Saturday, November 29, 2025
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स्मरणः जिंदगी के पाले में ‘मौत’ और राजी सेठ की कहानियां

राजी सेठ का अवसान साहित्यिक परिदृश्य से एक ऐसी रचनाकार का चले जाना है, जिसने नारी-मन की जटिलताओं और सामाजिक यथार्थ को एक अनोखी संवेदनशीलता से उकेरा। उनकी कहानियाँ केवल घटनाओं का वृत्तांत नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों के उस सूक्ष्म ताने-बाने को पकड़ती थीं। उन्होंने स्त्री-विमर्श को एक सैद्धांतिक आधार तो दिया, पर उसे खोखले नारेबाजी में कभी भी बदलने नहीं दिया। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि में तीक्ष्णता और संवेदना का अद्भुत समन्वय था। एक उत्कृष्ट अनुवादक, समीक्षक और चिंतक के रूप में भी उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध ही किया। ‘मृत्यु’ को वो अपनी रचनाओं में किस तरह देखती और गढती थी यहां यह पड़ताल कर रही हैं आलोचक रश्मि रावत –

सुप्रसिद्ध कवि कात्यायनी की कविता है ‘मौत से’ –

“मौत से/ बहुत अच्छी तरह/ वाकिफ होना है जरूरी है/फैसलाकुन ढंग से/जिंदगी के पाले में/खड़ा होने के लिए।” यह सही भी है, मृत्यु को गरिमा देना प्रकारांतर से जिंदगी को गरिमा देना है। उसे विस्मृति के गर्त में डालना दरअसल जीवन से आँखें चुराना है।

राजी सेठ की कहानियों में म़ृत्यु अनेक रूपों में आती है। वे उसकी दार्शनिक व्याख्याओं में नहीं उलझतीं। मृत्यु जीवन का अनिवार्य पहलू है। जीवन को अबाध आगे चलना ही होता है। उनका सरोकार यह है कि इस अपरिहार्य सत्य का सामना कैसे किया जाए और कैसे उसका अतिक्रमण कर मृतक के करीबी लोग जीवन की स्थगित लय को फिर पा सकें। जिजीविषा को एक नया रूप देती ये कहानियाँ समाज में प्रचलित शोक के रस्मों-तरीकों को भी प्रश्नांकित करती हैं। शोक में भागीदारी करने के तरीके इतने स्थूल और फूहड़ हैं कि शोकाकुल को दो मोर्चों पर जूझना पड़ता है  आत्मीय को खो देने की वेदना में डूब-उबर सकने के लिए एकांत या वांछित संवेदना-समृद्ध संवाद को पाना तो दुष्कर है ही, भीतर उतरने और बाहर आने की जरा सी मोहलत के लिए उसे चेहरे पर  झूठी मुस्कान या कोई मुखौटा धारण करना पड़ता है। 

रमेश दवे के साथ हुई बातचीत में राजी सेठ ने कहा है कि “अपनी रचनाओं में मृत्यु का उपयोग मैंने एक आत्यांतिक इंटेंस स्थिति को पा सकने की गरज से किया है। टर्मिनल प्वाइंट पर खड़े होकर देखने से स्थिति, घटनाक्रम ऐंगल सब बदल जाता है, तब पात्रों पर उन घटनाओं का प्रभाव भी मेरे लिए जाँचने-परखने की चीज हो जाता है।

 ……..मृत्यु का विचार, क्योंकि जन्म के साथ ही पैदा हो जाता है, इसलिए इसके अस्तित्व को लेकर एक मानसिक खाँचा, हर किसी के दिमाग में पहले से रहता है, जो जीवन-अनुभव के हस्तक्षेप के चलते जुड़ता-घटता रहता है। जैविक वास्तविकता के अलावा मृत्यु का विचार एक मानसिक विचार भी है, जो औरों की तरह मेरे मनाकाश में भी रहता आया है। जिसका उपयोग जीवन के ही एक आयाम की तरह हम रचनाओं में भी करते ही रहते हैं- एक स्थिति-परिस्थिति की तरह। संयोगवश आत्मीयों की अकाल मृत्यु जैसी कई दुर्घटनाएँ भी जीवन में कुछ कम नहीं घटी। उन्होंने मानसिक खाँचों को काफी दूर तक हिलाया-डुलाया भी। नई वास्तविकताओं से सामना करना पड़ा, जिसमें विस्मृति और सृजनात्मकता दोनों ने काफी सहारा दिया।”(पृष्ठ- 198, पगडंडियों पर पाँव, भावना प्रकाशन. 2013) 

उनकी अनेक रचनाओं में शोक झेलने के लिए अभिशप्त व्यक्तियों के लिए (जैसे ‘तत्सम’ की वसुधा) ‘नंगा करना’, ‘उघड़ना’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए हैं। आत्मीय की मृत्यु उनकी शख्सियत को परिवेश की मनमानी के लिए जैसे निष्कवच और सार्वजनिक बना देती है। लिहाजा व्यक्ति को आत्मरक्षा के लिए किलेबंदी की कोई तजवीज निकाल कर ही आगे बढ़ना संभव है, जिससे वह अपने अनंत अभाव को कोई रचनात्मक रुख दे सके। परिवेशगत औपचारिकताएँ, दया, सलाहें और सहानुभूतियां जिस अंदाज में उंडेली जाती हैं, उनसे शोकग्रस्त व्यक्ति की जीवनी-शक्ति में इजाफा होना तो दूर, उल्टे लगता है जैसे उसे कोरा पन्ना समझ कर लोगों को उस पर कुछ भी लिख देने की आजादी मिल गई हो। इन सबके बीच रास्ते निकाल कर जीवन-लय पाने की पात्रों की जो जद्दोजहद इन कहानियों में आई है, वह आधुनिक जीवन के यथार्थ का जरूरी पहलू है। 

‘तत्सम’, ‘पुल’, ‘यह कहानी नहीं’  जैसी कहानियों में युवावस्था और कच्ची उम्र में औचक आने वाली मृत्यु अप्राकृतिक और अस्वाभाविक है। जो तंत्र और प्रणाली ऐसी मृत्युओं की जिम्मेदार है, उसी के दायरे में उस विराट अभाव के दुःख को गरिमापूर्ण ढंग से कैसे जिया जा सकता है? इन रचनाओं में पीछे छूट गए लोगों के जीवन का सबसे बड़ा दुख उनकी चेतना के अब तक बंद रहे रंध्रों को खोलता है और वे उन नए सूराखों से जीवन का नवनिर्माण करते हैं।

आकस्मिक दुर्घटनाओं की आवृत्तियाँ  आज आधुनिक जीवन-शैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी हैं। इस यथार्थ का संवेदनयुक्त तरीके से साहित्य में अधिकाधिक आना समकालीन व्यवस्था पर पुनर्विचार के लिए भी जरूरी है। ‘पुल’ में करतारसिंह और वीरा के इकलौते युवा बेटे की दुर्घटना में मृत्यु होने से माँ के भीतर हर इच्छा, उछाह, ललक … उसकी समूची आंतरिक दुनिया जैसे भस्मीभूत हो जाती है। उसके मन से अपने बेटे की मंगेतर की शादी पर आशीर्वाद तक नहीं निकलता। मगर फिर शोक को भीतर ही जज्ब करने की पति की कातर विवशता देखकर वह अपने कलेजे को मजबूत करती है। 

‘यह कहानी नहीं’ और ‘पुल’ दोनों ही कहानियों की माएं अपनी संतानरहित उजाड़ जिंदगी का शोक मनाकर, वेदना को अभिव्यक्ति देकर, उस घटित को अतीत का हिस्सा मान लेने की हिम्मत जुटा लेती हैं। ‘यह कहानी नहीं’ की माँ को बच्चों की तस्वीरें फैलाए देखकर वाचक को लगता है कि आँटी थोड़ी संभल गई हैं। इसी तरह स्कूल के उद्घाटन के समय बेटे की आदमकद तस्वीर के सामने क्षणांश के लिए विस्मित होकर खड़ी मां उसे तस्वीर की तरह देख पाती हैं। जिंदगी से छिटककर दीवार की स्थिरता बन चुकी सच्चाई की पीड़ा चिरस्थायी है, मगर उसे वे स्वीकार चुकी हैं। दूसरी ओर पिता के चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली हल्की सी मुस्कान उनके संयम और साहस की खबर देते रहती है। पीड़ा के प्रदेश में पैर रखने की मनाही उनके हाव-भाव में साफ दिखती है।

‘यह कहानी नहीं’ कहानी कार दुर्घटना में बेटा-बहू-पोता-पोती को गँवा देने के बाद अकेले छूट गए प्रौढ़ दंपत्ति की किराएदार वाचक के कोण से लिखी गई  कहानी है। वह हर घटना की साक्षात गवाह है और उसे बयान करने के लिए ज़रूरी तटस्थता भी उसमें है। वह एक संवेदनशील लेखिका है, जिसकी आँखों से देखा गया यथार्थ इस कहानी में इतनी सक्षम भाषा में साधा गया है कि पाठक वेदना के गहरे अंधेरे कोनों का एहसास कर पाता है। यहां आंटी की मर्मांतक चीत्कार और सूनी जिंदगी के नैराश्यबोध की वेदना पाठक का अपना अनुभव बन जाती है। जीवन की सामान्य गतिविधियाँ इससे कैसे प्रभावित होती हैं, मिलने वालों की असहजता….सबको समेटते हुए कहानी मृत्यु के शोक को सृजन और नवनिर्माण के उपक्रम में बदलने की ओर चल पड़ती है। 

दरअसल सत्य तो जीवन ही है। मृत्यु तो उसका अभाव है। अभाव का इस कदर बड़ा होना उस भाव के बड़प्पन का ही संकेत है, जिसकी अनुपस्थिति से वह उत्पन्न हुआ है। जो सामने मौजूद है, उसी का सिरा पकड़ कर जीवन के नए धरातल तलाश करने की यात्रा समस्त द्वंद्वों और उतार-चढ़ाव के साथ राजी सेठ की कहानियों में आती है। इनमें मौत के नैराश्य से पार पाकर, उसके निर्मम सत्य से आँखें मिलाकर, जिजीविषा फिर से अर्जित करने और उसकी दीप्ति से अंधेरी सुरंग को पार कर लेने का साहस है।

राजी सेठ के कथा-साहित्य में बारम्बार रेखांकित होता है कि अतीत को बिसरा कर या उससे कतरा कर निकल जाना न व्यक्ति के लिए स्वस्थ लक्षण है, न किसी संस्कृति के लिए। न विभाजन का इतिहास भुला कर देश आगे बढ़ सकता है और न व्यक्ति अपने आत्मीयों को विस्मृत कर। विस्मरण एक अर्थ में एक आंशिक मृत्यु ही है।  ‘यह कहानी नहीं’ की आंटी कहानी के वाचक से, जो एक लेखिका है, अनुनय करती है कि वह उनके मृत बच्चों पर कहानी लिख कर उनके साथ कुछ न्याय करे जिनके साथ जिंदगी ने भीषण अन्याय किया है। भविष्य की पदचापों से रिक्त आंटी पन्नों में उनके अस्तित्व को जिंदा रखना चाहती है। लेखिका उनकी वेदना को कम करने के लिए सहर्ष स्वीकृति देती भी है, मगर लाख कोशिशों के बाद भी वह कहानी नहीं लिख पाती। कहानी लिखी जाने की अपेक्षा में कातर आंटी द्वारा उसे तरह-तरह से सहयोग और प्रेरणा देते जाने की प्रक्रिया का अंकन मार्मिक है। इसमें राजी सेठ की रचना-प्रक्रिया और विभाजन के निजी अनुभव प्रकाश में न आने का मनोविज्ञान भी उद्घाटित होता है। वाचिका के कहानी लिखने में उस विराट अनुभव के समक्ष अकिंचनता का बोध  सबसे बड़ी बाधा है। वह जीवन की विराटता को नोंक भर कलम से थामने का दुस्साहस अंततः नहीं कर पाती। अंत में वह.आंटी को निराश छोड़ कर उनकी कातर अपेक्षाओं से बचने के लिए अपने भाई के घर चली जाती है और वह कहानी अलिखित ही रह जाती है। 

जिजीविषा का जागना अधिक महत्त्वपूर्ण है। जिसके भीतर बच्चों के अस्तित्व और अपनी जिंदगी को गतिशील बनाए रखने की ललक और जीवट जग चुकी हो,  वह ऊर्जा किसी न किसी अन्य रूप में प्रकट होगी ही। बीस दिन बाद ही आँटी उसे बच्चों के नाम से खोले जाने वाले स्कूल के उद्घाटन समारोह के लिए बुलाती है। हालांकि यह अंकल की पहल और सक्रियता से संभव हुआ है, पर इस पूरी प्रक्रिया में आंटी इसीलिए साथ हैं कि वे यहाँ तक पहुँचने की भीतरी यात्रा पन्नों में, इतिहास में, बच्चों के अस्तित्व को बचा सकने की कोशिश में, पूरी कर चुकी हैं।

उस प्रौढ़ दंपत्ति के लिए वह किराएदार स्त्री जितनी आत्मीय है और उनके अंतरंग जीवन में उसकी उपस्थिति का जो महत्त्व है, उससे भी उनके भीतर के व्यापक आकाश का पता चलता है। आगे की कहानी निजी शोक को नवनिर्माण के साझा यज्ञ में बदल कर देश-काल के पन्नों में  अंकल  द्वारा लिखे जाने का अंकन है।

मृत्यु जीवन के महत्त्व को जिस तरह उजागर करती है, उस नवबोध का रसायन अंकल के भीतर बन रहा था। लहूलुहान स्मृतियों और संतानों से बिछोह का असहनीय ताप झेलते, भौंचक भविष्य के सामने अकेले पड़ गए पिता को शायद यह समझ आया हो कि अभाव में साझीदारी संभव नहीं, एक का दुख दूसरे का दुख नहीं बन सकता, लेकिन कसी हुई मुट्ठी खोलकर कुछ सामाजिक रचा जाए तो उस निर्मिति में समावेशिता हो सकती है। उसके रचनात्मक तोष को सबके साथ बांटा और जिया जा सकता है। स्कूल में एक-दूसरे से कुछ दूर दीवार पर लगी पिता और पुत्र की आदमकद तस्वीरों पर पिता की प्रतिक्रिया को जिस गहरी संवेदना से दृश्य से अलग रह कर वाचक देखती है, दरअसल कहानी उस देखने में, उस संवेदना में ही निहित है। कब दृश्य का हिस्सा बनना है और कब उसमें हस्तक्षेप से खुद को रोक लेना है, इसकी बारीक समझ राजी सेठ की कहानियों को बड़ा बनाती हैं। उनकी कलम का यह संयम, यह ठिठक स्पृहणीय है।

“कक्ष की हवा में टंगी चुप्पी। मामा…. देवेन ने आवाज लगाई। मैंने पीछे से देवेन की कमीज पकड़कर उसकी उपस्थिति वहाँ से वापस खींच ली। मुझे लगा, वह हस्तक्षेप अवांछनीय है। उस अचानक चुप पड़ गए अंतराल में कुछ बह रहा है … कहीं न कहीं … किन्हीं आत्माओं के बीच। …अब उनका माथा उन दो चित्रों के बीच के कोरे अंतराल पर टिका हुआ था। एक बाँह पिता के, दूसरी पुत्र के चित्र पर फैली हुई। पीछे से दिखाई देती उनकी पीठ हिल रही थी, बेतहाशा। बेहिसाब। …..कैसे आगे और पीछे की दोनों पीढ़ियों ने उन्हें सलीब पर टाँग दिया है। दोनों बाँहें काटकर जिंदगी के दर्दों के बीच उन्हें अकेला करके फेंक दिया है। और तो और पनपने को प्रतिबद्ध तीसरी पीढ़ी भी इस साजिश में शामिल है। एक बंजर भविष्य की सौगात देकर गई है।……यह तो अंकल का जीवट है कि नियति के आदेशों को वह अपनी सज्जित मुस्कानों से परे ठेल रहे हैं। कितने ही बच्चों के भविष्य को सम्मान से जीने की जमीन दे रहे हैं। दुख की आत्यांतिकता उनके पुरुषार्थ की भट्टी में पिघलकर सार्वजनिक हो जाना चाहती है।”

 वाचक यह सोच कर तकलीफ महसूस करती है कि समारोह में बयानबाजियाँ होंगी और अंकल-आंटी पर दया और करुणा बरसाई जाएगी। मगर वाचक और उनका भाँजा देवेन जानते हैं कि अंकल अपना कातर चेहरा किसी को नहीं दिखाएंगे। ‘देखना ही हो तो सामने देखें- जहाँ स्कूल है। समारोह है। निर्माण है।’ इस वाक्य के साथ महादुख का सर्वजनीकरण करते हुए यह कहानी पूर्ण होती है। 

वेदना के प्रति संवेदनशीलता और सच्चाई न होने पर उसे बांटने की अनिच्छा का मनोविज्ञान ‘अमूर्त कुछ’ कहानी में भी आया है। सुम्मी अपने भाई के बचपन के सहपाठी कप्पी से प्रेम करती है। कप्पी का आर्थिक स्तर कमतर होने के कारण उनके रागात्मक संबंध भाई को नापसंद हैं। दोस्त के रूप में भी वह ऊपरी औपचारिकता और शिष्टाचार निभाते हुए कप्पी को हीन समझता है। दुर्घटना में कप्पी की मृत्यु होने पर सुम्मी भाई के सामने तटस्थ बनी रहती है। अपने आत्मीय के प्राणांत से उपजी पीड़ा का साझीदार वह किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं बना सकती जिसकी वेदना सच्ची न हो। मगर कप्पी की माँ जब मिलती है तब उसके गले लग कर उसकी सारी वेदना बह निकलती है।

‘तदुपरांत’ कहानी में अमृत की दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। पीछे उसके तीन किशोर- युवा बच्चे और पत्नी रह गए हैं। कहानी ‘मैं’ शैली में पत्नी को वाचक बना कर लिखी गई है। मृत्यु के कुछ समय बाद उसे अमृत के मित्र भार्गव द्वारा पार्टी में बुलाया गया है। अमृत की मित्र-मंडली और उनके परिवार सामूहिक रूप से घूमना-फिरना-भोज करते रहे हैं। अमृत ही इस समूह का सबसे सक्रिय उत्साही सदस्य था और ये सामूहिक गतिविधियाँ उसी की पहल पर शुरू हुई थीं। भीतर तक वेदना से बिंधे माँ-बच्चे जाना नहीं चाहते। मगर ज्यादा समय तक दुनिया की गतिविधियों से कटने से दृष्टि-ओझल होकर वे सबके सरोकारों से बाहर न हो जाएँ, इस दवाब में माँ और एक बेटी वहां जाते हैं। मगर किसी भी तरह वे वहाँ सहज नहीं हो पाते। उनकी उपस्थिति का दृश्य बारीकी से रच कर उस विस्थापन की विडंबना साकार की गई है जो किसी की मृत्यु होने के बाद उसके अपनों को झेलनी पड़ती है। विस्थापन एक मानसिक अवस्थिति है मगर परिवार के केंद्र और कमाने वाले के अवसान पर यह एक तरह का भौतिक सामाजिक विस्थापन भी है। पत्नी को एहसास है कि जब तक अमृत के जाने का दुःख ताज़ा है, उसके संगी-साथी, अन्य लोग थोड़ा बहुत सहयोग कर सकते हैं, लेकिन उसके बाद जीवनयुक्त क्रियाकलापों और लोगों से कट कर अलग-थलग पड़ जाना ही उनकी नियति है। अब यात्राओं में और हर जगह उसे शामिल नहीं किया जाएगा। उसकी उपस्थिति से लोग भी असहज होने लगे हैं। वह महसूस करती है कि अब वह एक अकेली औरत है। लोग सहज रहें इसलिए उसे बीच-बीच में मुस्कराने का दायित्व निभाते रहना है । पार्टी में सब चीज़ें अमृत की पसंद की थीं। एक करीबी मित्र की अनुपस्थिति में जश्न मनाने का उन्होंने यही तरीका निकाला कि सब कुछ उसके अंदाज में किया जाए। मगर उसकी पत्नी महसूस करती है-  “इससे प्रभावी तो कोई रास्ता ही नहीं हो सकता किसी को भुलाने का। उसके अभाव से पार पाने का। यह नहीं कि जाने वाले की आदतों को स्मृति की सुनहरी मंजूषा में सहेजकर रख लिया जाए, बल्कि यह कि उसका जम-जमकर इस्तेमाल किया जाए। उन विशिष्टताओं को ठूंस-ठूंस कर अपने भीतर भर लिया जाए। हड़प लिया जाए। थोड़े ही दिनों में उस व्यक्ति की पहचान मिट जाएगी।” (पृ. 39, ‘तदुपरांत’, ‘दूसरे देशकाल में’, कहानी संग्रह)

इस स्थिति का एक जेंडर-पक्ष भी है कि अक्सर स्त्रियों के रिश्ते, यहाँ तक कि दोस्तियां भी, पुरुष संदर्भित होते हैं। उनके अपने मित्र कहीं पीछे छूट चुके होते हैं। इस तरह केंद्र के बिखर जाने से बहुत कुछ साथ में बिछड़ जाता है।

‘खेल’ अलग मिजाज की कहानी है। इसमें मुख्य पात्र को खुद अपनी मृत्यु का सामना करना है। वह 42 साल की उम्र में ही आसन्न मौत से मुठभेड़ करने के लिए अभिशप्त है, लेकिन लोगों की निगाहों में अपने लिए कातरता, दया, सहानुभूति कतई नहीं देखना चाहता। इसीलिए अपने सबसे करीबी मित्र के सामने भी प्रचंड जीवनी-शक्ति का प्रदर्शन कर अपने ठीक होने की पुष्टि करता रहता है। लोगों के सामने स्वस्थ और खुशमिजाज दिखना उसके लिए अपने स्वास्थ्य से भी ज्यादा जरूरी है। ‘यह कहानी नहीं’ में जहाँ लेखिका से अपेक्षा की जाती है कि वह उन पर लिखे, यहाँ लेखक दोस्त से सच छिपाने के लिए ही तमाम दाँव खेले जा रहे हैं क्योंकि उसे लगता है कि वे दूसरों की कमजोरियों और  रहस्यों की ही तलाश में रहते हैं। उसकी निजता का उत्खनन कर, उसकी जिंदगी को तमामतर चीजों से जोड़कर, क्या से क्या बनाकर कुछ लिखा जाए, इससे बेहतर है कि वह अन्यों के लिए अभेद्य बना रहे। वह अपने आंतरिक सच को लेखक दोस्त के सामने नहीं उघाड़ना चाहता, न किसी की तमाशबीनी का सामान बनना चाहता है। अंतिम पल तक जिंदादिल और स्वस्थ व्यक्ति का किरदार अदा कर जब वह मृत्यु को प्राप्त करता है, तब उसके चेहरे की प्रशांति और आभा उस अनंत पीड़ा की संकेतक है जो उसे जीवित रहते बरदाश्त करनी पड़ रही थी। मौत के साए में वह जिस तरह जिंदगी से खेलता रहा, वाचक उसे ‘असली खिलाड़ी’ की तरह याद करता है। कहानी में खिलंदड़पने का हल्का पुट है। इसका मार्मिक यथार्थ पाठक को खिन्न भी करता है कि क्यों हम दूसरों की आँखों से खुद को देखने के लिए इतने विवश हैं। आसन्न म़त्यु या अपनों की मृत्यु जैसे विराट दुख से सामना होने पर भी पहले बाहरी आँखों से अपनी रक्षा क्यों करनी होती है।

 इतनी बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं, महानगरों में अकेले रहने वाले वृद्धों की हत्याएं और उनमें व्याप्त भय ….आदि का परिमाण आज बहुत बड़ा हो चला है। यह आधुनिक जीवन-प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाने की जरूरत को रेखांकित करता है। सामूहिक या विचारधारा प्रेरित कार्रवाईयों के ज़रिये बुनियादी बदलावों के आयाम राजी सेठ के साहित्य में लगभग अनुपस्थित हैं। लेकिन व्यवस्थागत खामियों और परंपरा के मलबे में दबे व्यक्ति के जीवन के विभिन्न आयाम, उनकी अंतर्सम्बद्धता के साथ इतने सजीव, सटीक और प्रामाणिक तरीके से उनकी रचनाओं में साकार होते हैं कि यह कहा जा सकता है कि उनकी रचनाएं हमारे यथार्थबोध को विस्तृत और संवेदना को समृद्ध करती हैं।

 इस व्यवस्था में वर्तमान का सच कमोबेश यही है कि भला-बुरा जो भी व्यक्ति पर बीतता है, वह उसे अकेले ही सहना होता है। इस अकेले पड़ गए आधुनिक व्यक्ति की विविध पहचानें समस्त धूप-छाँही स्पंदनों में राजी सेठ ने सजीव की हैं। जीवन-स्फुलिंगों को समेट कर सामूहिक ताकत में बदलने की दृष्टि और संकल्प हो तो राजी सेठ की रचनाओं में व्यक्ति को दृष्टिवान, बोधसंपन्न बनाने वाले बेशुमार सूत्र मिल सकते हैं।

रश्मि रावत
रश्मि रावत
नाम-रश्मि रावत, सुपरिचित आलोचक। आलोचना की तीन पुस्तकें ' स्त्री लेखन का समकाल', 'हाशिये की आवाजें' और 'कहानी से संवाद' प्रकाशित। संप्रति : दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन ई-मेल : rashmi.rawat@deac.du.ac.in
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