नई दिल्ली: हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कई महान संगीतकार हुए। लेकिन राहुल देव बर्मन जिन्हें दुनिया पंचम दा के नाम से भी जानती है, की पहचान सिर्फ सुपरहिट धुनें बनाने वाले संगीतकार की नहीं थी। वह ऐसे प्रयोगधर्मी कलाकार थे, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि संगीत सिर्फ तबले, हारमोनियम या गिटार से नहीं बनता, बल्कि हर आवाज में एक धुन छिपी होती है। कांच की प्याली, चम्मच, खाली बोतल, कंघी, चाबियां, स्कूल की बेंच और यहां तक कि हवा की आवाज को भी उन्होंने गीतों का हिस्सा बनाया।
27 जून 1939 को जन्मे पंचम दा ने भारतीय फिल्म संगीत को आधुनिक सोच, नई तकनीक और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों से समृद्ध किया। उनके कई प्रयोग आज भी संगीत की दुनिया में मिसाल माने जाते हैं।
1. नौ साल की उम्र में बना दी थी पहली धुन
पंचम दा की प्रतिभा बचपन से ही सामने आने लगी थी। माना जाता है कि उन्होंने मात्र नौ वर्ष की उम्र में फिल्म ‘फंटूश’ (1956) के गीत ‘ऐ मेरी टोपी पलट के आ’ की धुन तैयार की थी, जिसे बाद में उनके पिता और महान संगीतकार एस.डी. बर्मन ने फिल्म में इस्तेमाल किया। इसी तरह, फिल्म ‘प्यासा’ के लोकप्रिय गीत ‘सर जो तेरा चकराए’ की शुरुआती धुन भी बचपन में पंचम दा द्वारा तैयार किए जाने का उल्लेख कई जीवनी लेखों में मिलता है। इससे साफ था कि संगीत उनके लिए विरासत ही नहीं, सहज प्रतिभा भी था।
2. खाली बोतल से रच दिया ‘महबूबा महबूबा’ का जादू
फिल्म ‘शोले’ (1975) का गीत ‘महबूबा महबूबा’ पंचम दा के सबसे चर्चित प्रयोगों में गिना जाता है। इस गीत में उन्होंने मध्य-पूर्वी और ग्रीक लोकसंगीत से प्रेरित धुनों को भारतीय फिल्म संगीत के साथ जोड़ा। रिकॉर्डिंग के दौरान खाली कांच की बोतल में फूंक मारकर एक अनोखी ध्वनि तैयार की गई, जिसने गीत की लय को अलग पहचान दी। इस गीत को उन्होंने खुद अपनी विशिष्ट आवाज में गाया, जो आज भी उतना ही लोकप्रिय है।
3. कांच की प्याली और चम्मच से बना अमर संगीत
फिल्म ‘यादों की बारात’ का सदाबहार गीत ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ शुरू होते ही सुनाई देने वाली कांच की मधुर टंकार आज भी लोगों को आकर्षित करती है। यह प्रभाव किसी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से नहीं, बल्कि कांच की प्याली और धातु की वस्तु की टकराहट से तैयार किया गया था। इसके बाद गिटार और अन्य वाद्ययंत्रों के साथ इस ध्वनि का ऐसा मेल किया गया कि यह हिंदी फिल्म संगीत के सबसे यादगार इंट्रो में शामिल हो गया।
4. कंघी जैसी साधारण चीज भी बन गई संगीत का हिस्सा
पंचम दा का मानना था कि संगीत केवल पारंपरिक वाद्ययंत्रों तक सीमित नहीं है। यही वजह थी कि वे रोजमर्रा की चीजों से भी नई ध्वनियां निकालने का प्रयोग करते रहते थे। संगीत जगत में प्रचलित किस्सों के अनुसार, फिल्म ‘पड़ोसन’ के लोकप्रिय गीत ‘एक चतुर नार’ की रिकॉर्डिंग के दौरान कंघी और खुरदुरी सतह से निकलने वाली ध्वनियों का भी प्रयोग किया गया। यह उनके उस प्रयोगधर्मी नजरिए का उदाहरण माना जाता है, जिसमें वे हर आवाज में संगीत की संभावना तलाशते थे।
5. चाबियों की खनक को भी बनाया धुन का हिस्सा
पंचम दा रोजमर्रा की सामान्य आवाजों को संगीत में ढालने के लिए मशहूर थे। प्रचलित जानकारी के अनुसार, फिल्म ‘अगर तुम न होते’ के एक गीत में उन्होंने चाबियों की खनक को भी संगीत के प्रभाव का हिस्सा बनाया। ऐसे प्रयोगों ने उनके गीतों को अलग पहचान दी और यह साबित किया कि रचनात्मकता किसी भी साधारण ध्वनि को खास बना सकती है।
6. स्कूल की बेंच से निकली ताल भी पहुंची स्टूडियो तक
फिल्म ‘किताब’ (1977) के संगीत में पंचम दा ने स्कूल के माहौल को वास्तविक बनाने के लिए रोजमर्रा की ध्वनियों का रचनात्मक इस्तेमाल किया। संगीत प्रेमियों के बीच यह माना जाता है कि स्कूल की बेंच और कक्षा के वातावरण से प्रेरित तालों को भी संगीत में शामिल किया गया, जिससे गीतों में एक स्वाभाविक और जीवंत एहसास पैदा हुआ। यही प्रयोगधर्मिता उन्हें अपने दौर के अन्य संगीतकारों से अलग बनाती थी।
7. रॉक, जैज और लैटिन संगीत को बॉलीवुड में दी नई पहचान
1960 के दशक तक हिंदी फिल्मों में पारंपरिक भारतीय धुनों का दबदबा था। पंचम दा ने इसमें रॉक, जैज, लैटिन, फंक और पॉप संगीत का बेहतरीन मेल किया। ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’, ‘दम मारो दम’, ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ और ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गीतों ने साबित कर दिया कि भारतीय संगीत आधुनिक वैश्विक ध्वनियों के साथ भी उतना ही प्रभावशाली हो सकता है। यही प्रयोग आगे चलकर बॉलीवुड संगीत की नई पहचान बन गया।
8. माउथ ऑर्गन को दिलाई नई लोकप्रियता
पंचम दा बचपन से ही हार्मोनिका (माउथ ऑर्गन) बजाने में दक्ष थे। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खान से संगीत की शिक्षा लेने के साथ इस वाद्य पर भी मजबूत पकड़ बनाई। फिल्म ‘सोलवां साल’ के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा’ में सुनाई देने वाली हार्मोनिका की धुन आज भी भारतीय फिल्म संगीत की सबसे यादगार धुनों में गिनी जाती है। हालांकि फिल्म के आधिकारिक संगीतकार एस.डी. बर्मन थे, लेकिन इस वाद्य को लोकप्रिय बनाने में पंचम दा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
9. भारतीय और पश्चिमी संगीत का अनोखा संगम
पंचम दा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा के साथ इस तरह जोड़ा कि दोनों की खूबसूरती बरकरार रही। ‘रैना बीती जाए’, ‘हमें तुमसे प्यार कितना’, ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा’ और ‘मुसाफिर हूं यारों’ जैसे गीतों में संतूर, सितार, बांसुरी और तबले को गिटार, स्ट्रिंग्स और पश्चिमी वाद्यों के साथ बेहद खूबसूरती से संयोजित किया गया। यह फ्यूजन आज भी संगीतकारों के लिए प्रेरणा है।
10. अपनी आवाज को भी बना दिया संगीत का सबसे अलग वाद्य
पंचम दा सिर्फ संगीतकार ही नहीं, बल्कि एक अनोखे गायक भी थे। उनकी आवाज तकनीकी रूप से पारंपरिक नहीं थी, लेकिन उसमें ऊर्जा, लय और अभिनय का अद्भुत मेल था। ‘महबूबा महबूबा’, ‘दम मारो दम’ के कोरस हिस्से और ‘पिया तू अब तो आजा’ में उनका मशहूर “मोनिका… ओ माय डार्लिंग” आज भी श्रोताओं के बीच उतना ही लोकप्रिय है। उन्होंने अपनी आवाज को भी संगीत का एक अलग वाद्य बना दिया था।
1980 के दशक में भले ही पंचम दा का करियर कुछ धीमा पड़ गया, लेकिन ‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी’, ‘आने वाला पल’, ‘शीशा हो या दिल हो’ और बाद में ‘1942: ए लव स्टोरी’ के ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’, ‘कुछ न कहो’ और ‘रिमझिम रिमझिम’ जैसे गीतों ने साबित कर दिया कि सच्चा संगीत समय का मोहताज नहीं होता।
4 जनवरी 1994 को पंचम दा इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके प्रयोग आज भी भारतीय फिल्म संगीत की पाठशाला माने जाते हैं। उन्होंने यह सिखाया कि संगीत किसी महंगे वाद्ययंत्र में नहीं, बल्कि कलाकार की कल्पनाशक्ति में बसता है। शायद यही वजह है कि तीन दशक बाद भी उनके गीत उतने ही ताजा, आधुनिक और प्रेरणादायक लगते हैं, जितने अपने दौर में थे।

