Friday, March 20, 2026
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राज की बातः अयोध्या विवाद की आग में भी शांत रहा था पटना, लालू प्रसाद के उस दिन के किस्से

द टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्टर रहते हुए, मैं मुख्यमंत्री आवास-1, ऐने मार्ग- पहुँचा, जो राजभवन के पास है। मुख्य द्वार खुला था और मैं फोटोग्राफर मोहन शर्मा के साथ अंदर घुस गया। भूतल पर मुख्यमंत्री के निजी सचिव मुकुल कपूर मिले। उन्होंने हमें पहले माले के बेडरूम में भेजा, जहाँ लालू…

7 दिसंबर 1992 को, जब कर सेवकों पर अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा देने का आरोप लगा, तब पटना-जहाँ पश्चिम में फुलवारी शरीफ और पूरब में खुसरूपुर जैसे इलाकों में बड़ी मुस्लिम आबादी है-पूरी तरह शांत रहा। सदियों से एक-दूसरे के पड़ोसी रहे ऐतिहासिक महावीर मंदिर और जामा मस्जिद पर भी उस घटना का कोई असर नहीं पड़ा।

द टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्टर रहते हुए, मैं मुख्यमंत्री आवास-1, ऐने मार्ग- पहुँचा, जो राजभवन के पास है। मुख्य द्वार खुला था और मैं फोटोग्राफर मोहन शर्मा के साथ अंदर घुस गया। भूतल पर मुख्यमंत्री के निजी सचिव मुकुल कपूर मिले। उन्होंने हमें पहले माले के बेडरूम में भेजा, जहाँ लालू प्रसाद यादव थे। घर में कोई नेता या अधिकारी मौजूद नहीं था।
लालूजी धोती को ही लुंगी की तरह बाँधकर बिस्तर पर बैठे थे। उन्होंने हमें नमस्कार किया और बताया कि पिछली रात भर वे हालात पर नज़र रख रहे थे, इसलिए सो नहीं पाए। उस समय दोपहर के करीब 3 बजे थे। वे कमरे से बाहर निकले और ब्रश उठा लिया। दाँत साफ करने के बाद, उन्होंने फोटोग्राफर के कहने पर वही क्रिया आईने के सामने दोबारा करके भी दिखाई।

उन्होंने हमें चाय के लिए कहा। फिर उन्होंने राबड़ी देवी को लाल कपड़े में लिपटी पोटली लाने को कहा। पोटली खोलकर उन्होंने कुछ पत्थर और मलबा निकाला और बताया- “मोटका (नवीन किशोर सिन्हा, पश्चिम पटना के भाजपा विधायक) फुलवारी शरीफ स्टेशन पर पकड़ा गया। बाबरी से टूटे हुए पत्थर ला रहा था। दंगा फैलाता… अशोक राजपथ, सब्जीबाग और सुल्तानगंज चौक पर ये रख देता तो लोग भड़क जाते।” उनकी पत्नी और बच्चे भी पास ही खड़े थे। जब लालू जी ने ‘लोग मुठ्ठाते’ कहा तो वे सब भी हँसने लगे।

कुछ देर बाद मुख्यमंत्री ने कुर्ता-पायजामा पहन लिया और नीचे आकर ड्राइवर को पटना सिटी चलने का निर्देश दिया। बोले- “देखना है, राज-पाट ठीक से चल रहा है या नहीं।”

वे पूर्वी पटना के खाजेकलां थाना पहुँचे। डीएम और एसएसपी वहाँ मौजूद थे, लेकिन एक युवा आईएएस अधिकारी- तत्कालीन एसडीएम- समय पर नहीं पहुँच पाया। जैसे ही वह आया, मुख्यमंत्री ने उसे उसी अंदाज़ में डाँटा जैसे कोई शिक्षक किसी ग़ैरहाज़िर छात्र को समझाता है।

इसी बीच, महावीर मंदिर के प्रबंध न्यासी और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी किशोर कुनाल, जो अयोध्या प्रकरण के ओएसडी थे, ने पीएमओ में नरेश चंद्र को फ़ोन कर प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की प्रतिक्रिया जाननी चाही। उन्हें बताया गया- सब हनुमान जी की कृपा।

अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्रो. ज़बीर हुसैन घटनाक्रम से बेहद विचलित थे। उन्होंने खेद जताया कि यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट से किए अपने वादे पर कायम नहीं रह सकी। हालाँकि, बिहार-सीतामढ़ी में कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़- पूरी तरह शांत रहा।

करीब एक हफ्ते बाद, बेनेट एंड कोलमैन के चेयरमैन अशोक कुमार जैन ने द टाइम्स ऑफ इंडिया के राज्य संवाददाताओं की दिल्ली में बैठक बुलाई, जहाँ संयमित रिपोर्टिंग के लिए सभी को बधाई दी गई। जैन के स्कूल के दोस्त एम.जी. गुप्ता-जो अयोध्या में टीओआई के संवाददाता थे- भी विशेष रूप से बुलाए गए। वे बैठक में अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने चेयरमैन को सिर्फ “अशोक” कहा, बाक़ी सब “अशोक जी” ही कहकर संबोधित कर रहे थे।

मुझे लखनऊ स्थित विशेष अदालत में सीबीआई के अभियोजन गवाह के रूप में बुलाया गया। लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती की ओर से पेश वकीलों ने मुझसे बेहद कड़े सवाल किए और यह स्वीकार करने से इंकार किया कि ढाँचा तोड़ने के पीछे कोई साज़िश थी। और हुआ भी वही- अदालत ने सबको बरी कर दिया, क्योंकि यह साबित ही नहीं हो पाया कि ढाँचा गिराया किसने।

कुछ समय बाद, माननीय विशेष न्यायाधीश को उपलोकायुक्त नियुक्त कर दिया गया। पटना पूरी तरह शांत था-महावीर मंदिर और जामा मस्जिद, ये दो पड़ोसी धर्मस्थल भी 7 दिसंबर 1992 को बिल्कुल सुरक्षित और अप्रभावित रहे।

लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।
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