पिछले दो सालों में यह दसवां शहर है, जहां मैं आशियाना तलाशने की कोशिश कर रहा हूं। एक सुरक्षित आशियाना। कभी-कभी हैरान हो जाता हूं, सुरक्षा के बारे में सोचकर। एक ऐसी चीज़, जिसके बारे में मैंने पहले कभी नहीं सोचा था, अब सबसे ज्यादा इसी के बारे में सोचता रहता हूं।
मैं इस शहर को नहीं जानता। इसके लिए मैं भी अजनबी हूं। इससे पहले मैं औरंगाबाद में रहा था, वह मेरा परिचित शहर है। वहां मैंने अपने शहर उज्जैन के बाद सबसे ज़्यादा वक्त बिताया है। उसी शहर में मैंने उर्दू में एम.ए. किया और फिर पी.एचडी।
झिलमिलाती रोशनी के दरमियान उज्जैन को ख़ैराबाद कहते हुए मन दुख से भर गया था। मगर ट्रेन में सामने की सीट पर बैठी उदास चेहरे वाली उस लड़की को देखकर सुकून भी मिला, अब कम से कम मैं अपने प्यार के साथ ज़िंदगी बसर कर सकता था।
पर ऐसा न हो सका।
‘इस देश में अपने पसंदीदा साथी के साथ ज़िंदगी गुज़ारना इतना मुश्किल क्यों है?’
‘तुम्हें इतनी जल्दी मायूसी नहीं होना चाहिए,’ मेरे प्रोफेसर ने कहा, जिनके पास मैं पी.एचडी. थीसिस पर सुझाव लेने आया था, ‘अपने आस-पास देखो। इस समाज को समझने की कोशिश करो। यह वही समाज है, जो दिन में स्त्रियों की पूजा करता है और रात में उनके साथ बलात्कार। फिर तुम इससे अपने प्रेम के समर्थन में खड़े होने की उम्मीद कैसे कर सकते हो?’
उन्होंने ही सुझाव दिया था कि मुझे कुछ दिन औरंगाबाद में रहना चाहिए। मैं उनके इस सुझाव पर अवाक् रह गया था। वह शहर, जो उज्जैन के बाद मेरी सबसे महफ़ूज़ पनाहगाह हुआ करता था, और जिसके बारे में हर कोई जानता था कि अगर में कहीं नहीं मिलूंगा तो औरंगाबाद में मिलूंगा, ऐसे मुश्किल समय में वहां आकर रहना सीधे-सीधे जान जोखिम में डालना था।
प्रोफेसर ने मेरी चिंताओं पर गौर करने के बाद जब कहा कि उन लोगों ने सबसे पहले तुम्हें यहीं तलाश किया होगा। इसलिए अब उनके यहां आने की संभावना न के बराबर है, तो मैं सहमत हो गया।
उन्होंने ही हमारी रिहाइश का बंदोबस्त कराया और आजीविका के लिए मुझे एक हाई स्कूल में टीचर नियुक्त करवा दिया।
वह अच्छा वक्त था। लंबे अरसे बाद हमारी ज़िंदगी में ठहराव आया था और हम उसे उस तरह जीने की कोशिश करने लगे थे, जैसे कि हमने उसे जीने का सपना देखा था।
मगर यह कोशिश उस रोज़ अधूरी रह गई जब शाम को स्कूल से लौटते वक्त उस रिक्शा चालक ने, जिसका मैं नियमित ग्राहक हो गया था, बताया था कि दोपहर में बस स्टैंड पर कुछ लोग मेरे बारे में पूछ रहे थे। उनके पास मेरी एक फोटो थी, जिसे वे लोगों को दिखा रहे थे और कह रहे थे कि जो कोई भी इस व्यक्ति के बारे में जानकारी देगा, उसे अच्छा-खासा ईनाम दिया जाएगा।
मैंने उसी सप्ताह अपनी थीसिस पूरी की थी और अब बस उसे यूनिवर्सिटी में जमा करना था। थीसिस पर प्रोफेसर के साइन लेने के लिए जब मैं उनके केबिन में गया तो पता चला कि वह इस बारे में पहले से ही जानते थे।
थीसिस जमा करने के बाद उन्होंने मुझे नांदेड के पीपुल्स कॉलेज के प्रिंसिपल के नाम एक पत्र दिया और अगली ही सुबह उनसे जाकर मिलने के लिए कहा।
हमें एक बार फिर अपना ठिकाना छोड़ना पड़ा। उस बारे में अब सोचता हूं तो लगता है कि उस जगह को ठिकाना कहना सही नहीं होगा, वह हमारा घर था। वह घर, जिसमें हर वह चीज़ थी, जिसके बारे में हमने सोचा था। उनमें से कुछ मैं अपने साथ लेना चाहता था। यादगार के तौर पर। मगर मेरी पूर्व प्रेमिका ने मना कर दिया।
दहलीज पर खड़े होकर उसने ठंडी आह के साथ गहरी नज़रों से पूरे घर को देखा। मानो देख लेना चाहती हो कि हर चीज़ अपनी जगह पर है भी, या नहीं। फिर दरवाज़ा बंद किया, उसे हल्के से थपथपाया और अलविदा कह दिया। जैसे अपने किसी अज़ीज़ से हमेशा के लिए विदा ले रही हो।
अब हम मराठवाड़ा की ओर जाने वाली सड़क पर थे।
अगले दिन मैं तय वक्त से पहले ही कॉलेज पहुंच गया। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद प्रिंसिपल ने मुझे बुलाया। पत्र पढ़ा और अगले दिन फिर से आने के लिए कहा।
उस रोज़ मैं उनसे इंटरव्यू रूम में मिला। वहां दो लोग और थे। उनमें से एक अधेड़ उम्र था और दूसरा गोरी रंगत, गहरी छोटी आंखों और चौड़े कंधों वाला सुदर्शन नौजवान।
शुरू में प्रिंसिपल और वह अधेड़ उम्र व्यक्ति, जिनके बारे में इंटरव्यू के दौरान ही पता चला कि वह कॉलेज के उर्दू विभागाध्यक्ष हैं, सवाल करते रहे।
सुदर्शन नौजवान ने आख़िर में सवाल किया। वह भी इंग्लिश में। उसने पूछा कि इब्ने इंशा की किताब ‘रानी केतकी की कहानी’ किस भाषा में लिखी गई है?
‘उर्दू में’, मैंने जवाब।
‘क्या आप उसका पहले शेर सुना सकते हैं?’
‘यह है वह कहानी जिसमें हिंदी अछुट/किसी और बोली का ना मेल है ना पुट,’ मैंने शेर सुना दिया।
‘लेखक तो कह रहा है कि यह कहानी हिंदी में है, फिर आप इसे उर्दू में कैसे कह सकते हैं?’
‘शुरू में उर्दू को ही हिंदी कहा जाता था। मीर और ग़ालिब जैसे शायरों ने भी अपने उर्दू कलाम को हिंदी कलाम ही कहा है। इस भाषा का उर्दू नाम तो बहुत बाद में पड़ा।’
सवाल-जवाब के सेशन के बाद मैं प्रिंसिपल ऑफिस में था। वहां मुझे अपॉइंटमेंट लेटर मिला और मैंने आने वाले सोमवार को कॉलेज जॉइन कर लिया।
कॉलेज में शुरुआती दिन औपचारिकताओं में ही बीते। फिर मैं उसकी व्यवहारिक गतिविधियों में शामिल हो गया, जहां मेरा साथी वही सुदर्शन नौजवान था, जिससे पहली बार मैं इंटरव्यू रूम में मिला था। उसका नाम विजय पाटिल था। उसने इंग्लिश लिटरेचर से एम.ए. किया था और पी.एचडी. करने के साथ ही कॉलेज जॉइन कर लिया था।
उसका इंग्लिश बोलने का अंदाज़ कमाल का था। हम अंग्रेज़ों के गुलाम रहे हैं, ‘अभी भी हैं। मानसिक तौर पर,’ मेरी मिसेज ने सही करते हुए कहा था, इसलिए हम ब्रिटिश अंदाज़ में इंग्लिश बोलते हैं। विजय पाटिल का अंदाज़ अमेरिकन था, वह भी अमेरिकी शासक वर्ग के इंग्लिश बोलने वाला अंदाज़, जिसे दुनिया में उनके अलावा बहुत कम लोग बोल पाते हैं।
मैं शायर था और एक शायर की हैसियत से ख़ासी शोहरत भी हासिल कर चुका था। विजय पाटिल को शायरी सुनने का शौक़ था। वह अकसर मुझसे मीर, ग़ालिब और ज़ौक़ के शेर सुनाने की फ़रमाइश करता। कभी उसका अच्छा मूड़ होता तो वह मुझे अपनी पसंदीदा इंग्लिश पॉयम सुनाया करता।
कॉलेज परिसर बहुत विशाल था। उसकी शानदार इमारत यूरोपियन शैली में बनी थी। खास बात यह थी कि उसके हर डिपार्टमेंट की अपनी लाइब्रेरी थी और लाइब्रेरी के साथ लगा हुआ पार्क भी था, जिनमें विभिन्न किस्म के फूलों के पौधे लगे थे। पार्क में जाने का रास्ता लाइब्रेरी से होकर जाता था तो आप पार्क की ताज़ा हवा में बैठकर पढ़ सकते थे, नोट्स बना सकते थे और बहस भी कर सकते थे।
डिपार्टमेंट्स और लाइब्रेरी के पार्कों के बगल से होते हुए लंबे-चौड़े गलियारे बने थे, जो हर इमारत को दूसरे से जोड़ते थे और आख़िर में एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक में जाकर खत्म होते थे।
मैं और विजय पाटिल अक्सर अपना खाली वक्त इन्हीं गलियारों में घूमते बिताते। कभी किसी डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी के पार्क में जा बैठते। अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ते, कुछ अच्छा लगता तो अपनी डायरी में लिख लेते। कभी उन किताबों पर बहस करते, जिन्हें हम पढ़ रहे होते।
ऐसे मौक़ो पर हमारे साथ गजाजन तामन भी हुआ करता। सांवली रंगत, घुंघराले बाल और घनी मूंछों वाला तेलुगु नौजवान। उसका माथा चौड़ा, गोल नाक और मंद-मंद मुस्कुराहट सजाए पतले होंठ। वह इंग्लिश डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर था। विजय पाटिल का क्लिग।
विजय पाटिल जब अपनी पढ़ी हुई किताबों पर चर्चा करता, उनमें लिखे विषयों पर बहस करता या फिर उन किताबों को पढ़ने के बाद दिमाग़ में आने वाले ख्यालों का ज़िक्र करता तो ऐसे मौक़ों पर जब मैं कमज़ोर पड़ने लगता तो गजाजन तामन मेरा साथ दिया करता। उसकी भी रीडिंग हैबिट बहुत अच्छी थी और उसे इंग्लिश लिटरेचर से उतना ही प्यार था, जितना कि विजय को।
मैं उर्दू टीचर था। इंग्लिश मुझे भी आती थी, पर उस तरह नहीं जैसे कि उन दोनों को। मेरी इंग्लिश लिटरेटर पर पकड़ भी उस तरह नहीं थी। मैं उनकी बहसों में शामिल ज़रूर रहता था, मगर एक श्रोता की हैसियत तक। कभी जब मूड अच्छा होता तो मैं उन लोगों को अपनी लिखी ग़ज़ल सुनाता या फिर पुराने अशआर।
उस दिन भी हम लोग डिपार्टमेंट्स के बाहर गलियारों में बात करते हुए टहल रहे थे, जब गजानन तामन ने बताया कि जल्द ही कॉलेज के एनवल फंक्शन की डेट एनाउस होने वाली है, इसलिए हमें इस तरह टहलने की बजाय फंक्शन की तैयारी में जुट जाना चाहिए।
कॉलेज के एनवल फंक्शन की तैयारी कराने वाली कमेटी में मुझे और विजय पाटिल को भी शामिल किया गया था। यह जानकारी अगले दिन नोटिस बोर्ड पर चिपके उस नोटिस से मिली, जो प्रिंसिपल ऑफिस के बाहर लगा हुआ था।
यह एक्स्ट्रा वर्क था, जिसके लिए हमें क्लासेस के बाद भी कॉलेज में ठहरना होता था। इस वर्क में फंक्शन की औपचारिक तैयारियों के अलावा बच्चों के साथ मिलकर उन प्रोग्रामों की रिहर्सल कराना भी हमारी ज़िम्मेदारी थी, जिसे वे फंक्शन में पेश करने वाले थे।
मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि फंक्शन में पेश किए गए जाने वाले प्रोग्रामों में एक प्रोग्राम विजय पाटिल का भी है, जिसकी तैयारी वह अलग से अपने स्टूडेंट्स को करा रहा था। इस बारे में पूछने पर उसने बताया कि वह एक ड्रामा है। मैंने कहा कि मैं उसे पढ़ना चाहूंगा। उसने मुस्कुराते हुए कहा,
‘क़ासिद साहब ड्रामा पढ़ने से ज्यादा देखने में मज़ा आता है।’
फंक्शन के दिन जैसे-जैसे क़रीब आने लगे थे, हमारे बाज़ार के चक्कर भी बढ़ने लगे। कभी-कभी तो हमारा पूरा दिन ही बाज़ार में घूमते हुए बीत जाता।
एक बार मैं, विजय पाटिल और हमारे साथ हिंदी के एक प्रोफेसर वजीरपुरा से गुज़र रहे थे। तभी विजय पाटिल ने एक ओर इशारा करते हुआ कहा,
‘बघा, बघा… देखो देखो।’
और हमने उस ओर देखा, जिधर विजय पाटिल ने इशारा किया था। सड़क किनारे खड़े पेड़ के नीचे गणपति की खंडित मूर्ति पड़ी थी, जिस पर एक कुत्ता टांग उठाकर मूत रहा था।
पाटिल उसे देखकर मुस्कुराते हुए बोला,
‘सोचो अगर यह काम कोई मुसलमान कर रहा होता तो?’
चीज़े बेहतर हुईं। तय वक्त से पहले ही सभी तैयारियां मुकम्मल हो गईं। फंक्शन तीन दिन चला। तीनों दिन अलग-अलग प्रोग्राम हुए और उनमें शामिल होने के लिए अलग-अलग ही दर्शकों को आमंत्रित किया गया। विजय का ड्रामा तीसरे दिन प्ले किया गया, जिसका मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। उस दिन शहर के अलावा राज्य स्तर के अतिथियों को भी आमंत्रित किया गया था। उनमें फिल्म एक्टर्स के साथ राजनेता भी शामिल थे।
मैं ड्रामे के शीर्षक से ही उत्सुक था, ‘दो घंटे का मुसलमान’।
मैंने तीसरे दिन होने वाले प्रोग्रामों की सूची में जब इस शीर्षक को पढ़ा था तो मेरी उत्सुकता चरम पर थी। मैंने कई अनुमान लगाए। क्या इस ड्रामे में किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी थी, जो केवल दो घंटे तक मुसलमान रहा था, या किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी जो दो घंटे के लिए मुसलमान होना चाहता था!
अपनी मिसेज के साथ प्ले देखते हुए अहसास हुआ कि मेरा अनुमान वास्तविकता के कितने करीब था। ड्रामे में ऐसे व्यक्ति की कहानी कही गई थी, जिसके पूर्वज किसी समय मुसलमान हो गए थे। उन्होंने अच्छी ज़िंदगी गुज़ारी थी। आज़ादी से पहले तक। बाद में उन पर टूटने वाले सामाजिक और राजनीति कहर ने मुसलमान को इस देश में किस तरह दोयम दर्जे का नागिरक बना दिया कि उसे हर क़दम पर परेशानियों और तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है। ड्रामे का मुख्य किरदार मंच पर झोपड़ीनुमा दो कमरों के कच्चे मकान में अपने बीवी-बच्चों के साथ बैठा है। वह बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के अपने जीवन में एक मुसलमान होने के नाते सरकार और समाज की ओर से की जाने वाली मुसीबातों को रोते हुए बयान करता है। इस दौरान उसकी बीवी घर के अंदर अन्य कामों में लगी रहती है। साथ ही ज़रा-सा भी शोर होने पर बार-बार शंकित चेहरे के साथ खिड़की से बाहर झांकने लगती है।
अपनी उस पूरी रुदाद को सुनाने में उस मुख्य किरदार को दो घंटे का समय लगता है, और इसीलिए उस नाटक का नाम ‘दो घंटे का मुसलमान’ रखा गया था, जिसके आख़िर में मुख्य किरदार यह कहते हुए,
‘यहां, इस देश में एक मुसलमान को इसलिए नहीं मारा जाता कि उसने कोई जुर्म किया है, उसे केवल इसलिए मार दिया जाता है, क्योंकि वह मुसलमान है।’
इस वाक्य के साथ ही मंच पर कारुणिक संगीत के साथ अंधेरा छा जाता है। कुछ लम्हों बाद धीमी-धीमी रोशनी होनी शुरू होती है, जो मद्धिम प्रकाश के साथ ठहर जाती है। उसी धीमी रोशन के बीच किसी कंकाल की तरह मुख्य किरदार उठ खड़ा होता है। घोषणा करता है कि अब से वह इस्लाम धर्म छोड़ रहा है और इस देश के मूल धर्म में लौट रहा है। बहुसंख्यकों के धर्म में। इसके बाद कम-से-कम उसे दंगों में मार दिए जाने या खुद का घर जला दिये जाने का खौफ़ तो नहीं रहेगा।
धीमी होती रोशनी के साथ पूरा मंच अंधेरे में डूब जाता है। अगले ही पल मंच पर एकाएक चमकदार रोशनी बिखर जाती है और सभी कलाकार कतारबद्ध खड़े होकर दर्शकों का अभिवादन करते हुए दिखाई देते हैं।
हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है। दर्शक उठ खड़े होते हैं।
उस ड्रामे को स्टैंडिंग ऑवेशन मिला था। काफी देर तक लोग खड़े होकर ताली बजाते रहे थे। कुछ लोग तो भावुक भी हो गए थे, जिनमें मैं भी शामिल था। अगले दिन के अख़बारों के प्रथम पृष्ठ पर भी सबसे ज्यादा उसी ड्रामे की चर्चा थी, जो कईं दिनों तक चलती रही थी।
उसी फंक्शन में पाटिल ने मुझे और मिसेज को एक लड़की से मिलाया था। घने बाल, गोरी रंगत और कजरारी आंखों वाली उस लड़की का नाम फ़रीदा था। वह शायरा थी। उसका तख़ल्लुस ‘ख़ानम’ था। शायरा फ़रीदा ख़ानम। मिसेज उससे मिलकर बहुत खुश हुई। वह उससे किसी दोस्त की तरह मिली थी। उन्होंने उन दोनों को आने वाले इतवार को चाय पर आमंत्रित किया था।
फंक्शन के बाद का सप्ताह बहुत व्यस्त रहा। कॉलेज में हम कम ही मिल पाए। मिले तो बात न हो सकी। इतवार को टैरेस पर बैठे बाते करते हुए उन दोनों ने अपने प्रेम के बारे में बताया था। पहली मुलाकात और फिर उसके बाद होने वाली घटनाओं का ज़िक्र। यह भी कि वे साथ ज़िंदगी गुज़ारने के ख़ाहिशमंद थे।
विजय पाटिल ने चाय का सिप लेते हुए इस बारे में कहा था, ‘मुझे ज्यादा चिंता नहीं है।’
उसके पास केवल मां थी, जिन्हें अपने बेटी की पसंद पर कोई एतराज नहीं था। एक दूर के रिश्तेदार थे, जो मुंबई में रहते थे और जिनके साथ उनका पारिवारिक संबंध कब का खत्म हो चुका था।
फ़रीदा को भी यकीन था कि वह इस रिश्ते के लिए अपने पैरेंट्स को मना लेगी। उसने जिस तरह अपनी फैमिली के बारे में बताया था, उससे हमे भी इत्मिनान हुआ था।
‘जो मुस्लिम परिवार अपनी बेटी को इतना पढ़ने-लिखने की इजाज़त दे सकता है, उसके रूढ़िवादी होने की कम ही संभावना है।’
उनके जाने के बाद मैंने मिसेज की ओर देखते हुए मैंने कहा था।
उसने किसी अनचाहे बेयकीनी के भाव के साथ मेरी ओर देखा और कोई जवाब दिए बिना रसोई में चली गई।
सब ठीक था। सेमेस्टर एग्जाम हो चुके थे। मिलने के लिए विजय कभी-कभी मेरे घर चला आता था। एक बार वह काफी अरसे बाद आया। मैंने इतने दिन बाद आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह बीते दिनों फ़रीदा के घर वालों को मनाने की कोशिश में लगा हुआ था।
‘उनकी तरफ़ से अभी तक कोई तर्कसम्मत जवाब नहीं मिला है,’ उसने कहा था, ‘आने वाले संडे को फिर उसके घर जाना है। सोचता हूं कि अगर इस बार भी वे लोग नहीं माने तो हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे।’
वह ख़ामोश हो गया। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने किसी बच्चे की-सी छोटी-छोटी पनीली आंखों से मेरी ओर देखा और बोला, ‘उस दौरान क्या कुछ वक्त हम आपके यहां रुक सकते हैं?’
मैंने भी उसकी ओर देखा और फिर आहिस्ता से उसका हाथ अपने हाथों में लेकर धीरे से दबा दिया।
उसने कहा था कि अगर वे लोग नहीं माने तो वह उसी वक्त फ़रीदा के साथ मेरे यहां आ जाएगा। अगले दिन जैसे ही कोर्ट खुलेगा वे दोनों शादी कर लेंगे।
इतवार की शाम खाना खाने के बाद मैं कुछ देर टहलता रहा। उसके बाद चाय पी और फिर दरवाज़े के पास कुर्सी रखकर बैठ गया। इस उम्मीद में कि वे लोग जिस वक्त भी आएंगे, झट से दरवाज़ा खोल दूंगा।
वक्त बिताने के लिए मैं मंटो की कहानियां पढ़ने लगा।
नहीं जानता कब झपकी आई। एक खटके से आंख खुली। वह हॉकर था, जो अखबार डालकर गया था।
दिन निकल आया था। दरवाज़ा खोलकर बाहर आया तो सड़क गीली थी और नन्ही-नन्हीं शाखाओं सहित हरे पत्ते जहां-तहां बिखरे हुए थे। शायद रात बारिश आई थी… तूफान भी।
मैंने अखबार उठाया और अंदर आ गया। खड़े-खड़े ही बेध्यानी में अखबार खोला और धक से रह गया। यूं जैसे किसी ने एकाएक मेरी पीठ पर वार कर दिया हो। मैं चेयर पर ढह पड़ा… और आंखों से आंसू बहने लगे। क्या वह इस समाज को नहीं जानता था?

