
अदालत ने यह पाया कि भारत की सड़कों पर चलने वाले करीब 56 फीसदी वाहन बिना इंश्योरेंस के हैं। पीठ ने कहा कि इसके चलते सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा देने का कानूनी सुरक्षा उपाय अक्सर ” देरी का शिकार हो जाता है या विफल हो जाता है। ” इससे पीड़ितों और उनके परिवारों को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
अदालत ने कहा कि ” मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत अनिवार्य बीमा का मकसद सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा दिलाना ही नहीं है, बल्कि यह भी है कि उन्हें लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवादों में न पड़ना पड़े। “

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और IRDAI को एक पायलट प्रोजेक्ट की जांच करने का निर्देश दिया जिसके तहत ईंधन की सप्लाई को वाहन के बीमा स्टेटस से जोड़ा जाएगा। बेंच ने आदेश दिया कि ” अगर ऐसा नहीं होता है तो संबंधित वाहन को पेट्रोल पंपों पर तब तक ईंधन नहीं दिया जाएगा जब तक कि उसका वैध बीमा न हो जाए। ” पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सैद्धांतिक रूप से इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं जताई है।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की व्यवस्था से बिना बीमा और बिना पंजीकरण वाले वाहनों की पहचान करने में मदद मिलेगी और मालिकों को वैध बीमा बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा। पीठ ने सुझाव दिया कि इस परियोजना को एएनपीआर कैमरों का उपयोग करके लागू किया जा सकता है।
नए वाहनों के लिए थर्ड पार्टी इंश्योरेंस को बढ़ाने का निर्देश
अदालत ने इस दौरान मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 196 में प्रस्तावित संशोधन को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया। इस संशोधन में केंद्र सरकार की ओर से नोटिफाई किए जाने के बाद बिना इंश्योरेंस वाले वाहन चलाने पर भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान है।
नई गाड़ियां खरीदने वालों के लिए एक अहम बदलाव करते हुए पीठ ने आदेश दिया कि नई प्राइवेट कारों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस कवर को तीन साल से बढ़ाकर चार साल और नई दो-पहिया गाड़ियों के लिए पांच साल से बढ़ाकर छह साल किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि IRDAI और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल की सलाह के बावजूद वह इस अवधि को एक साल बढ़ा रही है क्योंकि सड़क सुरक्षा के हित में यह कदम जरूरी था।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के ‘एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ (2018)’ मामले में दिए गए उस फैसले पर आधारित है जिसमें नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के समय लंबे समय के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस को अनिवार्य किया गया था।
इस फैसले से मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी के स्ट्रक्चर में भी बड़े बदलाव होंगे। IRDAI के प्रस्ताव को मानते हुए कोर्ट ने एक समान चार-स्तरीय फ्रेमवर्क लागू करने का निर्देश दिया है। इसमें एक अनिवार्य थर्ड-पार्टी पॉलिसी; गाड़ी में बैठे लोगों और पीछे बैठने वालों (पिलियन राइडर्स) के लिए कानूनी देनदारी (लीगल लायबिलिटी) का वैकल्पिक कवर; मालिक, ड्राइवर और गाड़ी में बैठे लोगों के लिए वैकल्पिक पर्सनल एक्सीडेंट कवर; और गाड़ी के अपने नुकसान (ओन-डैमेज) के लिए वैकल्पिक कवर शामिल हैं।

