Homeकला-संस्कृतिस्मरण: सुमन कल्याणपुर- मौन की रागिनी और एक अनसुनी संगीत-यात्रा

स्मरण: सुमन कल्याणपुर- मौन की रागिनी और एक अनसुनी संगीत-यात्रा

हिंदी फिल्म-संगीत के स्वर्णयुग की चर्चा जब भी होती है, कुछ बड़े नाम लगभग पूरी स्मृति पर छा जाते हैं। लेकिन उसी दौर में एक ऐसी आवाज़ भी थी, जो शोर से नहीं, संवेदना से पहचानी जाती थी। पद्ममविभूषण से सम्मानित सुमन कल्याणपुर की गायकी में एक दुर्लभ विनम्रता, संयम और आत्मीयता है। उनकी आवाज़ ने प्रेम, प्रतीक्षा, विरह और स्त्री-अनुभव को बिना किसी नाटकीयता के एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। उनपर श्रद्धांजलि-स्वरूप लिखा गया यह आलेख उस गायिका की संगीत-यात्रा, संघर्ष, उपेक्षा, उपलब्धियों और उन गीतों को याद करने का प्रयास है, जिन्होंने उन्हें हिंदी फिल्म-संगीत की सबसे विशिष्ट आवाज़ों में शामिल किया।

सुमन कल्याणपुर की आवाज को किसी एक परिचय में बांध देना मुश्किल है। वह आवाज जैसे किसी शांत नदी की तरह है। जिसमें शोर नहीं है, पर गहराई है; जिसमें चमक या प्रदर्शन नहीं, लेकिन एक स्थायी उजास है। हिंदी फिल्म संगीत के जिस दौर को हम स्वर्णयुग कहते हैं, वहां लता मंगेशकर और आशा भोसले की छायाओं के बीच एक और स्वर था, जो अनसमझा रह गया और कई बार अनसुना भी; लेकिन कभी फीका नहीं पड़ा।

सुमन कल्याणपुर की आवाज में एक अजीब-सी विनम्रता है। वह स्वयं को आगे नहीं धकेलती, वह बस उपस्थित रहती है, जैसे सुबह की मीठी हल्की धूप खिड़की से धीरे-धीरे कमरे में उतर रही हो। जिसे देखकर आप चौंकते नहीं बल्कि धीरे-धीरे उसमें भीग जाते हैं।

उनकी आवाज में एक खास तरह की निर्मलता थी। न तो अत्यधिक नाटकीयता, न अनावश्यक अलंकरण। वह भाव को ओढ़ती नहीं जैसे जीती थीं।

मनोवैज्ञानिक सौंदर्य और संकोच की कला

उनकी गायकी का एक और महत्वपूर्ण पहलू है- संकोच। यह संकोच कमजोरी नहीं है। यह भाव की एक परत है जहां प्रेम या पीड़ा को पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जाता बल्कि उसे भीतर रहने दिया जाता है।

उनकी आवाज में एक ऐसी शांति है जो ‘कम’ नहीं लगती, बल्कि ‘अधिक’ महसूस होती है; क्योंकि वह श्रोता को खाली जगह देती है, सोचने और महसूस करने की।

गीत जो धीरे-धीरे याद में उतरते हैं

उनके कई गीत ऐसे हैं जो एक बार सुनने पर तुरंत प्रभाव नहीं डालते, लेकिन धीरे-धीरे स्मृति में बस जाते हैं। जैसे कोई पुराना पत्र, जिसे आप वर्षों बाद खोलें और उसमें छिपी हुई भावनाएं फिर से जीवित हो उठें।

उनकी आवाज में गाया गया ‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे’ हो या ‘मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा’-इन गीतों में एक तरह की कोमल बेचैनी है। यहां प्रेम शोर नहीं करता, वह प्रतीक्षा करता है।

सुमन कल्याणपुर के गायन की एक खासियत यह भी रही है कि उसमें स्त्री-भावना का एक संयत रूप दिखाई देता है। न वह विद्रोह को चिल्लाकर व्यक्त करती हैं, न समर्पण को अत्यधिक नाटकीय बनाती हैं। वह बीच की एक ऐसी रेखा पर चलती हैं जहां भावना भी है और मर्यादा भी।

उनके गीत ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे'( फिल्म: ब्रह्मचारी-1968) को मूल रूप से लता जी के लिए लिखा गया था। संगीतकार शंकर जयकिशन ने जब इसे सुमन जी की आवाज में रिकार्ड किया तो यह इतना बड़ा ब्लॉकबस्टर बना कि आज भी लोग और आज के भी लोग इसे गुनगुनाते हैं।

तुमने पुकारा और हम चले आये, (फिल्मः राजकुमार, 1964) इस रोमांटिक गाने में शम्मी कपूर और साधना की केमिस्ट्री को सुमन कल्यानपुर और रफी साहब ने अमर बना दिया। इसकी रिकार्डिंग के समय संगीतकारों ने भी यह माना था कि सुमन जी ने बिना किसी री-टेक के इस बेहद कठिन क्लासिक ट्यून को बखूबी निभाया

जब स्वर पहचान से बड़े थे

पचास और साठ के दशक का हिंदी फिल्म संगीत केवल मनोरंजन का वाहक नहीं था, वह एक सांस्कृतिक भाषा था। पार्श्वगायिकाएं भी केवल गायिकाएं भर नहीं थीं, वे भावनाओं की अनुवादक थीं, वाहक थीं, परिपूरक थीं। उसी दौर में सुमन कल्याणपुर ने अपनी जगह बनाई।

1960 और 70 का दशक केवल बड़े नामों का युग नहीं था। वह अनेक समानांतर आवाजों का समय था। सुमन कल्याणपुर ने शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी, रवि जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। उनके गीत उस समय के लोकप्रिय संगीत का हिस्सा बने लेकिन उनकी पहचान हमेशा मुख्यधारा की चमक से थोड़ी दूर रही। फिर यही दूरी उनके संगीत की विशिष्टता बन गई।

वह त्रासदी

सुमन जी को पहला ब्रेक फिल्म ‘मंगू’ में मिला।शुरुआत में इसके संगीतकार मोहम्मद शफी थे, जिन्होंने सुमन जी से 3 गाने रिकॉर्ड करवाए। बाद में ओ.पी. नय्यर को इस फिल्म का संगीत मिला। उन्होंने बाकी गाने हटा दिए, जिससे फिल्म में सुमन जी की गाई केवल एक लोरी “कोई पुकारे धीमे से तुझे” ही बची रह गयी।

. .. रफी के साथ मिली नयी पहचान

1960 के दशक में गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच बड़ा विवाद हो गया जिसके कारण दोनों ने एक-दूसरे के साथ गाना बंद कर दिया। इस दौर में मोहम्मद रफी के साथ युगल गीतों के लिए सुमन कल्याणपुर संगीतकारों की पहली पसंद बनीं।

जब लता जी किसी गाने के लिए उपलब्ध नहीं होती थीं या उनका बजट ज्यादा होता था, तब संगीतकार सुमन जी को बुलाते थे। इसी वजह से उन्हें लता जी का ‘विकल्प’ माना जाने लगा, जिससे वे अपने हुनर के मुताबिक पूरा श्रेय भी नहीं पा सकीं। और न ही अपनी अलग पहचान। बस उनकी आवाज को किसी अन्य आवाज का विकल्प बनकर रह जाना पड़ा।

विभिन्न प्रतिभाओं की धनी: सुमन कल्याणपुर

आम तौर पर लोग उन्हें केवल हिंदी गानों के लिए जानते हैं, लेकिन उन्होंने हिंदी (857 गाने) के अलावा मराठी, गुजराती, असमिया, कन्नड़, बंगाली, ओडिया, पंजाबी, भोजपुरी, राजस्थानी और मैथिली समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं में कुल 3000 से अधिक गाने गाए।

बहुत कम लोग जानते हैं कि सुमन कल्याणपुर एक बेहतरीन चित्रकार (पेंटर) भी थीं। संगीत से फुर्सत मिलने पर वे कैनवास पर रंग बिखेरना पसंद करती थीं।

आवाज जो प्रतिस्पर्धा में नहीं, संवेदना में जीती रही

सुमन कल्याणपुर की गायकी का सबसे बड़ा सौंदर्य उनका संतुलन है। उनकी आवाज में न तो अनावश्यक कंपन है, न अतिनाटकीयता। वह भाव को उछालती नहीं, धीरे-धीरे खोलती है।

भारतीय फिल्म संगीत में कई बार कलाकारों की पहचान तुलना के माध्यम से होती या की जाती रही। सुमन कल्याणपुर के साथ भी यह हुआ। उनकी आवाज को अक्सर लता मंगेशकर के स्वर के समानांतर सुना और परखा गया। सुमन कल्याणपुर की आवाज और गायन शैली लता मंगेशकर से इतनी मिलती-जुलती थी कि बड़े-बड़े संगीत पारखी और रेडियो एंकर भी भ्रमित हो जाते थे। लेकिन यह तुलना उनके संगीत का पूरा सत्य नहीं है। यह भारतीय संगीत इतिहास की बहुत बड़ी विडंबनाओं में से एक है, जहां प्रतिभा कभी-कभी पहचान के शोर याकि भीड़ में खो जाती है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सुमन कल्याणपुर की आवाज ने इस अनदेखेपन को शिकायत नहीं बनने दिया। वह अपनी जगह चुपचाप बनी रही।

सच यह है कि सुमन कल्याणपुर का स्वर अपने आप में एक अलग भावभूमि का प्रतिनिधित्व करता है। जहां कुछ आवाजें आकाश की तरह विस्तृत और अपार होती हैं, वहीं उनकी आवाज किसी शांत आंगन की तरह है; जहां आप बैठ सकते हैं, ठहर सकते हैं, और खुद को सुन सकते हैं। यही शायद उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने अपने स्वर को प्रतिस्पर्धा का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे अनुभव का हिस्सा बनाए रखा।

उस दौर की स्त्री-आवाजें

अगर हम उस दौर की पार्श्वगायिकाओं को देखें, तो हम पाएंगे कि हर आवाज अपने भीतर स्त्री-अनुभव की कोई अलग परत सामने लेकर आती है। कहीं संघर्ष की तीव्रता है, कहीं प्रेम की दीवानगी और कहीं विरह की करुणा। सुमन कल्याणपुर की आवाज इनमें सबसे अधिक ‘संयत आवाज कही जा सकती है। लेकिन उनके यहां यह संयम कमजोरी नहीं है। यह एक तरह की आत्म-नियंत्रित भावनात्मक परिपक्वता है।

उनके गीतों में स्त्री (स्वर) न तो पूरी तरह टूटती है न पूरी तरह विद्रोह करती है। वह अनुभव करती है और अनुभव को संगीत में बदल देती है।

लता मंगेशकर की आवाज जहां अक्सर पूर्णता और नियंत्रण का प्रतीक मानी जाती है, वहीं सुमन कल्याणपुर की आवाज में एक मानवीय असंपूर्णता का सौंदर्य है। जहां भाव थोड़ा अनकहा रह जाता है, और शायद इसी कारण अधिक देर तक भीतर टिका भी रहता है। यह तुलना प्रतिस्पर्धात्मक नहीं बल्कि उस युग की बहु-स्वर परंपरा को समझने की एक कोशिश कही जा सकती है।

“ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे” इसका एक सुंदर उदाहरण है। इस गीत में प्रेम का स्वीकार अचानक नहीं आता। वह एक झिझक, एक संकोच और एक धीमी समझ के साथ प्रकट होता है। सुमन की आवाज इस झिझक को केवल व्यक्त नहीं करती, उसे संगीत में बदल देती है।

‘तुम्हें दिल में बिठा के’ गीत में सुमन कल्याणपुर की गायकी प्रेम को घोषणा नहीं बनाती, उसे एक धीमी उपस्थिति में बदल देती है।

‘तुम्हें दिल में बिठा के…’यह पंक्ति स्वयं में जितनी सरल है, उसकी प्रस्तुति उतनी ही जटिल। यहां भाव का न तो कोई उत्सव है, न कोई बाह्य प्रदर्शन नहीं। केवल एक भाव है जो धीरे-धीरे स्थान लेता है।

सुमन की आवाज खाली स्थान को नहीं छोड़ती, लेकिन उसे भरती भी नहीं। वह श्रोता को वहाँ ठहरने देती है।
यही उनकी कला की विशेषता है कि वे भाव को निर्देशित नहीं करतीं, उसे होने देती हैं।

एक पेशेवर और अनुशासित गायिका

उनके समकालीन उन्हें एक अत्यंत अनुशासित कलाकार के रूप में याद करते हैं। समय की पाबंदी, सुर की शुद्धता और भाव की स्पष्टता; ये उनकी कार्यशैली के स्पष्ट केंद्र थे।
स्टूडियो में उनकी उपस्थिति शांत होती थी, कुछ ऐसे जैसे संगीत पहले से भीतर तैयार हो और अब केवल बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहा हो।

स्मृति की राजनीति

हर युग कुछ आवाजों को केंद्र में रखता है और कुछ को किनारे पर छोड़ देता है। यह प्रक्रिया केवल प्रतिभा पर आधारित नहीं होती, बल्कि स्मृति की सामाजिक राजनीति पर भी निर्भर करती है।

जो आवाजें बाजार, मीडिया और लोकप्रियता के केंद्र में नहीं रहतीं वे धीरे-धीरे सामूहिक स्मृति से बाहर हो जाती हैं। सुमन कल्याणपुर इस विस्मरण की नहीं बल्कि उस मौन उपस्थिति की प्रतीक हैं जो समय के साथ और स्पष्ट होती जाती है।

आज जब संगीत तेज़, दृश्य-प्रधान और तत्काल प्रभाव पर केंद्रित हो गया है, सुमन कल्याणपुर की आवाज़ एक विराम की तरह महसूस होती है। वे हमें याद दिलाती हैं कि संगीत केवल शोर नहीं है। वह ठहराव है, वह मौन है, वह भीतर की धीमी गति है। उनके गीत समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे और स्पष्ट होते जाते हैं।

अंतिम स्मृति

सुमन कल्याणपुर की कहानी प्रसिद्धि की कहानी नहीं है। यह उस सौंदर्य की कहानी है जो चिल्लाता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे भीतर बस जाता है। उनकी आवाज़ हमें यह सिखाती है कि महानता हमेशा दृश्य नहीं होती। कभी-कभी वह पार्श्व में हो जाना भी चुन लेती है और शायद इसी कारण, सुमन कल्याणपुर आज भी सुनी जाती हैं। वे शोर में खो नहीं गईं। कम गीतों में, लेकिन अधिक गहराई से।

वे समय के साथ और शांत होती गईं। अब मृत्योपरांत तो पूरी तरह तटस्थ और शांत। लेकिन उनके कुछ गीत हमारी स्मृतियों में अभी भी दस्तक देते रहेंगे –

ना तुम हमें जानो (फिल्म: बात एक रात की)
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए (फिल्म: सरस्वतीचंद्र)
तुमसे ओ हसीना (फिल्म: फर्ज़)
दिल एक मंदिर है (फिल्म: दिल एक मंदिर)
मुझे तुम से बहुत कुछ कहना है (फिल्म: कटी पतंग)
रिमझिम के तराने लेके आई बरसात (फिल्म: काला बाजार)
तस्वीर तेरी दिल में (फिल्म: माया)
मेरा प्यार भी तू है… (फिल्म: साथी)
और यही उनकी सबसे बड़ी उपस्थिति है।

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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