मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता, पटकथा लेखक और फिल्मकार श्रीनिवासन का शनिवार को कोच्चि में निधन हो गया। वे 69 वर्ष के थे। लंबे समय से हृदय संबंधी और अन्य बीमारियों से जूझ रहे श्रीनिवासन के निधन से केरल ही नहीं, पूरे भारतीय सिनेमा जगत में शोक की लहर है। वे अपने पीछे पत्नी विमला श्रीनिवासन और अभिनेता बेटे विनीत श्रीनिवासन व ध्यान श्रीनिवासन को छोड़ गए हैं।
श्रीनिवासन का पार्थिव शरीर पहले त्रिपुनिथुरा के सरकारी तालुक अस्पताल से उनके कंदनाड स्थित आवास लाया गया, जहां परिवार और करीबी लोगों ने अंतिम दर्शन किए। इसके बाद आम लोगों के श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पार्थिव शरीर को एर्नाकुलम टाउन हॉल ले जाया गया। अंतिम दर्शन के दौरान उनकी पत्नी विमला और बेटे विनीत श्रीनिवासन भावुक नजर आए।
गायिका केएस चित्रा ने एक्स पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा कि उन्हें श्रीनिवासन की कई फिल्मों के लिए गाने का सौभाग्य मिला और उनके निधन से वे बेहद दुखी हैं। श्रीनिवासन के जाने से मलयालम सिनेमा ने एक निडर कथाकार, तीखे व्यंग्यकार और आम आदमी की संवेदनाओं को समझने वाले कलाकार को खो दिया है, जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
खुद पर हंसने का साहस रखते थे
हास्य, व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ को सहजता से जोड़ने वाले श्रीनिवासन को मलयालम सिनेमा के सबसे प्रभावशाली रचनाकारों में गिना जाता है। उनकी खासियत यह थी कि वे खुद पर हंसने का साहस रखते थे और उसी आत्मचेतना से ऐसे पात्र रचते थे, जो वर्षों बाद भी दर्शकों को गुदगुदाते हैं।
करीब पांच दशकों तक फैले अपने करियर में श्रीनिवासन ने करीब 200 फिल्मों में काम किया। मलयालम सिनेमा को नई भाषा, नया हास्य और गहरी सामाजिक चेतना दी। यह एक संयोग ही है कि उनके निधन के समय भी उनकी कालजयी राजनीतिक व्यंग्य फिल्म ‘संदेशम’ से जुड़े मीम्स हाल ही में हुए केरल के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों को समझाने के लिए सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं। तीन दशक से अधिक समय बाद भी ‘संदेशम’ की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है और हर राजनीतिक विवाद या चुनाव के दौरान यह फिल्म चर्चा में लौट आती है।
श्रीनिवासन का जन्म साधारण पृष्ठभूमि में हुआ, लेकिन उनकी सोच और लेखनी असाधारण थी। उन्होंने 1976 में पीए बैकर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मणिमुझक्कम’ से सिनेमा में कदम रखा। 1979 में ‘संघगणम’ से उन्हें पहली मुख्य भूमिका मिली। फिल्म स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर का लेखक आकार लेने लगा और 1984 में ‘ओदारुथम्मावा आलारियाम’ से उन्होंने पटकथा लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाई।
इसके बाद उन्होंने सनमानसुल्लावरक्कू समाधानम, गांधीनगर 2 स्ट्रीट, नादोडिक्कट्टू, पत्तनप्रवेशम, वरवेलपु, संदेशम, मिधुनम, मझयेथम मुनपे, अजाकिया रावनन, कथा परायम्पोल और ज्ञान प्रकाशन जैसी कई यादगार फिल्मों की पटकथा लिखी। उनकी खासियत यह थी कि वे हास्य के जरिए समाज की जटिल सच्चाइयों को बेहद सहज ढंग से सामने रखते थे। वे आम आदमी की आवाज थे और उनकी कहानियों में वही लोग नजर आते थे।

एक अभिनेता के तौर पर भी श्रीनिवासन ने नेचुरल एक्टिंग की मिसाल पेश की। ‘अरम + अरम = किन्नरम’, ‘पोनमुट्टायिडुन्ना थरावु’, ‘मझा पेय्युन्नु मद्दलम कोट्टुन्नु’, ‘अर्थम’ और ‘चित्रम’ जैसी फिल्मों में उनका अभिनय आज भी दर्शकों को हंसाता और छू जाता है। अभिनेता मुकेश के साथ उनकी जोड़ी खास तौर पर दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय रही। जबकि निर्देशक के रूप में श्रीनिवासन ने ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ और ‘चिंताविष्टयाया श्यामला’ जैसी संवेदनशील और गहरी फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों को न केवल दर्शकों का प्यार मिला, बल्कि कई प्रमुख पुरस्कार भी हासिल हुए। अपने करियर में उन्होंने कई बार केरल राज्य फिल्म पुरस्कार सहित अनेक सम्मान जीते।
श्रीनिवासन न केवल मलयालम सिनेमा के सबसे सफल पटकथा लेखकों में रहे, बल्कि उन्होंने निर्देशन में भी अपनी अलग छाप छोड़ी। उनके लिखे और निभाए गए कई किरदार समय की कसौटी पर खरे उतरे। वे मानते थे कि सिनेमा का मूल उद्देश्य दर्शकों का मनोरंजन है और अगर कोई फिल्म नहीं चलती, तो इसके लिए दर्शकों को दोष देना सरासर गलत है। उनके शब्दों में, दर्शकों में यह समझ होती है कि क्या अच्छा है और क्या नहीं, और असफलता का ठीकरा उन पर फोड़ना पाखंड है।
एक साक्षात्कार में श्रीनिवासन ने अपनी लेखन प्रक्रिया पर खुलकर बात की थी। उनका कहना था कि थिएटर में हर तरह के दर्शक आते हैं, कुछ उत्साह के साथ, तो कुछ संदेह में कि फिल्म पैसा वसूल होगी या नहीं। एक लेखक की जिम्मेदारी है कि वह सभी को साथ लेकर चले। उन्होंने बताया था कि ‘चिंताविष्टयाया श्यामला’ जैसी फिल्म के लिए सही शुरुआत खोजने में उन्हें करीब एक महीना लग गया था, और बाद में बना ‘पावर कट’ सीन ही दर्शकों को किरदारों की प्रकृति समझाने का माध्यम बना।
उनकी चर्चित फिल्मों में ‘संदेशम’ जैसी पटकथाएं आज भी कल्ट मानी जाती हैं। वे कहते थे कि जब दर्शक किसी फिल्म से जुड़ जाते हैं, तो वही एक रचनाकार के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। निर्देशन के सवाल पर उनका नजरिया साफ था, जब उन्हें लगता कि किसी विचार को वे निर्देशक को ठीक से समझा नहीं पा रहे हैं, तब वे खुद निर्देशन की जिम्मेदारी उठा लेते थे। इसी सोच के चलते उन्होंने सीमित लेकिन यादगार फिल्मों का निर्देशन किया।
हाल के वर्षों में भी श्रीनिवासन सक्रिय रहे। वे ध्यान श्रीनिवासन अभिनीत फिल्म ‘आप कैसे हो?’ में नजर आए थे और इससे पहले कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘कुरुक्कन’ के जरिए उन्होंने वापसी की थी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा था।

