सिंधु जल संधि (IWT) पर सितंबर 1960 में हस्ताक्षर के बाद चिनाब नदी पर जो पहला जलविद्युत स्टेशन भारत ने बनाया, वो 690 मेगावाट का सलाल पावर स्टेशन था। चिनाब पश्चिमी नदियों में से एक है। इसमें 115 मेगावाट की छह इकाइयाँ हैं, लेकिन पाकिस्तान की कुछ डिजाइन संबंधी आपत्तियों के कारण भारत को समझौता करना पड़ा। मूल डिजाइन में छह अंडर-स्लूस गेट (बांध के निचले हिस्से में स्थित गेट) और छह सिल्ट एक्सक्लूडर गेट थे। उस समय के भारतीय विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के आगा शाही के बीच हुई चर्चाओं के बाद अंडर-स्लूस गेटों को कंक्रीट से भर दिया गया।
इन अंडर-स्लूस गेटों के बंद हो जाने का मतलब यह हुआ कि बांध में उचित अवसाद (सिल्ट) प्रबंधन की सुविधा उपलब्ध नहीं रही।
यह एक बड़ा झटका साबित हुआ, क्योंकि अगले कुछ दशकों में नदी की धाराओं द्वारा लाई गई गाद से सलाल बांध का जलाशय भरता गया। व्यापक रूप से माना जाता है कि इस कारण इसकी भंडारण क्षमता का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नष्ट हो गया, जिससे अक्टूबर के अंत से अप्रैल के मध्य तक के कम जलप्रवाह (लीन फ्लो) वाले महीनों में बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई। लगभग 15 मई के आसपास जब हिमपात पिघलने से नदी में जलप्रवाह बढ़ता है, तभी बिजली उत्पादन अपने चरम स्तर पर पहुंच पाता है।
पिछले साल 23 अप्रैल को सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के बाद सरकार ने सलाल परियोजना को पुनर्जीवित करने के लिए सक्रिय कदम उठाने शुरू किए हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य सर्दियों में जलाशय की क्षमता बढ़ाने के लिए गाद हटाना है। इससे कड़ाके की सर्दियों में बिजली उत्पादन में सुधार हो सकेगा, जब बिजली की मांग चरम पर होती है और जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश को उत्तरी ग्रिड से महंगी बिजली आयात करनी पड़ती है।

सलाल की परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए तीन प्रमुख उपाय- ड्रेजिंग, फ्लशिंग और अंडर-स्लूस गेटों के पुनर्जीवन की योजना बनाई जा रही है।
बांध के जलाशय की गाद निकालने का काम कोलकाता की रीच ड्रेजिंग लिमिटेड को सौंपा गया है और कंपनी से कम से कम एक लाख मीट्रिक टन गाद हटाने की अपेक्षा है। कंपनी ने नवंबर के अंतिम सप्ताह में इस परियोजना पर काम शुरू किया था और अब तक कुछ प्रगति भी की है।
यह कंपनी नदी इंजीनियरिंग, भूमि पुनर्भरण (लैंड रिक्लेमेशन) और पोर्टेबल ड्रेजरों के संचालन में विशेषज्ञता रखती है। भारत में यह एकमात्र ड्रेजर निर्माता कंपनी मानी जाती है और 2010 में स्थापना के बाद से इसने छोटे और बड़े मिलाकर 500 से अधिक परियोजनाएं पूरी की हैं।
इसी के साथ, मुंबई की धरती ड्रेजिंग एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को भी सलाल जलाशय के पुनर्जीवन योजना में शामिल किया गया है। आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां (स्टैच्यूटरी क्लीयरेंस) प्रक्रिया में हैं, जिसके बाद कार्य को पूरी गंभीरता से शुरू किया जाएगा।
अलग से, स्थायी रूप से बंद किए गए अंडर-स्लूस गेटों को फिर से शुरू करने के लिए 9 फरवरी को एक टेंडर जारी किया गया है। एक अधिकारी के अनुसार, ‘निविदा जमा करने की अंतिम तिथि 23 मार्च है।’
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कंक्रीट से भरे गए अंडर-स्लूस गेटों को किस तकनीकी तरीके से फिर से खोला जाएगा।
सलाल जलाशय की मूल भंडारण क्षमता 284 मिलियन घन मीटर (एमसीएम) घटकर मात्र 9.91 मिलियन घन मीटर रह गई थी। जनवरी 2026 तक इसमें मामूली सुधार हुआ और यह बढ़कर 14 मिलियन घन मीटर हो गई। हालांकि, अब मूल भंडारण क्षमता तक पहुंचने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसका अर्थ है 9.91 मिलियन घन मीटर क्षमता से लगभग 30 गुना अधिक भंडारण करने के लिए इसे फिर से तैयार करना। इससे सलाल से मात्र 50 किलोमीटर दूर स्थित पाकिस्तान के मराला हेडवर्क्स पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
आने वाले महीनों और वर्षों में भारत IWT को स्थगित करने के फैसले के परिणाम सामने आएंगे। हालांकि पाकिस्तान बार-बार दावा करता रहा है कि उसके हिस्से के निचले जल प्रवाह को रोकना ‘युद्ध की कार्रवाई’ के समान है, लेकिन भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना उसके लिए आसान विकल्प नहीं है। ऐसे में प्रतीत होता है कि पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे भारत विरोधी दुष्प्रचार का शोर आने वाले दिनों में तेजी से बढ़ेगा।
चिनाब नदी पर सलाल बांध द्वारा निर्मित 22 किलोमीटर लंबे जलाशय में नाजुक भूवैज्ञानिक संरचनाओं, खड़ी और अस्थिर ढलानों, तीव्र मानसूनी बारिश और क्षेत्र में लगातार भूकंपीय गतिविधि के कारण भारी मात्रा में गाद का प्रवाह होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि हिमालय की तेज बहने वाली नदियों में गाद की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो एक तरह से विश्व स्तर पर सबसे अधिक है।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय विद्युत और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने 4 जनवरी को सलाल परियोजना में गाद हटाने का निर्देश दिया ताकि भारत और पाकिस्तान के बीच संधि के स्थगित रहने के मद्देनजर जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। उनके दौरे और अधिकारियों के साथ परामर्श के परिणामस्वरूप कई नियोजित और विभिन्न चरणों में चल रहे जलविद्युत संयंत्रों के निर्माण में तेजी आई है।
ऐसा लगता है कि मोदी सरकार अब विभिन्न परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पूरी तरह से जुट गई है और IWT पर पाकिस्तान को किसी भी प्रकार की राहत देने के मूड में नहीं है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि 2029 के लोकसभा चुनावों के दौरान IWT को स्थगित रखना भाजपा के मुख्य नारों में से एक होगा।

