नई दिल्ली: केंद्र सरकार दो दशक पुरानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना यानी MGNREGA (मनरेगा) को एक नए कानूनी ढांचे- विकसित भारत-रोजगार गारंटी व आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) बिल- 2025 से बदलने जा रही है। इस बदलाव को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सरकार पर महात्मा गांधी का नाम हटाने के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए हमला बोला।
प्रियंका गांधी ने योजना का नाम बदलने के पीछे सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या ऐसा कदम उठाना जरूरी था। संसद परिसर के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया जा रहा है? महात्मा गांधी को न सिर्फ देश में बल्कि दुनिया में भी सबसे बड़ा नेता माना जाता है, इसलिए उनका नाम हटाना, मुझे सच में समझ नहीं आ रहा है। इसका मकसद क्या है? उनकी मंशा क्या है?’
उन्होंने आगे कहा, ‘जब भी किसी स्कीम का नाम बदला जाता है, तो ऑफिस, स्टेशनरी में बहुत सारे बदलाव करने पड़ते हैं, जिस पर पैसा खर्च होता है। तो, इसका क्या फायदा है? यह क्यों किया जा रहा है?’ प्रियंका गांधी ने कहा कि यह कदम पैसे और समय दोनों के लिहाज से बर्बादी वाला है।
संसद की सोमवार को जारी सप्लीमेंट्री लिस्ट ऑफ बिजनेस के अनुसार यह बिल लोकसभा में पेश करने के लिए लिस्ट किया गया है। बताया गया है कि बिल का मकसद ग्रामीण आजीविका को सरकार के लॉन्ग-टर्म डेवलपमेंट विजन के साथ जोड़ना है। प्रस्तावित कानून 2005 में लागू MGNREGA को खत्म करना चाहता है और ग्रामीण रोजगार के लिए एक नया कानूनी सिस्टम स्थापित करना चाहता है।
मनरेगा के बदले नए कानून में क्या बदलाव?
इस नए बदलाव के तहत सरकार हर वित्तीय वर्ष में हर ग्रामीण परिवार को 125 दिनों के रोजगार की गारंटी देगी, जिसके वयस्क सदस्य उन कामों करेंगे जिनमें विशेष कौशल की जरूरत नहीं होती। इस लिहाज से यह मनरेगा के न्यूनतम 100 दिनों के रोजगार से अलग है। यह बिल खुद को एक बड़े ‘ग्रामीण विकास ढांचे का हिस्सा बताता है जो विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय विजन के साथ जुड़ा हुआ है।’
मनरेगा का लक्ष्य ‘आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना’ था। जबकि नया बिल कहता है कि इसका मकसद ‘समृद्ध और मजबूत ग्रामीण भारत के लिए सशक्तिकरण, विकास, तालमेल’ को बढ़ावा देना है।
नए बिल में 100 दिन की गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव है। हालांकि मजदूरी दरें केंद्र सरकार नोटिफाई करेगी, लेकिन वे मौजूदा MGNREGA मजदूरी से कम नहीं हो सकतीं। मजदूरी हर हफ्ते या ज्यादा से ज्यादा 15 दिनों के अंदर दी जानी चाहिए।
यह बिल MGNREGA से कहीं ज्यादा कड़ी मॉनिटरिंग का भी प्रावधान करता है, जिसमें मजदूरों का बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन, जियो-टैग वर्कसाइट्स, डिजिटल मस्टर रोल (ई-मस्टर), रियल-टाइम डैशबोर्ड, हर हफ्ते सार्वजनिक जानकारी देना, AI-आधारित धोखाधड़ी के जोखिम कम करने जैसे प्रावधान हैं।
खेती के सीजन में किसानों के लिए फायदा
MGNREGA से अलग एक नया और अहम बदलाव यह भी है कि खेती के सीजन यानी बुआई-कटाई के दौरान इस योजना के तहत कोई काम नहीं दिया जाएगा। राज्यों को साल में 60 दिनों तक का ये समय नोटिफाई करना होगा, जिसमें बुवाई और कटाई का समय शामिल होगा। इसका मकसद किसानों के लिए मजदूरों की कमी को रोकना और पिछले कुछ सालों से लगातार चली आ रही शिकायतों को दूर करना है कि मनरेगा ने ग्रामीण मजदूर के बाजार को बिगाड़ दिया है। यह भी शिकायतें मिलती रही हैं कि मनरेगा की वजह से मजदूरों की कमी हो जाती है।
उद्देश्यों और कारणों की बात करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माना कि पिछले 20 सालों में ग्रामीण परिवारों को मजदूरी वाले रोजगार देने में MGNREGA की भूमिका रही। हालांकि, नया कानून ग्रामीण रोजगार नीति में एक नए बदलाव का संकेत देता है। सरकार के अनुसार वह एक ऐसे मिशन की ओर बढ़ना चाहती है जिसे वह भविष्य-उन्मुख विकास मिशन बताती है।
सरकार के अनुसार VB-G RAM G बिल (विकसित भारत-रोजगार गारंटी व आजीविका मिशन) भारत के सबसे बड़े सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में से एक के खत्म होने और ग्रामीण रोजगार नीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक होगा। बता दें कि NREGA को तत्कालीन UPA सरकार ने 2005 में लागू किया था। 2 अक्टूबर, 2009 को इसका नाम बदलकर MGNREGA कर दिया गया था।

