Friday, March 20, 2026
Homeसाइंस-टेकछह दशक से हिमालय के बर्फ में गुम है 'न्यूक्लियर डिवाइस', CIA...

छह दशक से हिमालय के बर्फ में गुम है ‘न्यूक्लियर डिवाइस’, CIA के इस विवादित जासूसी मिशन से कैसे जुड़ा था भारत, भाजपा ने नेहरू का किया जिक्र

चीन की मिसाइल और परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारत के साथ मिलकर एक बेहद संवेदनशील खुफिया अभियान की योजना बनाई। इस मिशन में पर्वतारोहियों की एक टीम को वैज्ञानिक अभियान के रूप में भेजा गया।

1960 के दशक में जब शीत युद्ध अपने चरम पर था, चीन के परमाणु परीक्षण (1965) ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी थी। इसी दौर में हिमालय की एक दुर्गम और पवित्र मानी जाने वाली ऊंची चोटी नंदा देवी एक ऐसे गुप्त मिशन का केंद्र बनी, जिसकी जानकारी सालों तक सार्वजनिक नहीं हुई।

चीन की मिसाइल और परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारत के साथ मिलकर एक बेहद संवेदनशील खुफिया अभियान की योजना बनाई। इस मिशन में पर्वतारोहियों की एक टीम को वैज्ञानिक अभियान के रूप में भेजा गया।

इस अभियान के तहत नंदा देवी पर परमाणु ऊर्जा से चलने वाला एक एंटीना लगाने की योजना बनाई गई। यह अभियान आज भी इतिहास के सबसे विवादित और रहस्यमय खुफिया अभियानों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें इस्तेमाल किया गया प्लूटोनियम से भरा उपकरण आज तक नहीं मिला है।

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस पर एक रिपोर्ट छापी है जिससे इस मुद्दे की फिर से चर्चा होने लगी है।

कैसे बनी योजना?

इस मिशन की नींव एक कॉकटेल पार्टी में पड़ी, जहां अमेरिकी वायुसेना प्रमुख जनरल कर्टिस लेमे की मुलाकात नेशनल जियोग्राफिक के फोटोग्राफर और पर्वतारोही बैरी बिशप से हुई। बिशप ने बताया कि हिमालय की ऊंची चोटियों से तिब्बत और चीन के अंदर तक साफ नजर रखी जा सकती है। इसके बाद सीआईए ने बिशप से संपर्क किया और एक गुप्त अभियान की जिम्मेदारी दी।

इस अभियान को ‘सिक्किम साइंटिफिक एक्सपीडिशन’ का नाम देकर वैज्ञानिक शोध के रूप में पेश किया गया। अमेरिकी पर्वतारोही जिम मैकार्थी को इसमें शामिल किया गया, जिन्हें हर महीने 1,000 डॉलर दिए गए। भारत भी चुपचाप इस मिशन में शामिल हुआ, क्योंकि 1962 के युद्ध के बाद चीन को लेकर भारत की चिंताएं गहरी थीं।

नंदा देवी क्यों चुनी गई?

शुरुआत में CIA की नजर कंचनजंघा पर थी, लेकिन भारतीय अभियान प्रमुख कैप्टन एम.एस. कोहली ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि ऐसी सलाह देने वाला व्यक्ति मूर्ख है। आखिरकार नंदा देवी को चुना गया, क्योंकि यह चीन सीमा के करीब थी और रणनीतिक रूप से अहम मानी गई।

अमेरिकी और भारतीय पर्वतारोहियों ने जो उपकरण साथ ले जाने थे, उनमें एक 13 किलो का SNAP-19C जनरेटर भी शामिल था। इसमें उतना प्लूटोनियम था, जितना नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम में इस्तेमाल हुए प्लूटोनियम का लगभग एक तिहाई था। उस समय किसी को इसके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों की पूरी समझ नहीं थी। जनरेटर से निकलने वाली गर्मी इतनी थी कि ठंड में यह पर्वतारोहियों को राहत देता था। कोहली के मुताबिक, शेरपा इसे उठाने के लिए आपस में बहस तक करते थे।

क्या हुआ था तब?

सितंबर 1965 में अभियान शुरू हुआ। पर्वतारोहियों को बिना पर्याप्त अनुकूलन के हेलिकॉप्टर से ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया, जिससे कई बीमार पड़ गए। 16 अक्टूबर को, जब टीम शिखर के करीब थी, अचानक भीषण बर्फीला तूफान आ गया। भारतीय पर्वतारोही सोनम वांग्याल ने बाद में कहा, “हम 99 फीसदी मर चुके थे। न खाना था, न पानी, न ताकत।”

हालात को देखते हुए कैप्टन कोहली ने आदेश दिया कि उपकरण को कैंप फोर के पास एक बर्फीले कगार पर सुरक्षित रखकर सभी नीचे लौट जाएं। अमेरिकी पर्वतारोही मैकार्थी ने इसका विरोध किया, लेकिन जान बचाना प्राथमिकता थी। टीम लौट आई, जबकि प्लूटोनियम से भरा उपकरण पहाड़ पर ही रह गया।

मई 1966 में एक और टीम उपकरण को वापस लाने पहुंची, लेकिन वहां पूरा कगार ही गायब था। माना गया कि हिमस्खलन में बर्फ, चट्टान और उपकरण सब बह गए। इसके बाद कई खोज अभियान चले। रेडिएशन डिटेक्टर और इंफ्रारेड सेंसर लगाए गए, लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा।

मैकार्थी ने बाद में कहा, “वह उपकरण गर्म रहता था। बर्फ को पिघलाकर धीरे-धीरे और नीचे धंसता चला गया होगा।”

यह मिशन पूरी तरह गुप्त रहा, लेकिन 1978 में पत्रकार हॉवर्ड कोहन ने इसे उजागर किया। रिपोर्ट सामने आते ही भारत में हंगामा मच गया। प्रदर्शनकारियों ने तख्तियां उठाईं, जिन पर लिखा था, “CIA हमारे पानी को जहर बना रही है।”

हालात को संभालने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पर्दे के पीछे बातचीत की। एक निजी पत्र में कार्टर ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण मामला” कहा। सार्वजनिक रूप से दोनों देशों ने इस पर ज्यादा कुछ नहीं कहा।

लापता परमाणु उपकरण से आज भी बनी हुई है चिंता

आज भी यह लापता परमाणु उपकरण चिंता का विषय है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर प्लूटोनियम गंगा तक पहुंच भी जाए, तो पानी की मात्रा इतनी ज्यादा है कि असर सीमित होगा, लेकिन नंदा देवी क्षेत्र के आसपास के ग्लेशियरों और पहाड़ी नदियों पर खतरा बना हुआ है। प्लूटोनियम बेहद जहरीला होता है और सांस या भोजन के जरिए शरीर में जाने पर कैंसर का कारण बन सकता है।

2021 में नंदा देवी के पास हुए भूस्खलन के बाद, जिसमें 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, फिर से इस उपकरण को लेकर अटकलें लगीं, हालांकि वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन को मुख्य वजह बताया। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने अमेरिका से इस उपकरण को निकालने की जिम्मेदारी लेने की मांग की थी।

कैप्टन एमएस कोहली, जिनका जून 2025 में 93 वर्ष की उम्र में निधन हुआ, जीवन भर इस मिशन को लेकर अफसोस जताते रहे। उन्होंने कहा था, “मैं आज इसे उसी तरह नहीं करता। सीआईए की योजना और सलाह दोनों ही मूर्खतापूर्ण थीं, और हम उसमें फंस गए।”

वहीं 90 के पार कर चुके जिम मैकार्थी का कहना है कि “आप गंगा को पानी देने वाले ग्लेशियर के पास प्लूटोनियम नहीं छोड़ सकते। क्या आपको पता है, कितने लोग गंगा पर निर्भर हैं?” अमेरिका और भारत की सरकारें आज भी इस ऑपरेशन पर टिप्पणी करने से इनकार करती हैं। सीआईए ने कभी आधिकारिक रूप से इस मिशन को स्वीकार नहीं किया। नंदा देवी की बर्फ में दफन यह परमाणु रहस्य अब भी अनसुलझा है।

भाजपा सांसद ने नेहरू पर लगाए गंभीर आरोप

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोमवार को एक्स पर इस जासूसी अभियान को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर गंभीर आरोप लगाए। एक्स पर किए गए पोस्ट में निशिकांत ने लिखा कि यह गुप्त अभियान कई चरणों में चला। पहला चरण 1964 में जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में शुरू हुआ, जबकि बाद के चरण 1967 और 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में पूरे किए गए। उन्होंने कहा कि बाद में अमेरिकी एजेंटों के लौट जाने के बाद यह परमाणु जासूसी उपकरण वहीं छोड़ दिया गया, जिससे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में खतरनाक सामग्री पड़ी रह गई।

दुबे ने अपने पोस्ट में लिखा कि नंदा देवी पर छोड़े गए इस परमाणु उपकरण का असर आज भी दिख रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक गंगा किनारे बसे इलाकों में कैंसर के बढ़ते मामले, हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, बार-बार बादल फटना और पहाड़ी क्षेत्रों में मकानों में दरारें पड़ना इसी घटना का परिणाम है। उन्होंने यह भी दावा किया कि 1978 में लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इस मुद्दे को स्वीकार किया था और हाल ही में अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

भाजपा सांसद ने इस कथित सीआईए अभियान को लंबे समय से चली आ रही पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जोड़ते हुए कहा कि छोड़े गए परमाणु उपकरण से रेडियोधर्मी प्रदूषण का खतरा बना हुआ है। इससे पहले 14 जुलाई को भी उन्होंने इसी मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी को घेरा था और नंदा देवी के पास लापता अमेरिकी परमाणु उपकरण को हाल के प्राकृतिक हादसों से जोड़कर सवाल उठाए थे।

एक अन्य पोस्ट में दुबे ने 1978 में अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों द्वारा तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखे गए पत्र की प्रति भी साझा की। इस पत्र में हिमालय में सीआईए के गुप्त अभियान और प्लूटोनियम से चलने वाले निगरानी उपकरण के संभावित रेडियोधर्मी रिसाव को लेकर चिंता जताई गई थी। दुबे के अनुसार, अमेरिकी सांसदों ने अपनी सरकार से इस मामले की गहन जांच करने और अगर आरोप सही पाए जाएं तो जिम्मेदारी लेने की मांग की थी।

निशिकांत दुबे ने यह भी सवाल उठाया कि क्या केदारनाथ आपदा, तीस्ता नदी में आई बाढ़, गंगोत्री और यमुनोत्री के ग्लेशियरों का पिघलना और गंगा नदी के जलस्तर में गिरावट जैसी घटनाओं का संबंध इस कथित परमाणु उपकरण से हो सकता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस नेतृत्व ने विदेशी ताकतों के सामने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया, जिसका खामियाजा आज देश के पर्यावरण, किसानों और आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ रहा है।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments