नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (14 मई) को सबरीमाला मंदिर मामले में फैसला सुरक्षित रखा है। मामले की सुनवाई 16 दिनों तक चली। इस मामले में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सात व्यापक कानूनी प्रश्न शामिल है। केरल स्थित सबरीमाला मामले की सुनवाई सात जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंद्रेश, जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस आगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ इस मामले में सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में फैसला रखा सुरक्षित
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले से संबंधित है जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इस फैसले ने मासिक धर्म वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश पर रोक वाली प्रथा को समाप्त कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के अपने फैसले के खिलाफ दायर पुनर्याचिकाओं पर नवंबर 2019 में फैसला सुनाया था। अदालत ने हालांकि इस दौरान कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया था। इसके बजाय, इसने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित सात बड़े प्रश्न निर्धारित किए, जिन पर न्यायालय की एक वरिष्ठ पीठ विचार करेगी।
इनमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता के अधिकार के बीच परस्पर संबंध पर निर्णय लेना शामिल था।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने क्या तर्क दिए?
आज (14 मई) की सुनवाई वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी द्वारा जवाब देने के साथ शुरू हुई, जिन्होंने पारसी समुदाय की धार्मिक प्रथाओं से संबंधित तर्क प्रस्तुत किए। गौरतलब है कि इस संदर्भ निर्णय (रेफरेंस जजमेंट) का पारसियों के बीच बहिष्कार की प्रथाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है। न्यायालय के समक्ष उपस्थित लोगों में एक पारसी महिला भी शामिल है। महिला ने एक हिंदू पुरुष से विवाह करने के बाद पारसी समुदाय द्वारा उसके बहिष्कार को चुनौती दी थी।

रोहतगी ने हालांकि आज सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया कि बहिष्कार करने का चलन अब प्रचलित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि “पिछले पचहत्तर वर्षों में वास्तव में कोई बहिष्कार नहीं हुआ है। ऐसा नहीं है कि कोई मनमानी या शैतानी सत्ता लगातार यह धमकी देती रहती है कि ‘मैं इस व्यक्ति को बहिष्कृत कर दूंगा’ या ‘मैं उस व्यक्ति को बहिष्कृत कर दूंगा’। दशकों से ऐसा कुछ नहीं हुआ है।”
इस मामले में पेश हुए अन्य वकीलों ने क्या दलील दी?
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने तर्क दिया कि धर्म और धार्मिक संप्रदाय में अंतर होता है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि धार्मिक अधिकारों या किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा अपेक्षाकृत सीमित है।
वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने भी धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के सीमित दायरे पर तर्क दिया। उन्होंने किसी धार्मिक प्रथा को जारी रखने की अनुमति निर्धारित करने के लिए आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के परीक्षण को प्रमुख कारक के रूप में उपयोग करने का विरोध किया।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अपने जवाब की शुरुआत ‘हिंदू धर्म एक जीवन शैली है’ इस अभिव्यक्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए की।
उन्होंने कहा कि “ हिंदू धर्म एक धार्मिक दर्शन भी है। यह एक गहन रूप से विकसित सामाजिक संरचना भी है। यह इस बात से संबंधित है कि मनुष्य सृष्टिकर्ता से कैसे संबंध रखता है अस्तित्व को कैसे समझा जाता है। इसमें मानव जीवन और इस संसार में अस्तित्व के अर्थ से संबंधित प्रश्न शामिल हैं। मैं आपसे विनम्रतापूर्वक आशा करता हूं कि आप हिंदू धर्म को केवल एक जीवन शैली तक सीमित न करें। ”
उन्होंने आगे तर्क दिया कि धार्मिक संप्रदायों को अनुच्छेद 26 के तहत विशेष अधिकार दिए गए हैं। उन्होंने इस विचार का विरोध किया कि अनुच्छेद 25 के तहत सामाजिक सुधार के हित में धार्मिक मामलों पर कानून बनाने के लिए राज्य को सक्षम बनाने वाले खंड का उपयोग अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों को प्रतिबंधित करने के लिए किया जा सकता है।
आस्था और तर्कशक्ति में बड़ा अंतर
बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) सीनियर एडवोकेट के परमेश्वर ने सीनियर एडवोकेट सुब्रमणियम की इस दलील का समर्थन किया कि धार्मिक अधिकारों की वैधता का मूल्यांकन तर्कसंगतता जैसे कारकों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने दलील देते हुए कहा कि “आस्था और तर्कशक्ति में बहुत बड़ा अंतर है। जैसे ही आप तर्कशक्ति को बीच में लाते हैं, अनुच्छेद 25 और 26 संविधान से बाहर हो जाते हैं, सभी सम्मान के साथ।”
इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि लोगों की स्वतंत्रता या गरिमा को बनाए रखने के लिए ऐसा हस्तक्षेप आवश्यक हो तो न्यायालय धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान जजों ने भी टिप्पणियां कीं और वकीलों ने जिरह की। सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा।
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