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रीमा लागू के वो किरदार जिन्होंने हंसना भी सिखाया और रोंगटे भी खड़े किए

रीमा लागू की आज पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 2017 में वह इस फानी दुनिया को छोड़ चली गईं। रीमा लागू का अभिनय सिर्फ दर्शकों के दिलों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि कला समीक्षकों और सरकारों ने भी उनकी प्रतिभा का लोहा माना।

हिंदी सिनेमा और टीवी की दुनिया में रीमा लागू (Reema Lagoo) का नाम सिर्फ ‘माँ’ के किरदार तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को हंसाया भी, रुलाया भी और कई बार चौंकाया भी। उनकी खासियत यही थी कि वह किसी भी किरदार को इतनी सहजता से निभाती थीं कि वह स्क्रीन पर अभिनय नहीं, बल्कि जिंदगी का हिस्सा लगने लगता था। वह उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में थीं जिन्होंने निरूपा रॉय वाली त्यागमयी, आंसुओं में डूबी मा की छवि को बदलकर बॉलीवुड को ‘मॉडर्न और फ्रेंडली मॉम’ दी।

बहुत कम लोग जानते हैं कि परदे पर सबको अपनी ममता से सराबोर करने वाली रीमा जी का असली नाम नयन भदभडे था। 21 जून 1958 को जन्मी नयन को कला विरासत में अपनी माँ मंदाकिनी भदभडे से मिली थी, जो खुद मराठी रंगमंच का जाना-माना नाम थीं।

परदे की इस चमकीली दुनिया के पीछे रीमा जी का एक बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण जीवन भी था। अभिनय के शुरुआती दौर में आर्थिक स्थिरता के लिए उन्होंने पूरे 10 सालों तक ‘यूनियन बैंक ऑफ इंडिया’ में क्लर्क के रूप में नौकरी की। इसी बैंक में काम करने के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेता विवेक लागू से हुई, जिनसे शादी के बाद वे ‘नयन’ से हमेशा के लिए हमारी प्यारी ‘रीमा लागू’ बन गईं। बैंक की नौ से पांच की नौकरी, घर की जिम्मेदारियां और शाम को थिएटर का कड़ा संघर्ष, इसी तपस्या ने रीमा जी के अभिनय को वह मैच्योरिटी और सहजता दी, जो बाद में सिल्वर स्क्रीन पर जादू बनकर बिखरी।

जब बॉलीवुड की ‘लाचार मां’ को मिला ‘कूल’ अंदाज

रीमा लागू ने उस समय हिंदी फिल्मों में मां के किरदार निभाने शुरू किए, जब बॉलीवुड की मां अक्सर सिर्फ त्याग, आंसुओं और बेबसी का दूसरा नाम हुआ करती थी। उन्होंने इस रोती-धोती छवि को पूरी तरह बदल दिया। ‘मैंने प्यार किया’ में जब वह सलमान खान की मां बनीं, तो दर्शकों ने पहली बार पर्दे पर एक ऐसी मां देखी जो बेटे की सहेली जैसी लगती थी।

दिलचस्प बात यह थी कि उस वक्त रीमा लागू सिर्फ 31 साल की थीं और सलमान खान उनसे महज कुछ ही साल छोटे थे। लेकिन उनके अभिनय की मैच्योरिटी और सच्चाई इतनी गहरी थी कि किसी को उम्र का यह फासला कभी महसूस ही नहीं हुआ।

इसके बाद ‘हम आपके हैं कौन..!’ में उन्होंने मां के किरदार को और भी जिंदादिल और आधुनिक बना दिया। वह परिवार के साथ अंताक्षरी खेलती थीं, ठहाके लगाती थीं और बच्चों की दोस्त बन जाती थीं। उनकी मौजूदगी से फिल्म में एक घरेलू गर्माहट पैदा होती थी। उन्होंने यह रूढ़िवादी सोच तोड़ी कि मां का किरदार सिर्फ गंभीर और दुखी होना जरूरी नहीं, वह खुशमिजाज और आज के जमाने की भी हो सकती है।

टेलीविजन पर ‘सास-बहू’ के रिश्ते में घोला हास्य

लेकिन रीमा लागू सिर्फ भावुक या स्नेही मां के दायरे तक सीमित नहीं थीं; उनकी कॉमिक टाइमिंग भी गजब की थी। ‘तू तू मैं मैं’ में ‘देवकी’ के रूप में उन्होंने भारतीय टेलीविजन को एक ऐसी सास दी, जो घर-घर की पसंद बन गई। सुप्रिया पिलगांवकर (बहू) के साथ उनकी खट्टी-मीठी नोकझोंक इतनी स्वाभाविक लगती थी कि दर्शकों को लगता था जैसे उनके अपने घर के दृश्य टीवी पर चल रहे हों। उस दौर में जब सास-बहू के रिश्ते टीवी पर सिर्फ साजिशों और आंसुओं की तरफ बढ़ रहे थे, तब रीमा लागू ने उनमें हास्य, गरिमा और अपनापन भर दिया।

दूरदर्शन के एक और कल्ट शो ‘श्रीमती जी’ (श्रीमान श्रीमती) में भी उनका अंदाज बिल्कुल जुदा था। यहां वह तेज-तर्रार, आत्मनिर्भर, कड़क और मजेदार गृहिणी ‘कौकी’ थीं। उनकी डायलॉग डिलीवरी और चेहरे के भाव इतने सहज होते थे कि छोटे-छोटे दृश्य भी मील का पत्थर बन जाते थे।

…और जब अभिनय से खड़े कर दिए रोंगटे

हालांकि, अगर कोई यह सोचता था कि रीमा लागू सिर्फ लोगों को हंसाने और प्यार बांटने के लिए बनी थीं, तो उनके करियर का दूसरा पहलू इस भ्रम को पल भर में तोड़ देता है। फिल्म ‘वास्तव’ (Vaastav) में उनका किरदार आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे शक्तिशाली और साहसी किरदारों में गिना जाता है।

फिल्म के उस ऐतिहासिक क्लाइमेक्स को कौन भूल सकता है? जब अपराध के दलदल में पूरी तरह डूब चुका बेटा (संजय दत्त), अपनी मां से खुद को खत्म करने की भीख मांगता है, तब रीमा लागू के चेहरे पर एक साथ डर, बेबसी, ममता और फौलादी मजबूरी के भाव दिखाई देते हैं। कांपते हाथों से अपने ही बेटे की छाती पर गोली चलाने वाला वह दृश्य आज भी दर्शकों की रूह कंपा देता है। उस एक सीन ने साबित कर दिया था कि रीमा लागू सिर्फ एक “सॉफ्ट स्क्रीन मदर” नहीं, बल्कि बेहद गहरे और संजीदा सिनेमा की एक शक्तिशाली अदाकारा थीं।

थिएटर की धाकड़ सावित्री और टीवी की क्रूर विलेन

बड़े पर्दे से इतर मराठी रंगमंच पर भी उनका एक अलग ही रुतबा था। उनके चर्चित नाटक ‘पुरुष’ में उन्होंने ‘सावित्री’ नाम की एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो अपने साथ हुए अन्याय और शोषण के खिलाफ प्रचंड विद्रोह करती है। मंच पर उनका यह उग्र और विद्रोही रूप देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे, क्योंकि फिल्मों की सौम्य रीमा लागू यहां बिल्कुल अलग और आक्रामक नजर आती थीं।

अपने करियर के आखिरी दौर में भी उन्होंने प्रयोग करना बंद नहीं किया। उन्होंने स्टार प्लस के शो ‘नामकरण’ में ‘दयावंती मेहता’ का डार्क निगेटिव रोल निभाकर दर्शकों को चौंका दिया। एक कठोर, रूढ़िवादी और चालाक महिला के रूप में उनकी आंखों का वो ठंडापन ही सामने वाले के मन में डर पैदा करने के लिए काफी था। यह उनकी वर्सटैलिटी (बहुमुखी प्रतिभा) ही थी कि जिसे लोग वर्षों तक ममता का प्रतीक मानते रहे, उसे विलेन के रूप में भी उतनी ही शिद्दत से स्वीकार किया।

रीमा लागू की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वह हर किरदार को अति-नाटकीय बनाने के बजाय उसे ‘इंसानी’ टच दे देती थीं। शायद यही वजह है कि दर्शक उन्हें किरदारों के भारी-भरकम नामों से नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी भावनाओं से याद रखते हैं।

रीमा लागू का अभिनय सिर्फ दर्शकों के दिलों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि कला समीक्षकों और सरकारों ने भी उनकी प्रतिभा का लोहा माना। हिंदी फिल्मों में जहाँ उन्होंने चार बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कारों का नामांकन हासिल किया- जिनमें ‘मैंने प्यार किया’, ‘आशिकी’, ‘हम आपके हैं कौन..! ‘ और ‘वास्तव’ जैसी कल्ट फिल्में शामिल थीं।

वहीं, अपनी मातृभाषा मराठी सिनेमा और रंगमंच के लिए उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने मराठी फिल्म ‘रेशमगाठ’ (2002) और ‘जन्मा’ (2011) में अपने लाजवाब अभिनय के लिए महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार में ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ का खिताब जीता। उनके इसी अद्वितीय और आजीवन योगदान को सलाम करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च और बेहद प्रतिष्ठित ‘वी. शांताराम पुरस्कार’ से सम्मानित किया था।

18 मई 2017 को कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका अचानक निधन हो गया। वह एक सच्ची अदाकारा थीं। निधन के कुछ घंटे पहले तक वह शूटिंग सेट पर काम कर रही थीं। लेकिन सच्चे कलाकार शायद ऐसे ही विदा लेते हैं और अमर हो जाते हैं। रीमा लागू आज इस दुनिया में नहीं हैं, फिर भी टीवी पर उनका मुस्कुराता चेहरा आते ही आज भी दर्शकों के चेहरे पर खिली धूप सी मुस्कान आ जाती है, और ‘वास्तव’ का वह क्लाइमेक्स याद आते ही आंखें नम हो जाती हैं। यही किसी फनकार की कला की सबसे बड़ी जीत होती है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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