हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज‘ एक बार फिर विवादों में घिर गई है। करीब चार साल के लंबे इंतजार के बाद 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर चुपके से रिलीज और फिर 48 घंटे में हटाए जाने के बाद मामले ने राजनीतिक और कानूनी रंग ले लिया है। एक ओर निर्माता इस फैसले को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर फिल्म के खिलाफ गृह मंत्रालय में शिकायत देकर अभिनेता दिलजीत दोसांझ, निर्देशक हनी त्रेहान और जी 5 के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की गई है।
सतलुज पहले पंजाब 95 के नाम से रिलीज होने वाली थी लेकिन सेंसर बोर्ड द्वारा प्रस्तावित 127 कट्स और टाइटल पर आपत्ति के बाद मेकर्स ने इसे सतलुज नाम से रिलीज का फैसला किया। हालांकि 48 घंटे के भीतर ही फिल्म को ओटीटी से हटा दिया गया। रविवार को जी5 ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि मौजूदा परिस्थितियों के कारण ‘सतलुज’ भारत में अगले आदेश तक उपलब्ध नहीं रहेगी। हालांकि फिल्म जी5 ग्लोबल पर भारत से बाहर के दर्शकों के लिए उपलब्ध है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म ने साथ ही फिल्म और उसकी रचनात्मक सोच के प्रति अपना समर्थन जताते हुए कहा कि वह उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत हर संभव प्रयास करेगा ताकि फिल्म को जल्द दोबारा भारतीय दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया जा सके।
सरकार ने क्या कहा है?
फिल्म हटाए जाने के बाद सह-निर्माता रॉनी स्क्रूवाला की कंपनी आरएसवीपी मूवी (RSVP Movies) के प्रवक्ता ने पुष्टि की कि फिल्म सरकार के निर्देश पर हटाई गई है और उम्मीद जताई कि यह जल्द वापस आ सकती है।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने एक सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया कि निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए 127 कट्स स्वीकार नहीं किए और बिना प्रमाणपत्र के नया नाम देकर फिल्म सीधे ओटीटी पर रिलीज कर दी।
सरकारी अधिकारी के अनुसार, फिल्म के कुछ हिस्सों के दुरुपयोग की आशंका और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को देखते हुए जी5 को सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत फिल्म हटाने के निर्देश दिए गए। अधिकारी का कहना था कि यदि निर्माता फिल्म को थिएटर और ओटीटी दोनों माध्यमों पर जारी करना चाहते हैं तो उन्हें निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
पटकथा लेखक ने उठाए सवाल
फिल्म के सह-पटकथा लेखक निरैन भट्ट ने कहा कि चार वर्षों से किसी भी सरकारी संस्था ने यह नहीं बताया कि आखिर फिल्म के किस हिस्से पर आपत्ति है। उन्होंने कहा कि अगर किसी को फिल्म से समस्या है तो उस पर खुलकर बातचीत होनी चाहिए, लेकिन यहां सिर्फ “चुप्पी” रही है। उनके मुताबिक, फिल्म किसी राजनीतिक एजेंडे पर नहीं बल्कि एक ऐसे आम बैंक कर्मचारी की कहानी है, जिसने हजारों परिवारों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म को भारत विरोधी ताकतों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की आशंका का तर्क उन्हें समझ नहीं आता। उनके अनुसार, यह मूल रूप से मानवाधिकार और न्याय की कहानी है। भट्ट ने कहा कि निर्माता अब अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। उन्होंने कहा कि अगर किसी को फिल्म से आपत्ति है तो उसे अदालत में उसका स्पष्ट आधार बताना होगा।
क्या है यह फिल्म, चार साल तक क्यों अटकी रही?
‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। अमृतसर के रहने वाले खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में कथित तौर पर हजारों अज्ञात शवों के गुप्त अंतिम संस्कार और कथित फर्जी मुठभेड़ों का मामला उजागर किया था। बाद में 1995 में उनका अपहरण कर हत्या कर दी गई। साल 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को उनके अपहरण और हत्या का दोषी ठहराया गया था। बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उनकी सजा बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी।
फिल्म की मुश्किलें 2022 में शुरू हुईं, जब इसे ‘पंजाब ’95’ नाम से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास भेजा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 127 कट्स सुझाए। निर्माता इन बदलावों से सहमत नहीं हुए। इससे पहले फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ था। यह पंजाबी इतिहास का एक महत्वपूर्ण शब्द है, जिसका संबंध 1746, 1762 और 1984 में सिखों के नरसंहार से जोड़ा जाता है। बाद में बदलकर ‘पंजाब ’95’ किया गया और आखिरकार OTT रिलीज के समय इसका नाम ‘सतलुज’ रखा गया।
निर्देशक हनी त्रेहान के मुताबिक, उन्हें पहले वाला शीर्षक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं मिली थी। फिल्म 7 फरवरी 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली थी, लेकिन यह रिलीज कभी नहीं हो सकी। 2023 में इसका टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) प्रीमियर भी अंतिम समय में रद्द हो गया था।
फिल्म के खिलाफ FIR की मांग
इसी बीच विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। अधिवक्ता विनीत जिंदल ने गृह मंत्रालय में शिकायत देकर दिलजीत दोसांझ, फिल्म के निर्देशक और जी5 के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
जिंदल का आरोप है कि फिल्म आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और अलगाववादी विचारधारा के प्रति सहानुभूति पैदा करती है तथा पंजाब में 1980 और 1990 के दशक के उग्रवाद से जुड़े घटनाक्रम को भ्रामक तरीके से पेश करती है।
उन्होंने अपनी शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (BNS), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत में क्या आरोप लगाए गए?
विनीत जिंदल ने शिकायत में कहा कि निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और 127 कट्स को स्वीकार करने के बजाय फिल्म का नाम बदलकर सीधे ओटीटी पर रिलीज कर दिया, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने वैधानिक प्रमाणन प्रक्रिया से बचने का प्रयास किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म पंजाब में उग्रवाद से जुड़े घटनाक्रम को इस तरह प्रस्तुत करती है जिससे आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और अलगाववादी विचारधारा का महिमामंडन हो सकता है। शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करती है और उन सैनिकों, पुलिसकर्मियों तथा निर्दोष नागरिकों के बलिदान को कमजोर करती है जिन्होंने उस दौर में अपनी जान गंवाई थी।
जिंदल ने यह भी कहा कि फिल्म के कुछ दृश्य कथित तौर पर खालिस्तानी आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति पैदा करते हैं, जो चरमपंथी नैरेटिव को मजबूत कर सकते हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा व सांप्रदायिक सौहार्द पर असर डाल सकते हैं।
उनका यह भी कहना है कि सेंसर बोर्ड की आपत्तियों को शामिल किए बिना फिल्म रिलीज करना पंजाब में जनभावनाओं को भड़का सकता है तथा सामाजिक अशांति पैदा कर सकता है।
दिलजीत दोसांझ ने क्या कहा?
फिल्म हटने से पहले ही दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम लाइव में कहा था कि उन्हें आशंका है कि फिल्म जल्द हट सकती है और लोगों से इसे जल्द देखने तथा डाउनलोड करने की अपील की थी।
फिल्म हटने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि कम समय के लिए ही सही, लेकिन जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी लोगों तक पहुंची। उन्होंने यह भी कहा कि “जो ‘सतलुज’ के साथ हुआ, वही कभी जसवंत सिंह खालड़ा के साथ भी हुआ था।”
फिल्म को लेकर उठे विवाद पर फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) का भी बयान आया है। फेडरेशन के अध्यक्ष बीएन तिवारी ने भी ‘सतलुज’ विवाद पर कहा कि कलाकारों को सिर्फ आर्थिक लाभ के लिए फिल्में नहीं करनी चाहिए, बल्कि रोल चुनते समय अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक छवि का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी फिल्म की सामग्री से सामाजिक सद्भाव प्रभावित होने या उसका गलत इस्तेमाल होने की आशंका हो तो उसकी गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए।
हालांकि, बीएन तिवारी ने सेंसर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि अगर सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर आपत्तियां जताई थीं, तो उन पर अंतिम फैसला सेंसरशिप के दौरान ही हो जाना चाहिए था। उनके अनुसार, या तो फिल्म को शुरुआत में ही मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए थी या फिर सभी आवश्यक बदलावों के बाद उसे बिना किसी नए विवाद के रिलीज होने देना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि दिलजीत दोसांझ जैसे लोकप्रिय कलाकारों को फिल्में चुनते समय उनके व्यापक सामाजिक प्रभाव और राष्ट्रीय हित जैसे पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज
फिल्म हटाए जाने के बाद राजनीतिक दलों की ओर से भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने कहा कि फिल्म रोकने से सच नहीं रुक सकता। उन्होंने कहा कि आज हर युवा यह जानना चाहता है कि 1990 के दशक में भाई जसवंत सिंह खालड़ा के साथ क्या हुआ, किन आवाजों को दबाया गया और इतिहास को दिखाने से डर क्यों है। उन्होंने कहा कि इतिहास पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने ‘सतलुज’ के समर्थन में बयान दिया है। एसजीपीसी के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मन्नन ने लोगों, खासकर युवाओं से फिल्म देखने की अपील करते हुए कहा कि यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, उनके संघर्ष और पंजाब के उस दौर की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि खालड़ा ने कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों को उजागर करने के लिए लंबा संघर्ष किया था और फिल्म उसी इतिहास को सामने लाने का प्रयास करती है।
मन्नन ने कहा कि इतिहास और समाज से जुड़े ऐसे विषयों पर आधारित फिल्मों को खुले मन से देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर फिल्म में किसी स्तर पर आवश्यक सुधार किए गए हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन नई पीढ़ी को उस दौर की घटनाओं से परिचित कराना भी उतना ही जरूरी है।
वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि 1990 के दशक में पंजाब ने आतंकवाद और हिंसा का बेहद दर्दनाक दौर देखा था, जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों और पुलिसकर्मियों की जान गई। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा ने उस समय मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाया था और बाद में उनकी भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। उन्होंने कहा कि पंजाब के उस दौर की सच्चाई को समझना और सामने लाना जरूरी है।

