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राजेश एक्सपोर्ट्स: एक छोटी ज्वेलरी कंपनी से वैश्विक गोल्ड दिग्गज तक का सफर, अब 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित रेवेन्यू विवाद में क्यों घिरी?

राजेश एक्सपोर्ट्स की कहानी 1988 में शुरू हुई जब राजेश मेहता और उनके भाई प्रशांत मेहता पारिवारिक कारोबार से जुड़े। उस दौर में भारत का ज्वेलरी उद्योग काफी हद तक असंगठित था। लेकिन मेहता बंधुओं की सोच अलग थी। उन्होंने केवल सोने का कारोबार करने के बजाय उसे औद्योगिक स्तर पर संगठित करने का सपना देखा।

एक समय भारत की सबसे सफल ज्वेलरी और गोल्ड रिफाइनिंग कंपनियों में गिनी जाने वाली राजेश एक्सपोर्ट्स आज अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। बाजार नियामक सेबी ने कंपनी पर वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व (रेवेन्यू) को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगाया है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसकी तुलना देश के कुछ बड़े कॉरपोरेट घोटालों से की जा रही है।

हालांकि कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसके वित्तीय आंकड़े सही हैं और मामला केवल लेखांकन (अकाउंटिंग) की व्याख्या से जुड़ा भ्रम है। फिर भी सेबी की अंतरिम कार्रवाई ने निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और बाजार विशेषज्ञों के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

1988 में हुई शुरुआत, फिर बना गोल्ड कारोबार का बड़ा नाम

राजेश एक्सपोर्ट्स की कहानी 1988 में शुरू हुई जब राजेश मेहता और उनके भाई प्रशांत मेहता पारिवारिक कारोबार से जुड़े। उस दौर में भारत का ज्वेलरी उद्योग काफी हद तक असंगठित था। लेकिन मेहता बंधुओं की सोच अलग थी। उन्होंने केवल सोने का कारोबार करने के बजाय उसे औद्योगिक स्तर पर संगठित करने का सपना देखा।

यही सोच 1990 में भारत की पहली संगठित गोल्ड ज्वेलरी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना तक पहुंची। अगले ही वर्ष कंपनी ने ज्वेलरी क्षेत्र का पहला रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) सेंटर शुरू किया। यह उस दौर में एक असाधारण कदम माना गया, जब ज्यादातर ज्वेलरी कारोबार पारंपरिक तरीकों से संचालित होता था।

कुछ ही वर्षों में कंपनी तेजी से आगे बढ़ी। 1994 तक राजेश एक्सपोर्ट्स देश की सबसे बड़ी गोल्ड ज्वेलरी निर्यातक और थोक विक्रेता बन चुकी थी। विस्तार की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए 1995 में कंपनी शेयर बाजार में उतरी। उसका आईपीओ जबरदस्त तरीके से सब्सक्राइब हुआ और कंपनी के शेयर बीएसई और एनएसई पर सूचीबद्ध हो गए। लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी।

Six men pose in front of the Rajesh Jewels storefront.
इमेज सोर्सः सोशल मीडिया

1999 में कंपनी ने दुनिया की सबसे बड़ी ज्वेलरी निर्माण इकाई स्थापित करने की योजना बनाई। उस समय यह लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी माना गया। तीन साल बाद 2002 में निर्माण कार्य पूरा हुआ और 2003 में वहां व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया। इस उपलब्धि ने राजेश एक्सपोर्ट्स को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलानी शुरू कर दी।

इसके बाद कंपनी की विकास यात्रा और तेज होती गई। 2006 में उसकी सालाना बिक्री पहली बार एक अरब डॉलर के पार पहुंची। चार साल बाद 2010 में यह आंकड़ा बढ़कर चार अरब डॉलर से अधिक हो गया।

जब अधिकांश ज्वेलरी कंपनियां केवल निर्माण और निर्यात पर ध्यान दे रही थीं, तब राजेश एक्सपोर्ट्स ने खुदरा बाजार में भी कदम रखने का फैसला किया। 2012 में ‘शुभ ज्वेलर्स’ ब्रांड लॉन्च किया गया। इसके साथ ही कंपनी सीधे ग्राहकों तक पहुंचने लगी। 2014 तक कर्नाटक में 80 शोरूम खोले जा चुके थे। फिर आया वह साल जिसने कंपनी की पहचान ही बदल दी।

2015 में राजेश एक्सपोर्ट्स ने स्विट्जरलैंड की विश्व प्रसिद्ध गोल्ड रिफाइनरी वैलकैम्बी (Valcambi) का अधिग्रहण कर लिया। यह सौदा करीब 40 करोड़ डॉलर का था और इसे भारतीय ज्वेलरी उद्योग की सबसे बड़ी वैश्विक डील्स में गिना गया। वैलकैम्बी को दुनिया की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित गोल्ड रिफाइनरियों में शामिल माना जाता है। इस अधिग्रहण के बाद राजेश एक्सपोर्ट्स वैश्विक गोल्ड सप्लाई चेन में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी।

उसी वर्ष कंपनी की बिक्री 8 अरब डॉलर के पार पहुंच गई। 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 24 अरब डॉलर से अधिक हो गया। कंपनी ने अपने रिटेल नेटवर्क का विस्तार जारी रखा और 2019 तक ‘शुभ ज्वेलर्स’ के 82 शोरूम संचालित होने लगे।

तीन दशकों के भीतर राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की उन चुनिंदा कंपनियों में शामिल हो गई थी, जिनकी मौजूदगी सोने के कारोबार की पूरी वैल्यू चेन में थी। कच्चे सोने की खरीद, रिफाइनिंग, ज्वेलरी निर्माण, निर्यात और रिटेल बिक्री, सब कुछ एक ही समूह के तहत संचालित होने लगा। इतनी कामयाबी के बाद आया बड़ा संकट!

आखिर 15.15 लाख करोड़ रुपये का विवाद क्या है, सेबी की नजर में कैसे आया?

मार्च 2024 में एक शेयरधारक ने सेबी को शिकायत भेजी। शिकायत में कहा गया कि कंपनी की बैलेंस शीट में दिखाए गए बड़े व्यापारिक बकाये सालों से लंबित हैं और उनके पीछे वित्तीय गड़बड़ियों की आशंका है।

सेबी ने जांच शुरू की और बाद में फोरेंसिक ऑडिट भी कराया। जांच के दौरान नियामक ने कंपनी से ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं, खरीद-बिक्री रिकॉर्ड, चालान और अन्य दस्तावेज मांगे। सेबी के अनुसार, कई अहम जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गईं या अधूरी रहीं। इसके बाद जांच का फोकस कंपनी की विदेशी सहायक कंपनियों और विशेष रूप से स्विट्जरलैंड स्थित वैलकैम्बी तथा उससे जुड़ी संस्थाओं पर गया।

सेबी का आरोप है कि वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच कंपनी ने अपने समेकित राजस्व को लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया हो सकता है।

जांच में पाया गया कि कंपनी के कुल रिपोर्टेड राजस्व का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों से आ रहा था। लेकिन जब सेबी ने इन कंपनियों के वास्तविक वित्तीय रिकॉर्ड और लेन-देन की पुष्टि करने की कोशिश की, तो पर्याप्त दस्तावेज नहीं मिले।

मसलन सेबी के अनुसार वैलकैम्बी के स्वतंत्र खातों में राजस्व कुछ सौ करोड़ रुपये दिखता है, जबकि समूह स्तर पर यही आंकड़ा लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। नियामक का सवाल है कि यदि वास्तविक कारोबारी गतिविधि सीमित थी तो इतना बड़ा राजस्व कैसे दर्ज किया गया।

LIC की बड़ी हिस्सेदारी

इस विवाद का सबसे बड़ा असर सरकारी बीमा कंपनी एलआईसी पर पड़ सकता है, जिसके पास राजेश एक्सपोर्ट्स की लगभग 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक दशक में अधिकांश घरेलू म्यूचुअल फंड और निजी बीमा कंपनियां इस शेयर से दूरी बनाए रहीं। मार्च 2016 में म्यूचुअल फंडों की हिस्सेदारी अधिकतम 0.5 प्रतिशत थी, जो बाद में शून्य हो गई।

इसके विपरीत एलआईसी ने अपनी हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई। मार्च 2016 में उसकी हिस्सेदारी 1.99 प्रतिशत थी, जो मार्च 2022 में बढ़कर 11.22 प्रतिशत तक पहुंच गई। मार्च 2026 तक यह 10.8 प्रतिशत रही।

सेबी के आदेश के बाद कंपनी के शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई। शेयर लगातार 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गया। विश्लेषकों का मानना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो निवेशकों की पूंजी को बड़ा नुकसान हो सकता है। हालांकि यह भी सच है कि अभी जांच जारी है और कंपनी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

आखिर ‘रेवेन्यू इन्फ्लेशन’ क्या होता है?

जब कोई कंपनी वास्तविक बिक्री या आय से अधिक राजस्व दिखाती है, तो इसे ‘रेवेन्यू इन्फ्लेशन’ कहा जाता है। ऐसा आमतौर पर कंपनी की वित्तीय स्थिति को मजबूत दिखाने, निवेशकों को आकर्षित करने या बाजार में अपनी साख बढ़ाने के लिए किया जाता है।

राजेश एक्सपोर्ट्स मामले में भी मूल सवाल यही है कि कंपनी द्वारा वर्षों से दिखाया जा रहा विशाल राजस्व वास्तविक कारोबारी गतिविधियों पर आधारित था या नहीं। फिलहाल इस प्रश्न का अंतिम जवाब सेबी की विस्तृत जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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