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अनिकेतः हिमालय की गोद में जलता एक दीप- कौसानी का सुमित्रानंदन पंत का घर

लेखक हमेशा से अनिकेत होते हैं। उनका कोई एक निश्चित घर नहीं होता और सारी दुनिया उनके लिए उनका घर होती है। फिर भी वो कोई एक ठौर तो होता ही है जीवन में, जहां वे जीते हैं, लिखते हैं, जहां उनका मन रमता है। लेखकों के होते हुये और लेखकों के बाद भी उनके इन्हीं घरों की कहानी है ‘अनिकेत’। आज इस स्तंभ में छायावाद के प्रमुख स्तम्भ सुमित्रानंदन पंत के कौसानी स्थित पैतृक घर की चर्चा कर रहे हैं।

कौसानी में स्थित पंत जी का यह घर केवल अतीत का अवशेष नहीं है; वह हिंदी भाषा की आत्मा में बचा हुआ एक उजला कक्ष है। वहाँ जाकर महसूस होता है कि कविता वास्तव में मनुष्य के भीतर बची हुई मनुष्यता का दूसरा नाम है। हिमालय की श्वेत निस्तब्धता, देवदारों की गंध, खिड़की पर ठहरी धूप, पुराने काग़ज़ों की पीली होती सतहें, काँच की अलमारियों में रखी पांडुलिपियाँ, और उन्हें चुपचाप सँभालते लोग- ये सब मिलकर उस कवि की उपस्थिति रचते हैं जिसने हिंदी कविता को सबसे कोमल स्पर्शों में से एक दिया।

कौसानी कोई जगह, भर नहीं, वह हिंदी कविता की स्मृति में बसा हुआ एक धुंधला उजाला है। एक ऐसा भू-दृश्य, जहाँ बादल कविता की तरह उतरते हैं, हवा किसी अदृश्य वीणा के तार छेड़ती है और हिमालय अपने श्वेत मौन में मनुष्य की समूची क्षणभंगुरता को निहारता रहता है। उसी कौसानी में, देवदारों और चीड़ों की सुगंध के बीच, एक पत्थर का पुराना घरआज भी खड़ा है- शांत, संकोची और समय की धूल से अंटा हुआ। पारंपरिक पहाड़ी शैली से निर्मित, लकड़ी और चूने की बनावट वाला यह घर यह वही घर है, जहाँ छायावाद के सबसे कोमल, सबसे सौंदर्य-संपन्न कवियों में एक, सुमित्रानंदन पंत ने पहली बार इस संसार को देखा था। उनके जन्म का वह कमरा आज तक वहां वैसे ही सुरक्षित और संरक्षित है।

इस घर तक पहुँचते हुए लगता है मानो हम किसी कविता की देह में प्रवेश कर रहे हों। सड़क धीरे-धीरे ऊपर उठती है, और हर मोड़ पर हिमालय अपनी आकृति बदलता जाता है। दूर-दूर तक फैली पर्वतमालाएँ, उनके पीछे बर्फ़ से ढकी नंदा देवी की चोटियाँ और उनके बीच कहीं वह घर- सादा, शांत, प्राचीन और लगभग आत्मलीन। जो किसी धरोहर या स्मारक की तरह स्वयं को प्रदर्शित नहीं करता; बल्कि वह अपनी उपस्थिति को वैसे ही बचाए हुए है, जैसे कोई वृद्ध व्यक्ति अपने भीतर बची हुई अंतिम रोशनी और सांसों को सहेजे रखना चाहता है।

पंत ने लिखा था-

‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?’

इन पंक्तियों को याद करते हुए हम जब कौसानी के उस घर के बरामदे में खड़े होते हैं, तब समझ में आता है कि पंत के लिए प्रकृति केवल दृश्य नहीं थी; वह उनकी पहली माँ थी, पहला स्पर्श, पहला संगीत। जन्म के कुछ ही घंटों बाद माँ के चले जाने की रिक्तता शायद इसी प्रकृति ने भरी थी। इसलिए उनकी कविताओं में पेड़, बादल, हिम, पवन, फूल और उजाला किसी निर्जीव वस्तु की तरह नहीं आते; वे आत्मीय-जीवितों की तरह उपस्थित रहते हैं।

कौसानी का यह घर भी उसी आत्मीयता का विस्तार है। पत्थरों से बना, ढलवाँ छत वाला यह घर बाहर से जितना साधारण दिखाई देता है, भीतर उतना ही भाव-सघन है। लकड़ी की पुरानी चौखटें हैं, जिन पर समय की उँगलियों के निशान दर्ज हैं। संकरी सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती हैं। छोटे-छोटे कमरे हैं, जिनमें कभी एक बालक ने हिमालय को खिड़की से देखते हुए भाषा के भीतर प्रकाश भरना सीखा होगा।

Stone house with a green scalloped awning, brown door and window, and a distant mountain valley. (outdoor scene)

आज यह घर ‘सुमित्रानंदन पंत राजकीय संग्रहालय’ के रूप में संरक्षित है, लेकिन भीतर प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज़ मन को छूती है, वह किसी संग्रहालय की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक जीवित घर की आत्मीयता है। वहाँ एक गहरी, लगभग ध्यानमग्न शांति पसरी रहती है। यह वैसी निस्तब्धता नहीं जो निर्जीव इमारतों में होती है; यह वैसी शांति है जो केवल उन घरों में बची रहती है, जहाँ स्मृतियाँ अब भी साँस लेती हों। दीवारों पर पंत के दुर्लभ छायाचित्र टँगे हैं। कहीं अधूरी पंक्तियाँ, कहीं काटे गए शब्द, कहीं हाशिए पर लिखे नोट्स। कहीं उनका चश्मा रखा है, कहीं शॉल, कहीं एक पुराना दीपक। वहाँ उनकी पुस्तकों के पुराने संस्करण हैं- ‘पल्लव’, ‘वीणा’, ‘ग्राम्या’, ‘युगांत’, ‘चिदंबरा। इन वस्तुओं को देखते हुए बार-बार यह अनुभूति होती है कि महानता दरअसल कितनी साधारण चीज़ों के बीच जन्म लेती है। और ऐसा लगता है मानो कवि अभी थोड़ी देर पहले ही उठकर बाहर गया हो और लौटकर फिर इन्हीं पन्नों पर झुक जाएगा।

पंत की कविता का आरंभिक स्वर प्रकृति-सौंदर्य और कोमल रोमानी अनुभूतियों से बना था। हिंदी कविता में उन्होंने प्रकृति को जिस तरह जीवंत किया, वह अद्वितीय है। निराला ने एक बार कहा था कि पंत उपमाओं और रूपकों से कविता को संगीतात्मक बना देते हैं। यह सच भी है- उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे हम कोई दृश्य नहीं, एक बहती हुई रोशनी पढ़ रहे हों।

कौसानी की सुबहें उनकी सबसे बड़ी गुरु थीं। सूर्योदय के समय जब हिमालय की चोटियाँ सुनहरी हो उठती हैं, तब पूरा आकाश मानो किसी दिव्य राग से भर जाता है। वही राग पंत की कविता में उतर आया था-

‘प्रथम रश्मि का आना रंगिणी, तूने कैसे पहचाना?’

यह प्रश्न केवल प्रकृति से नहीं है; यह स्वयं सर्जक से सृजन का पूछा गया प्रश्न है। पंत की कविता में प्रकाश हमेशा बाहर से भीतर आता है। उनकी कविता पाठक को भी उजाले की ओर ले जाना चाहती है।

Mountain valley under a blue sky with scattered clouds; forested hillside on the right and small buildings at the bottom left.

घर के बरामदे में खड़े होकर दूर दिखाई देती नंदा देवी की शृंखलाएँ किसी विराट मौन की तरह फैली रहती हैं। बादल कभी उनके कंधों पर उतर आते हैं, कभी वे बिल्कुल निर्मल दिखाई देती हैं। यही दृश्य पंत के भीतर कविता बनाते और पनपाते रहे होंगे। यह संयोग नहीं कि उनकी काव्य-संवेदना में हिमालय बार-बार लौटता है। हिमालय उनके लिए केवल भूगोल नहीं था; वह उनकी आत्मा का विस्तार था।

कहा जाता है कि बचपन में पंत घंटों प्रकृति को देखते रहते थे। पेड़ों के पत्तों की हलचल, दूर से आती पशुओं की घंटियों की आवाज़, धूप का धीरे-धीरे पहाड़ियों पर उतरना- ये सब उनके भीतर भाषा का संगीत बनते गए। शायद इसीलिए उनकी कविता में ध्वनियाँ भी दृश्य की तरह चमकती हैं।

पंत की कविता की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह मनुष्य को अधिक संवेदनशील बनाती है। वह हमें प्रकृति के प्रति विनम्र होना सिखाती है। वह बताती है कि सौंदर्य केवल देखने की चीज़ नहीं; महसूस करने की क्षमता है।

पंत ने लिखा था-

‘सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर, मानव! तुम सबसे सुन्दरतम।’

यह पंक्ति उनके समूचे काव्य-दर्शन का सार है। प्रकृति से आरंभ होकर उनकी कविता अंततः मनुष्य तक पहुँचती है। कौसानी का वह घर भी यही यात्रा तय करता है- पहाड़ से मनुष्य तक, स्मृति से संवेदना तक।

Two adults sit side by side on outdoor concrete steps, with a plaque behind them in a courtyard setting.

आज जब दुनिया लगातार अधिक शोर, अधिक गति और अधिक कृत्रिमता की ओर बढ़ रही है, तब पंत का घर एक विरल विराम की तरह दिखाई देता है। वहाँ जाकर लगता है कि कविता अभी मरी नहीं है। भाषा अब भी हवा में तैर सकती है। एक पुराना घर अब भी मनुष्य को भीतर से बदल सकता है।

समकालीन समय की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही है कि मनुष्य ने प्रकृति को दृश्य में बदल दिया है, अनुभव में नहीं। पहाड़ अब ‘डेस्टिनेशन’ हैं, नदियाँ ‘स्पॉट’ हैं, और हिमालय एक ‘सेल्फ़ी बैकग्राउंड’। ऐसे समय में पंत की कविता हमें फिर से देखना सिखाती है। वह प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं बनने देती। उनकी कविता में पेड़ केवल पेड़ नहीं, जीवित उपस्थिति हैं; बादल केवल बादल नहीं, मनःस्थिति हैं; और हिमालय केवल ऊँचाई भर नहीं, आत्मा की विराटता है।

शायद इसीलिए पंत की कविता पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि वे केवल प्रकृति के कवि नहीं थे; वे मनुष्य की खोती हुई संवेदना के कवि थे। उनकी कोमलता किसी पलायन की कोमलता नहीं थी, बल्कि उस कठोर समय के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध थी, जिसमें मनुष्य धीरे-धीरे अपनी भीतरी रोशनी खोता जा रहा था।

इस संग्रहालय के भीतर एक कमरा ऐसा है जहाँ बैठकर बाहर की पहाड़ियों को देखा जा सकता है। वहाँ बैठते ही मन में अनायास पंत की पंक्तियाँ उतरती हैं-

‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।’

समय के साथ पंत की कविता बदली भी। वे केवल प्रकृति के कवि नहीं रहे। बाद के वर्षों में उनकी कविता में मनुष्य, समाज, विज्ञान, आधुनिकता और दार्शनिक प्रश्नों की उपस्थिति बढ़ी। लेकिन कौसानी की मिट्टी उनसे कभी अलग नहीं हुई। उनकी भाषा में हमेशा पहाड़ की हवा का एक स्पर्श बना रहा।

आज उस घर की देखभाल सीमित साधनों में होती है। वहाँ मौजूद केयरटेकर आगंतुकों को केवल कमरों और अलमारियों तक नहीं ले जाते, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें पंत की स्मृतियों के भीतर उतारते चलते हैं। वे केवल कर्मचारी नहीं लगते; बल्कि ऐसे लोग प्रतीत होते हैं जो वर्षों की निकटता में स्वयं भी इस विरासत का हिस्सा बन गए हैं। उनकी आवाज़ में एक आत्मीय गर्व सुनाई देता है, जैसे वे किसी सरकारी इमारत नहीं, अपने ही परिवार के किसी बुज़ुर्ग की स्मृतियों की रखवाली कर रहे हों।

हर वस्तु को देखने-जानने की हमारी जिज्ञासा उन्हें प्रश्न करने को विवश करती है- ‘आपलोग साहित्य से जुड़े हैं? मैंने भी हिंदी साहित्य से एम.ए किया है… आमलोगों को अब इतनी दिलचस्पी कहां रहती है, किसी लेखक में या उसके घर में। उनके लिए यह भी एक पर्यटन स्थल है फिर पिकनिक स्पॉट। ऐसा कहती हुई उनकी जल भरी आंखें उन्हें सिर्फ ताले खोलने-बंद करने वेतनशील कर्मचारी नहीं रहने देतीं; बल्कि उन्हें इस जीर्ण विरासत का हिस्सा बना देती हैं। उनकी बातचीत में स्थानीय आत्मीयता है।

वे कहते हैं- हर वर्ष पंत जयंती पर यहाँ साहित्यिक आयोजन होते हैं। जिसमें कवि, छात्र, अध्यापक और साहित्य-प्रेमी पहुँचते हैं। कविताएँ पढ़ी जाती हैं। पंत को याद किया जाता है। लेकिन सच यह है कि पंत को सबसे अधिक उनका यह घर याद करता है, उनकी कविताएँ याद करती हैं।

सचमुच ऐसे लोगों के कारण ही स्मृतियाँ जीवित रहती हैं। बड़े-बड़े सरकारी बोर्ड और योजनाएँ किसी जगह को संरक्षित कर सकती हैं, लेकिन उसकी आत्मा को बचाए रखते हैं वे लोग जो चुपचाप उसके साथ जीते रहते हैं। कौसानी का यह घर भी ऐसे ही कुछ लोगों की सतर्क उपस्थिति से अब तक बचा हुआ है।

Black-framed eyeglasses with clear lenses resting on a light surface.

आज जब हम उस घर में पंत की तस्वीरों को देखते हैं- लंबे बाल, सौम्य चेहरा, आँखों में एक अजीब-सी कोमल उदासी, तब समझ में आता है कि उनकी कविता केवल सौंदर्य की खोज नहीं थी; वह मनुष्य के भीतर बची हुई करुणा को बचाने का प्रयास भी थी।

उनकी प्रसिद्ध कविता ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ पढ़ते हुए कौसानी की बरसात को याद करना स्वाभाविक है-

‘घिर-घिर आए घन सावन के, नभ के नीलम पर्वत पर।’

बारिश के दिनों में जब बादल घर की खिड़कियों तक उतर आती होंगी, तब यह घर किसी वास्तविक जगह से अधिक एक स्वप्न जैसा प्रतीत होता होगा।

पंत ने अपने एक इंटरव्यू में उनकी ही कविता को उद्धृत करते हुए यह पूछे जाने पर कि ‘आपने विवाह क्या सचमुच प्रकृति के मोह में बंधकर नहीं किया? ‘जबाब में कहा था-‘ ऐसा कुछ भी नहीं है। यह कविता तो बहुत बाद की है… सच है कि जिंदगी में कोई कभी इतने करीब नहीं आया। न ही ऐसा कभी कोई मौका आया जीवन में। स्त्री पुरुष की जिंदगी बहुत अलग खानों में बंटी होती है, पहाड़ में। तब तो यह बंटवारा और भी ज्यादा घना और गहरा था…’

पंत ने विवाह नहीं किया था, लेकिन उनके जीवन में एक बच्ची का आगमन हुआ- सुमिता पंत, जिन्हें उन्होंने गोद लिया था। पंत के भीतर जितनी विराट प्रकृति थी, उतनी ही कोमल मानवीय ऊष्मा भी थी, और सुमिता के प्रति उनका स्नेह उसी का प्रमाण है। उन्होंने ‘मेरी प्यारी बेटी सुमिता’ जैसी भावुक कविता लिखी, जिसमें एक कवि का नहीं, एक अत्यंत स्नेहमय पिता का हृदय बोलता है। यह कविता अपने भीतर एक गहरी मानवीय ऊष्मा रखती है कि प्रकृति और सौंदर्य के इतने बड़े कवि के जीवन में एक बच्ची की उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण थी –

मेरी प्यारी बेटी सुमिता –
पाँच साल की
अभी नहीं वह –
कमरे में आ चुपके, मुझको
देख एकटक, बोली,
“दद्दू, मुझे छोड़कर
भला, चले जाओगे क्या तुम ?”
मैंने पूछा,
“क्यों कहती हो ?
कहाँ चला जाऊँगा मैं ?” – वह
चुप रह क्षण-भर, बोली,
“तुम जो मर जाओगे …
विस्मय हुआ मुझे !
वह नहीं समझती अब तक
क्या है मृत्यु ?
सूँघ उसका सिर, बोला हँसकर,
“किसने तुझसे कहा ?
नहीं तो, तुझे छोड़कर
दद्दू भला कहाँ जाएगा ?…

गोद में लेकर उसको
प्यार किया मैंने,
उसका सिर सूँघ, चूमकर !
उसको समझाया,
लिपटाकर सहज गले से,
“बेटा, सभी नहीं मरते –
मैं भी उनमें हूँ
जो न कभी मरते !
मैं नहीं मरूँगा, तुझसे
सच कहता हूँ !”…..

समझ गई वह भाव ह्रदय का
उसे छोड़कर
मैं न कभी मरना चाहूँगा ! –
मरने पर भी
मैं उसका ही बना रहूँगा !
दीर्घ साँस निकली
उसके उर से अनजाने,
सुख संतोष झलक आया…

सुमिता पंत अब जान चुकी होंगी कि सचमुच कुछ लोग कभी नहीं मरते। वे अपनी कृतियों में, कीर्तियों में, अपने घरों में, अपने अपनों में और अपने सदा रहने की जिदों में जिंदा रहते हैं। शायद यही कारण है कि जब तमाम लेखकों के वंशधर उनके घरों को उपेक्षित छोड़ चुके हैं, या फिर उसे निबटा चुकें। अमिताभ बच्चन तक ने अपने बाबूजी के प्रथम घर, सोपान ( यह घर दक्षिण दिल्ली के गुलमोहर पार्क में स्थित था) को बेच दिया। सुमिता पंत रक्त से और वंश से पंत से न जुड़े होने के बावजूद उनके इस धरोहर को संजोये रहीं। वे सचमुच उनकी आत्मजा रहीं। सुमित खुद भले दिल्ली में रहीं। लेकिन कौसानी के उस घर को उन्होंने पंत जी की स्मृतियों से संजोये रखा और उसके माध्यम से पंत जी को अपने जीवन में। वे उस घर, हिमालय की उस हवा, सबमें पंत जी यानी अपने दद्दू को सहेजे रहीं और संतान होने का अपना परम दायित्व निभाती रहीं।

Two jackets: left is a brown plaid buttoned coat with a collar, right is a brown sleeveless vest with front pockets on hangers.

कभी-कभी यह भी लगता है कि हिंदी साहित्य ने भी अपने कवियों के घरों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं बचाया। हम कविताएँ पढ़ते हैं, पुरस्कारों का स्मरण करते हैं, लेकिन उन जगहों तक कम जाते हैं जहाँ वे कविताएँ जन्मी थीं। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि हिंदी के इतने बड़े कवि का घर आज भी वैसी भव्यता से विकसित नहीं किया गया, जैसी होनी चाहिए थी।

मंचों पर पंत का स्मरण होता है, उनकी पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं, लेकिन उसी समय यह प्रश्न भीतर उठता है कि क्या हमारा साहित्यिक समाज वास्तव में अपने कवियों- लेखकों की स्मृतियों के प्रति उतना उत्तरदायी रहा है, जितना होना चाहिए था? हिंदी के अनेक बड़े लेखकों और कवियों के घर धीरे-धीरे टूटते गए, उपेक्षित होते गए, या पर्यटन और सरकारी औपचारिकताओं के बीच अपनी आत्मा खोते गए। ऐसे समय में कौसानी का यह घर, अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद, अब भी एक जीवित स्मृति की तरह बचा हुआ है।

यह घर हमें केवल पंत की याद नहीं दिलाता; यह हिंदी समाज की स्मृति-दृष्टि पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। हम जो अपने कवियों को पाठ्यक्रमों में सुरक्षित रखते हैं, लेकिन क्या हम उनकी संवेदनाओं को भी बचा पाते हैं? हम क्या उन भू-दृश्यों को बचा पा रहे हैं, जहाँ से उनकी कविता जन्मी थी?

कौसानी अब पहले जैसा निर्जन, शांत और आत्मलीन पहाड़ी कस्बा नहीं रहा। पर्यटन बढ़ा है। बाज़ार बदले हैं। होटल और रिसॉर्ट उगे हैं। शोर भी बढ़ा है। लेकिन इन सबके बीच पंत का घर अब भी एक धीमे प्रतिरोध की तरह खड़ा है; मानो वह आज के समय से कह रहा हो कि मनुष्य केवल उपभोग के लिए नहीं बना: वह सौंदर्य और संवेदना के लिए भी बना है। वहाँ संसाधनों की कमी दिखाई देती है। कुछ जगहों पर समय की थकान भी महसूस होती है। लेकिन शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी भी है कि यह अत्यधिक सजा-सँवरा स्मारक नहीं बना; इसलिए अब भी घर बना हुआ है। इसमें जीवन की बची हुई गंध महसूस होती है। पंत का यह कौसानी वाला यह घर हमें यह याद दिलाता है कि साहित्य केवल पुस्तकालयों में नहीं रहता; वह भूगोल, मौसम, रोशनी और स्मृतियों में भी रहता है।

कभी कौसानी जाना हो तो वहां जरूर जाएं और घर को केवल एक एक पर्यटक की तरह न देखें। थोड़ी देर उसके बरामदे में चुप बैठिए। हिमालय पर बदलती रोशनी को देखिए। हवा में देवदार की गंध को महसूस कीजिए। दूर कहीं किसी पक्षी की आवाज़ सुनिए। फिर पंत की कोई कविता खोलिए- ‘पर्वत प्रदेश में पावस’, ‘ग्राम्या’ या अन्य कोई। संभव है, तब आपको पहली बार अनुभव हो कि कविता केवल शब्दों में नहीं रहती; वह पहाड़ों की निस्तब्धता, बादलों की गति और मनुष्य की भीतरी संवेदना में भी निवास करती है।और तब शायद आप समझ पाएँगे कि हिंदी कविता का वह कोमलतम कवि आज भी कौसानी में क्यों जीवित है।

जब शाम ढलेगी और हिमालय की चोटियों पर अंतिम सुनहरी रोशनी पड़ेगी, तब उस घर के बाहर खड़े होकर लगेगा कि पंत अब भी यहीं कहीं हैं। शायद किसी खिड़की से बाहर देखते हुए… शायद किसी अधूरी पंक्ति के बारे में सोचते हुए… शायद बादलों को धीरे-धीरे पहाड़ों पर उतरते हुए देखते हुए….

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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