Friday, March 20, 2026
Homeभारतमैटरनिटी लीव पर SC का ऐतिहासिक फैसला, अब सभी दत्तक माताओं को...

मैटरनिटी लीव पर SC का ऐतिहासिक फैसला, अब सभी दत्तक माताओं को मिलेगा 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य इस बात से नहीं बदलता कि बच्चा परिवार में किस तरह आया है। अदालत ने कहा कि गोद लेना भी परिवार बनाने का उतना ही वैध और महत्वपूर्ण तरीका है जितना जैविक जन्म, इसलिए दत्तक और जैविक माताओं के बीच इस आधार पर अंतर करना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

नई दिल्लीः मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। दत्तक माताओं (बच्चे को गोद लेने वाली माँ) के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसले में अदालत ने कहा कि अब बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, हर दत्तक माँको 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा। कोर्ट ने उस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही यह सुविधा मिलती थी।

यह मामला ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ की धारा 60(4) से जुड़ा था, जिसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 की धारा 5(4) में भी शामिल किया गया था। कर्नाटक की वकील हंसाानंदिनी नंदूरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इसे भेदभावपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान महिलाओं और बच्चों, दोनों के साथ अन्याय करता है।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य इस बात से नहीं बदलता कि बच्चा परिवार में किस तरह आया है। अदालत ने कहा कि गोद लेना भी परिवार बनाने का उतना ही वैध और महत्वपूर्ण तरीका है जितना जैविक जन्म, इसलिए दत्तक और जैविक माताओं के बीच इस आधार पर अंतर करना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

मैटरनिटी लीव पर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान संविधान के भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रजनन का अधिकार केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं है, बल्कि गोद लेना भी इसका हिस्सा है।

कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कानूनों में ऐसी श्रेणीकरण वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज करता है। बड़े बच्चे को गोद लेने वाली मां को भी उतना ही समय और भावनात्मक निवेश करना पड़ता है, जितना छोटे बच्चे के मामले में।

फैसले में अदालत ने बच्चे के सर्वोत्तम हित को सबसे ऊपर रखा। कोर्ट ने कहा कि खासकर संस्थानों से गोद लिए गए बड़े बच्चों को नए परिवार में ढलने के लिए ज्यादा समय और देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में मातृत्व अवकाश से वंचित करना बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

पूरा मामला यहां समझें?

यह याचिका मूल रूप से वर्ष 2021 में दायर की गई थी, जिसमें मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) को चुनौती दी गई थी। इस धारा में 2017 के संशोधन के बाद यह प्रावधान किया गया था कि गोद लेने वाली माँ को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश तभी मिलेगा, जब गोद लिया गया बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो।

12 नवंबर 2024 को उच्चतम न्यायालय ने एक दत्तक माँ द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने 2017 से अब तक दो बच्चों को गोद लिया है और उसे इस प्रावधान के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ा।

बाद में, जब सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 लागू हुई और उसने पुराने कानून को निरस्त कर दिया, तो विवाद का केंद्र इसी संहिता में मौजूद समान प्रावधान पर आ गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह नियम मनमाना है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(छ) का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह महिलाओं के लिए गोद लेने की प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से कठिन बना देता है।

याचिका में यह भी बताया गया कि केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण की प्रक्रिया के तहत किसी परित्यक्त या अनाथ बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने योग्य घोषित करने में बाल कल्याण समिति को दो से चार महीने तक का समय लग सकता है। वहीं, जैविक माता-पिता द्वारा सौंपे गए बच्चों के मामलों में 60 दिनों की अनिवार्य पुनर्विचार अवधि होती है। ऐसे में तीन महीने की सीमा पूरी तरह अव्यावहारिक साबित होती है।

29 जनवरी 2025 को इस मामले में विस्तृत सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि गोद लेने की पूरी प्रक्रिया किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत संचालित होती है, और इस कानून की प्रकृति को देखते हुए तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ से वंचित करना अन्यायपूर्ण है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने तीन महीने की उम्र सीमा के औचित्य पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इस तरह का वर्गीकरण वास्तव में किसी तार्किक उद्देश्य को पूरा करता है या नहीं। केंद्र सरकार ने दलील दी कि जैविक माताओं को अधिक अवकाश इसलिए दिया जाता है क्योंकि उन्हें प्रसव के बाद शारीरिक रूप से उबरने के लिए समय चाहिए। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके सामने मुख्य सवाल अवकाश की अवधि नहीं, बल्कि बच्चे की उम्र के आधार पर दत्तक माताओं को इस अधिकार से वंचित करने का था।

न्यायालय ने यह भी चिंता जताई कि अगर किसी दत्तक माँ को पूरी तरह मातृत्व अवकाश से वंचित कर दिया जाए, तो वह बड़े बच्चे की देखभाल और उसके नए माहौल में समायोजन में कैसे मदद कर पाएगी। अदालत ने यह भी माना कि भारत में कानूनी प्रक्रिया के चलते तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेना बेहद दुर्लभ होता है। ऐसे में उम्र की यह सीमा व्यवहारिक रूप से अव्यावहारिक थी और दत्तक माताओं को उनके अधिकार से वंचित करती थी।

पीठ ने समाज में ‘केयरगिविंग’ यानी देखभाल की जिम्मेदारी को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को एक सामाजिक कल्याण उपाय के रूप में लागू करने पर विचार करे।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments