प्रश्न – आपने बताया कि लिंग्विस्टिक सर्वे के दौरान ‘मीटिंग ऑफ़ माइंड्स’ में देश भर से लोगों को जुटाने के पीछे मंशा यह समझने की थी कि भाषा के बारे में लोग अलग-अलग कैसे सोचते हैं। मेरी जिज्ञासा यह जानने की है कि मनुष्य ने आपस में संवाद के लिए, ख़ुद की अभिव्यक्ति के लिए भाषा ईजाद की, तो वह मसला कैसे बन गई, ख़ास उद्देश्यों की प्राप्ति का बहाना या औज़ार कैसे बन गई? और इस सबका भाषा पर और उसे बरतने वाले समाज पर किस तरह का असर होता है?
जी. एन. देवी – हमारी उत्क्रांति की प्रक्रिया में भाषा उस तरह से इंसानी शरीर का अविभाज्य हिस्सा नहीं बनी थी, जैसे हमारे दाँत, जीभ, होंठ और नाक बने। जिस गले के ज़रिए हम भाषा बोलते हैं, वह हमें उत्क्रांति की देन है। दूसरे जानवरों में जैसे आवाज निकालने की कुछ क्षमता थी, वह हमें मिली। लेकिन जो भाषा हमने बनाई, इस उत्क्रांति को आगे ले जाने के लिए उसे एक शस्त्र के रूप में बरतना आरंभ किया।
क्योंकि चतुष्पाद हम नहीं रहे थे। दो पैरों पर चलने लगे थे और पीठ के पीछे देख नहीं सकते थे, तो ख़ुद की रक्षा कैसे की जाए, इसके लिए आवाज़ के माध्यम से अर्थ का वहन करना—यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से बढ़ते-बढ़ते हम एक ऐसी स्थिति में पहुँचे कि हम एक शब्द, दूसरा शब्द, तीसरा शब्द इकट्ठा मिलाकर पूरा वाक्य, एक अर्थ की इकाई बना सके। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम तीस से पैंतीस लाख साल लगे।
मूलत: भाषा का रूप हमारे उत्क्रांति-क्रम में उन शारीरिक क्षमताओं की पूर्ति के लिए बना, जो कम हो गई थीं। जैसे नाख़ून कम हुए थे, सींग नहीं थे, दुम चली गई थी और दाँत इतने तीक्ष्ण नहीं रहे थे। ऐसे में भाषा का निर्माण हमारे सेल्फ़-डिफ़ेंस के लिए हुआ।
लेकिन उससे समाज बना। क्योंकि हम किसी एक ने दिमाग़ में क्या सोचा, वह दूसरे तक पहुँचा सके। उससे हमारी स्मृति बनी, जो क़ुदरती स्मृति से अलग बनती गई। इससे एक अलग तरह की स्मृति विकसित हुई—इंसानी स्मृति। वह केवल तात्कालिक स्मृति नहीं थी, बल्कि दीर्घकालीन स्मृति थी। इतना ही नहीं, एक पीढ़ी उसे दूसरी पीढ़ी को दे सकती थी।
इससे समय के बारे में हमारा ख़याल बदला। स्पेस क्या है? टाइम और स्पेस क्या हैं? जीवन-दृष्टि बदली। दुनिया का स्वरूप क्या है, उसे हम अलग ढंग से देखने लगे। इससे समाज बने, समाज से हम स्थलांतर कर सके। स्थलांतर करके हमने क़ुदरत की जो मर्यादाएँ हैं, उनका उल्लंघन भी किया। बहुत गर्म जगहों पर रह सके, बहुत ठंडी जगहों पर रह सके, बारिश और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सके।
ये सब चीज़ें होलोसीन- यानी हिमयुग के बाद- के दौर में हुईं। लगभग बारह हज़ार साल पहले जलवायु की परिस्थितियाँ कुछ बेहतर हुईं तो इंसान की तादाद भी बढ़ने लगी। आगे जाकर समाज से देश बने, धर्म बने, भगवान की कल्पनाएँ बनीं। यह सब हुआ।
लेकिन आज हमने जो दिमाग़ी कौशल हासिल किया, उसका असर हमारे दिमाग़ पर भी हुआ है। वैज्ञानिक कहने लगे हैं कि हमारे दिमाग़ का जो न्यूरोलॉजिकल हिस्सा है- ब्रोका’ज़ लोब- जिसके ज़रिए हम आवाज़ के माध्यम से दुनिया का अर्थ प्राप्त करते आए, उसकी जगह अब हम छवि के माध्यम से दुनिया का विश्लेषण ज़्यादा करने लगे हैं। यानी कान की जगह अब आँख को प्राथमिकता प्राप्त हुई है।
क्योंकि ब्रोका’ज़ लोब में एक तरह की थकान दिखाई दे रही है। आजकल के बच्चे बोलने से थक जाते हैं और जो बड़े हैं, वे सुनने से थक जाते हैं। आपने देखा होगा, किसी को अगर आप कोई बात बताते हैं तो शायद पंद्रह या बीस सेकेंड बाद उसकी एकाग्रता चली जाती है। पहले ऐसा नहीं था।
हम मौखिक परंपरा में रहते आए हैं- ग्रीक, लैटिन, इजिप्शियन, इंडियन, अरब- सभी सभ्यताएँ हज़ारों साल मौखिक परंपरा में रहीं। इसलिए बहुत लंबे पल्ले की मौखिक स्मृतियाँ हमारे पास थीं। आज वह नहीं हैं।
इस समय जो ह्यूमन ब्रेन है, वह ओरल इंटरप्रिटेशन से हटकर विज़ुअल इंटरप्रिटेशन की तरफ़ जा रहा है। इसका मतलब है कि पिछले कुछ हज़ार सालों में हमने भाषा को जिस रूप में देखा है, उसका वह रूप बदल जाएगा। मुझे यह कहते हुए बड़ा दुख होता है। लेकिन दुनिया आज इस संक्रमण के बिल्कुल केंद्र बिंदु में खड़ी है।
मेरे बचपन में रेडियो बहुत अहमियत रखता था। आज कोई रेडियो नहीं सुन रहा है। बच्चा आठ-दस महीने का होता है और उसके हाथ में मोबाइल आ जाता है। कभी लोग मरते समय अल्लाह या ईश्वर का नाम लेते हुए मरते थे, अभी व्हाट्सऐप पर क्या संदेश आया है, वह देखकर मरते हैं।
पहले दुनिया में हम सोने से पहले कोई प्रार्थना करते थे या सपना देखने की शुरुआत करते थे, या सुख-दुख के बारे में सोचते थे। इस समय सोने के दो मिनट पहले और सुबह आँख खुलते ही लोग देखते हैं कि मोबाइल में आख़िरी दृश्य-संदेश क्या है।
यह जो दुनिया है, वह वर्चुअल दुनिया है। उसमें स्पेस अलग है और टाइम का स्केल भी अलग है। उस अलग स्पेस और टाइम स्केल में आवाज़ की पहुँच, क्योंकि आवाज़ हवा के माध्यम से जाने वाला एक अर्थ-वहनकारी रूप है, अब बदल गई है। हवा की जगह डिजिटल माध्यम ने ले ली है।
अब हम ब्राउज़िंग करते हैं। जैसे कोई सीमाविहीन दरिया हो और उस पर हम सर्फ़िंग कर रहे हों। यह नई दुनिया की रचना हुई है। आप जानते हैं कि एलन मस्क अब अंतरिक्ष में शहर बसाने की बातें कर रहे हैं। और अंतरिक्ष में यदि हम पृथ्वी और बृहस्पति के बीच कहीं खड़े होकर पूछें कि कितने बजे हैं, तो उस समय का कोई मायने नहीं रह जाता। न स्पेस का, न दूरी का।
आइंस्टाइन ने टाइम और स्पेस को एक इकाई माना था। वह एक अलग माध्यम बन जाता है—टाइम-स्पेस। जिसकी कल्पना मैं यहाँ बैठकर नहीं कर सकता। क्योंकि इंसान भाषा का उल्लंघन करके नई भाषा में, नई दुनिया में जा रहा है।
जाते-जाते उत्क्रांति में इंसान की हमेशा एक आदत रही है कि जो वस्तु वह छोड़ना चाहता है, उसका इस्तेमाल पहले अत्यधिक और कई बार हिंसक रूप में करता है, और फिर उसे पीछे छोड़ देता है।
यह इंसानी जानवर की आदत-सी है। इसलिए भाषा का इस्तेमाल इस समय केवल संवाद के लिए नहीं रह गया है। दुख देने, गालियाँ देने, दूसरे को अपमानित करने के लिए भी भाषा का इस्तेमाल बढ़ा है। गॉसिप में देखिए- हम अक्सर दूसरों के बारे में सबसे ख़राब बातें करते रहते हैं।
भाषा अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गई है। मुझे लगता है कि यह स्थलांतर का एक आख़िरी पड़ाव है—इंसान का भाषा को उद्ध्वस्त करके आगे जाने का।
अब यह अच्छा है या बुरा, कोई कुछ भी कहे। लेकिन मुझे इस बात से बहुत दुख होता है कि जिस कौशल ने पिछले बीस लाख वर्षों तक हमारा साथ दिया और ख़ासकर पिछले सत्तर हज़ार वर्षों से हमें अर्थपूर्ण वाक्य बनाने की क्षमता दी, जिसने हमें जानवरों से अलग इंसान बनाया, उसी कौशल को हम तोड़-फोड़कर पीछे छोड़ने वाले हैं।
आई फ़ील वेरी सैड।
प्रश्न- हाल में ही महाभारत पर आपकी किताब का हिंदी अनुवाद आया है। इस किताब के मार्फ़त आपके नज़रिये से महाभारत की महत्ता जानना-समझना दिलचस्प है। सदियों के लंबे सफ़र में इस महाकाव्य के प्रासंगिक बने रहने को लेकर आपकी व्याख्या, आपके तर्क ख़ूब आश्वस्त भी करते हैं। फिर लोक में यह धारणा कैसे और कहाँ से चली आई कि महाभारत ग्रंथ घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि यह अपशकुन है, अशुभ का कारक है? सही और ग़लत, नैतिक और अनैतिक, धर्म और अधर्म का भेद समझाने वाला ग्रंथ अशुभ किस तरह हो गया होगा
जी. एन. देवी- इसे समझने के लिए हमें बहुत पीछे जाना होगा। ईसा से लगभग चौदह सौ साल पहले ऋग्वेद की रचना शुरू हुई। यह काम चार सदियों में पूरा हुआ। इसके दो-तीन सौ साल बाद, यानी ईसा पूर्व सातवीं सदी में बृहदारण्यक की रचना हुई और उस पर तीन-चार सौ साल तक काम चलता रहा। उपनिषदों की रचना होती आई।
उसके बाद ईसा पूर्व चौथी सदी, यानी पाणिनी के समय से शास्त्रों की रचना का क्रम तेज़ हुआ। तब तक ऋग्वेद की रचना को लगभग एक हज़ार साल हो चुके थे और उस समय ऋग्वेद का पठन करने वालों के लिए भी उसे पूरी तरह समझना कठिन हो गया था। श्री अरविंद, जो ऋग्वेद के अच्छे विद्वान थे, ऐसा मानते हैं।
उस समय एक स्वीकृत भावना यह बनी कि शास्त्र की जो रचना हुई है, उसे वैदिक पठन-पाठन करने वाले लोगों तक सीमित रखा जाए, ताकि समाज के जो तीन-चार हिस्से बनाए गए थे, उन पर आधिपत्य बनाए रखना आसान हो।
अब जो महाभारत है, वह तो सबको सहज उपलब्ध था। सब उससे हासिल कर सकते थे। उसे गा सकते थे। उसमें कुछ जोड़ सकते थे। और महाभारत में वह सब कुछ बताया गया है, जो शास्त्रों में था, बल्कि उससे भी ज़्यादा। कोई भी सामाजिक वर्ग यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसका आधिपत्य कम हो, उसके विशेषाधिकार समाप्त हो जाएँ और हर किसी को वे अधिकार मिल जाएँ। महाभारत के निषेध की भ्रांति फैलाने के मूल में यही कारण था।
हालाँकि उस समय यह बात इस रूप में नहीं फैलाई गई थी, क्योंकि तब छापाख़ाने नहीं थे और काग़ज़ भी नहीं था। काग़ज़ हमारे यहाँ बहुत बाद में, लगभग दसवीं-ग्यारहवीं सदी में आया। मैं उससे बारह सौ साल पहले की बात कर रहा हूँ।
उस समय कहा गया कि आप घर में महाभारत नहीं पढ़ सकते, क्योंकि ऐसा करने से कुछ अशुभ होगा। इसलिए महाभारत का पठन सार्वजनिक जगहों पर हो- नदी के किनारे, मंदिरों में या ऐसी ही किसी और जगह।
साफ़ है कि यदि आप अपने घर में स्वयं महाभारत पढ़ने लगेंगे तो जो यजमानी है, यानी पढ़ने वाले का आर्थिक सहारा, वह छिन जाएगा। इसलिए अफ़वाहें फैलाई गईं और वे धीरे-धीरे स्थिर होती गईं।
लेकिन इसकी स्थिरता में एक दूसरा कारण भी था, जिसे कभी एंथ्रोपोलॉजिस्टों को खोजना चाहिए। महाभारत सुनने के बहाने लोग एक जगह इकट्ठा हो सकते थे। यह उनके लिए एक तरह का सोशल डिफ़ेंस भी था। वे महाभारत के उदाहरण दे सकते थे। यदि कभी उन्हें ब्राह्मण वर्ग के सामने जूझना पड़े तो उसके लिए महाभारत के कारण इकट्ठा होना उनके बहुत काम आता था।
और आपने देखा होगा कि बहुत बार जो राजा बने, ख़ासकर ग़ैर-क्षत्रिय राजा, हमारे देश में ऐसे बहुत लोग हुए, उन्होंने हमेशा महाभारत का अध्ययन किया, उसे समझा और उससे सीखा।
मैं महाराष्ट्र से हूँ, इसलिए एक उदाहरण देता हूँ। छत्रपति शिवाजी महाराज की औपचारिक पढ़ाई बहुत कम हुई थी। चौदहवें वर्ष में ही वे युद्ध और राजकीय प्रक्रियाओं में सक्रिय हो गए थे। उनकी माँ जिजाऊ- जिन्हें महाराष्ट्र में जिजामाता कहा जाता है- उन्हें महाभारत की कथाएँ सुनाया करती थीं। महाभारत से उन्होंने शिक्षा ली और फिर वे एक अच्छे राजा बने।
ऐसे बहुत सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं। ख़ासकर कर्नाटक के कुछ लोग ओडिशा में राजा बने और वहाँ उन्होंने पाँच-छह सौ वर्षों तक अच्छा शासन चलाया। महाभारत उनकी शिक्षा का मूल स्रोत था।

महाभारत हमेशा इस देश में ज्ञान की एक समानांतर धारा रही है। और यह बात ब्राह्मण वर्ग को पसंद नहीं आती थी। इसलिए ‘महाभारत से दूर रहो’ कहना दरअसल यह कहने का एक परोक्ष तरीका था कि महाभारत को अपने घर में मत रखो।
फिर जब लिखने का चलन शुरू हुआ और महाभारत की हस्तलिखित प्रतियाँ बनने लगीं, तब भी बहुत सारा धन खर्च करके लोग उन्हें ख़रीदते थे। लेकिन वे प्रतियाँ प्रायः राजा के राजमहल में नहीं रखी जाती थीं। उनके लिए अलग स्थान बनाया जाता था।
इसी तरह जब छपाई का उद्भव हुआ और महाभारत के कुछ अनुवाद अंग्रेज़ी तथा भारतीय भाषाओं में हुए, तब ‘घर में यह ग्रंथ न रखें’ वाली पहले से स्वीकृत धारणा उन पर भी लागू हो गई। और आज भी कहीं-कहीं उसका असर दिखाई देता है।
महाभारत इज़ द सेंटर फ़ॉर सोशल लाइफ़, सोशल बीइंग, सोशल कनेक्टिविटी।
रामायण जो है, वह हमारे आत्मचिंतन का रूप रही है।
प्रश्न – आपकी किताब में जनजातीय भाषाओं में महाभारत आधारित रचनाओं के प्रसंग में गरासिया भीलों के बीच प्रचलित भारत कविता का प्रसंग आया है। भीली महाभारत में सर्पराज वासुकि ज़्यादा शक्तिशाली नायक के तौर पर सामने आते हैं, द्रौपदी का चीरहरण, सत्यवान-सावित्री, नल-दमयंती जैसी उपकथाएँ इसमें नदारद हैं, कृष्ण हैं मगर भगवद्गीता का प्रसंग नहीं है। इसकी कथावस्तु में जो अंतर आपने रेखांकित किए हैं, उन्हें पढ़ते हुए मुझे गोंड रामायनी की याद आई, जिसमें केंद्रीय चरित्र लक्ष्मण का है, उसमें हनुमान हैं तो भीम भी हैं। रामायनी पढ़ते हुए मुझे लगता था कि संभवतः अलग-अलग स्रोतों से गोंड लोगों तक पहुँची रामायण की कहानियाँ लोक-स्मृति में गड्डमड्ड हो जाने की वजह से ऐसा हुआ हो। पर जैसा आपने कहा है, उससे लगता है कि उन्होंने ख़ास तरह के फ़िल्टर इस्तेमाल करके इसे अपनाया होगा। यह कैसे संभव हुआ?
जी. एन. देवी- ये जो गरासिया भील समुदाय है, राजस्थान के दक्षिण और गुजरात के उत्तर की सीमा पर आबाद है। भीलों में और अन्य अनेक आदिवासी समाजों में भी शरीर को देखने का जो दृष्टिकोण है, वह हमारे समाज से बहुत अलग रहा है।
वहाँ या कोंकण में जो नाटक होते हैं, उनमें पुरुष स्त्री का वेश धारण करके पात्र निभाते हैं। कभी-कभी स्त्रियाँ पुरुष का वेश धारण करके अभिनय करती हैं। उनके समाज की नज़र में पुरुष यदि स्त्री के कपड़े पहने या स्त्री पुरुष के कपड़े पहने, तो इससे कोई हीनता या बुराई नहीं जुड़ी होती।
भीलों में कभी-कभी पुरुष कोई व्रत लेते हैं। जैसे कोई बीमार हो गया, खेती अच्छी नहीं हुई, तो एक पूरा साल वह स्त्री के कपड़े पहनकर रहेगा। उसमें कोई ख़राबी नहीं मानी जाती। क्योंकि स्त्री की देह और पुरुष की देह को वे देह की नज़र से देखते हैं, न कि किसी ग़लत नज़र से।
आपको शायद पता होगा कि बहुत सारे आदिवासी समाजों में स्त्री बिना ब्लाउज़ या ब्रेसियर के भी घूम सकती थी और वहाँ दुष्कर्म जैसी घटनाएँ लगभग सुनने में नहीं आती थीं। ऐसे समाजों में द्रौपदी वस्त्रहरण जैसे प्रसंग को लेकर कोई विशेष आकर्षण नहीं होना अस्वाभाविक नहीं है।
गरासिया भील, जिन्होंने यह महाभारत रची है, राजस्थान के दक्षिण और गुजरात के उत्तर में बसे हुए वे समुदाय हैं, जो हड़प्पा संस्कृति के विनाश के बाद बिखरे हुए समाजों की परंपराओं से जुड़े हुए हैं। वे मौजूदा संस्कृति के देश में आने के पहले वाले समाजों के उत्तराधिकारी हैं।
ईसा पूर्व चौदहवीं सदी से लेकर सातवीं सदी ईसा पूर्व तक के कालखंड में कौन-कौन से राजा बने, कौन-कौन से राजपुत्र हुए, उनकी कुछ स्मृतियाँ उनके पास भी हैं। मौखिक परंपरा में वे अत्यंत पारंगत हैं। उनकी दीर्घकालीन स्मृति बहुत अच्छे ढंग से काम करती है। उन्होंने बहुत कुछ याद रखा है और वे सारी स्मृतियाँ इन कथाओं में आती हैं।
अपनी महाभारत को उन्होंने भारथ नाम दिया। कुरुवंश के बारे में वे जानते हैं, वह सब कुछ उस कविता में आता है। लेकिन उसके साथ-साथ उनके अपने राजा भी हैं, उनके समाज के अपने लोग भी हैं और उनके बारे में भी उसमें लिखा गया है।
जब आप यह सवाल पूछ रहे थे तो मुझे महाश्वेता देवी की एक कथा याद आ रही थी। उन्होंने महाभारत के बारे में एक कहानी लिखी थी। उसमें प्रसंग यह था कि जब लाक्षागृह बनाया गया और उसे जलाया गया ताकि पांडव मारे जाएँ, तब पांडव तो वहाँ से निकल गए। लेकिन किसी को शक न हो, इसलिए पाँच आदिवासियों को वहाँ ठहरने के लिए कहा गया। लाक्षागृह जलने के बाद उनके जले हुए शरीर कौरवों को मिले और उन्होंने समझा कि पांडव मर गए हैं।
महाश्वेता देवी का कहना था कि महाभारत के युद्ध के समय ऐसे बहुत सारे आदिवासी समाज रहे होंगे, जो स्वयं भी इस युद्ध में शामिल थे, लेकिन जिनके बारे में प्रमुख महाभारत में लिखा नहीं गया। फिर भी उनकी स्मृतियाँ उनके समुदायों के भीतर जीवित रही होंगी और कभी न कभी उभरकर सामने आएँगी।
जब मैं महाश्वेता देवी को अपनी आदिवासी अकादमी लेकर गया, उन दिनों भीलों का यह महाभारत गायन चल रहा था। वह लगभग दो महीने तक चला। वहाँ जुटे आदिवासी लगातार दो महीने तक इसे गाते रहे।
तब उन्होंने मुझसे कहा था- “हाँ गणेश, मैं इन्हीं लोगों के बारे में सोचती थी। इनकी भी एक स्मृति है।”
उन्होंने कहा कि इनकी स्मृति शरीर के सौंदर्य के बारे में नहीं है, बल्कि उनकी कथा में शूरता क्या है, यह दर्शाया गया है। उनकी कथा में शूरता अर्जुन के पास नहीं है, बल्कि द्रौपदी के पास है। उनकी कथा में अर्जुन महाभारत का नायक नहीं है। द्रौपदी प्रमुख पात्र है।
तो आप कह सकते हैं कि यह फ़ेमिनिस्ट महाभारत का एक बहुत विकसित रूप है। एक सबाल्टर्न महाभारत है।
लेकिन ये हमारे विशेषण हैं। वे स्वयं अपनी कथा को किसी फ़ेमिनिस्ट नज़रिये से नहीं देखते। उनके लिए तो महाभारत सबके इकट्ठा होने, उसमें शामिल होने और साथ मिलकर उत्सव मनाने का एक पवित्र अवसर है।
प्र- सर, इस संदर्भ में एक जिज्ञासा यह भी है, और आपने लिखा भी है कि रामायण में तो एक नायक है और महाभारत नायकों का समुच्चय है, तो…
जी.एन. देवी- यह मैंने नहीं, राजशेखर ने लिखा था। राजशेखर नौवीं शताब्दी के साहित्यिक आलोचक थे, जो संस्कृत और मराठी अपभ्रंश दोनों में लिखते थे।
उन्होंने लिखा था कि रामायण एक नायक का महाकाव्य है, जबकि महाभारत अनेक नायकों का महाकाव्य है। महाभारत कविता भी है और इतिहास भी। वह अधिक विस्तृत कविता है और अधिक विस्तृत इतिहास भी।
प्र – बहुनायकों वाले इस ग्रंथ में कुछ ऐसे पात्र भी हैं, जिनकी तुलना आसानी से रामायण के खल चरित्रों से की जा सकती है. रामायण के ऐसे चरित्रों की जनमानस के बीच कोई प्रतिष्ठा नहीं है. इसके विपरीत महाभारत में अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए येन-केन-प्रकारेण जतन करने वाले पात्रों से लोगों को बहुत दुराव नहीं है. मसलन कर्ण का किरदार. ‘मृत्युंजय’ पढ़ने के बाद मैंने शिवाजी सावंत के सामने यह जिज्ञासा रखी थी कि चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु को मारने वाले योद्धाओं में कर्ण क्यों शामिल था और जवाब में उन्होंने कहा था कि अर्जुन के हाथों अपने पुत्र वृषसेन के वध के विरुद्ध वह कर्ण का प्रतिशोध था. लोगों के बीच कर्ण आदर का पात्र है. जयद्रथ वध का अर्जुन का संकल्प पूरा न होता अगर कृष्ण सूर्यास्त का भ्रम पैदा न करते. ऐसा क्यों है?
जी.एन. देवी- महाभारण में किसी पर वैल्यू जजमेंट नहीं है कि यह अच्छा आदमी है, मैं इसे अच्छे आदमी के रूप में दिखाऊंगा या इसको ख़राब आदमी के रुप में दिखाऊंगा यह विलेन है। ऐसा कोई वैल्यू जजमेंट नहीं है महाभारत में। बल्कि महाभारत तो इतना ही कहता है कि दुनिया का वैल्यू जजमेंट करने से पहले हम ख़ुद कौन हैं, वो जानें. वह जो वेद में सबसे अहम दर्शन था – तत्वमसि, वो महाभारत में आया है कि आप कौन हैं। तो आप पूरी दुनिया के विशाल रूप का वैसे ही हिस्सा है, जैसे कि बाक़ी सभी.। इतना ही है।
तो किसी को जज करना महाभारत में नहीं है। महाभारत की जो वर्णन शैली है, उसमें विस्तृत व्याख्या नहीं है। रामायण में व्याख्या-विस्तार बहुत है। महाभारत में, जैसे रैपिड नैरेशन होता है न, वैसे हर चीज का बहुत फटाफट वर्णन है क्योंकि उस कवि को किसी के बारे में अपनी राय देना उचित नहीं लगा। उसकी कविता किरदार के बारे में कोई धारणा नहीं बनाती। इट हैज़ मेनी कैरेक्टर्स ऑफ़ ऑल काइंड, अल्टीमेटली ऑल ऑफ़ देम हैव द सेम इनर सेल्फ़ और वो जो इनर सेल्फ़ है, वह मल्टीट्यूड का इनर सेल्फ़ है, यूनिटी का इनर सेल्फ़ नहीं है यह ख़ास बात है। जो विराट पुरुष स्वरूप है, उसमें बहुत कुछ है। केवल एक ही एक नहीं है। केवल अमृत का संचय नहीं है। सब कुछ है, उसमें आग भी है, उसमें पानी भी है, आकाश भी है और ज़मीन भी है। द बीइंग ऑफ़ मेनी, द टुगेदरनेस ऑफ़ मेनी इन एवरीथिंग। दैट इज़ द एसेंस ऑफ़ द फ़िलॉसफ़ी। ऐसा मुझे लगता है।
प्र – आपकी किताब पढ़ते हुए मैंने पाया है कि जगह-जगह आपने कथा के मिथकीय तत्वों को रेखांकित किया है और कई जगह आए प्रसंगों को इतिहास भी कहा है. अभी जैसा कि आपने भीलों के हवाले से बताया भी कि उनके पास इतिहास की स्मृति है। तो आपसे यह भी समझना चाहता हूँ कि मिथक और इतिहास का यह मेल, ख़ासतौर पर हमारे दौर में, समाज को और इतिहास को भी किस तरह प्रभावित करता है? और महाभारत को हमें दरअसल किस नज़र से देखना चाहिए?
जी.एन. देवी- इट्स वेरी डीप क्वेश्चन, इंटरेस्टिंग क्वेश्चन। तो मैं थोड़ा ज़्यादा गंभीरता से इसका जवाब देना चाहता हूं। पश्चिम में इस समय मिथक के साथ संबंध रखना लोगों के लिए असंभव बना हुआ है। और उसकी शुरुआत हुई थी सत्रहवीं सदी में। कैथोलिक चर्च के ख़िलाफ़ जो बग़ावत हुई थी, जिसे तर्क के साथ चुनौती मिली थी। और हॉब्स, लॉक जिसका हिस्सा थे। डेकार्टे ने तो कहा था कि आय एग्ज़िस्ट बिकॉज़ आय थिंक। वे इस दुनिया को मनुष्य केंद्रित करके जीना चाहते थे। इससे साइंस की तरक़्क़ी हुई। आय रियली एडमायर साइंस। लेकिन रैशनेलिटी को केंद्र में लाने के बाद पश्चिम के समाज को मिथक से अपना पल्ला झाड़ना पड़ा। और फिर जेम्स जॉयस जब आए तो उनकी चिंता मिथकों के सृजन की थी, जो वह नहीं बना पा रहे थे।
हमारे यहां ऐसा नहीं हुआ. लेकिन पश्चिम में रैशनेलिटी को बढ़ाते-बढ़ाते, साइंस और टेक्नोलॉजी को और आगे बढ़ने के मौक़े मिले, इससे समाज में जो हिंसा फैली और युद्ध जन्मे, दूसरी जगहों पर युद्ध पैदा करने के तरीक़े उन्होंने अपनाए।
हमारे यहां मिथक हमारे साथ रहा। क्योंकि हमने रैशनेलिटी को लेकर धर्म के सामने कभी उलगुलान नहीं किया, कोई बग़ावत नहीं की। मिथक को साथ लेकर हम जिस तरह आगे चलते आए, उससे हम एक बहुत स्वस्थ समाज हो सकते थे। पश्चिम में रैशनेलिटी को लेकर हिंसा का उद्भव हुआ। पर इस समय हमारे यहां मिथक को लेकर हिंसा का उद्भव हो रहा है, क्योंकि हमारा यथार्थ आज मिथक के रूप में देखा जा रहा है और हर गली में, हर रास्ते में, हर शहर में उसके नाम से लोगों को पीड़ा पहुँचाने का तंत्र अपनाया जा रहा है।
तो मैं आधुनिक दुनिया में हिंसा का अर्थ समझने की कोशिश करता हूँ—मिथक के साथ, मिथक के बग़ैर, रैशनेलिटी के साथ, रैशनेलिटी के बग़ैर। मुझे ऐसा लगता है कि यह हमारी उत्क्रांति का कोई नया रूप है।
और जैसा मैंने आरंभ में कहा कि भाषा को हम छोड़ रहे हैं और भाषा को तोड़-मरोड़ कर नई दुनिया में, किसी वर्चुअल स्पेस में जा रहे हैं। जैसे यूनिवर्स अभी विश्व है, उसकी जगह मेटावर्स गढ़ रहे हैं। यानी जैसे लाइब्रेरी में किताबें होती हैं और किताबों का ब्योरा होता है। किताबों को हम बुक्स कहते हैं और लाइब्रेरी के रिकॉर्ड को मेटाडेटा। तो यूनिवर्स की जगह उसकी एक ऐसी छवि जिसमें सब अमर होने वाले हैं। मेरे मरने के बाद मेरा फ़ोटो लेकर कोई आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस उसमें मेरी आवाज़ डालेगा और मेरी एक प्रतिमा हमेशा के लिए वहां ज़िंदा रहेगी। इस भ्रम में दुनिया आगे निकली है। इन सर्च ऑफ़ वर्चुअल इम्मॉर्टेलिटी, नॉट रियली मॉर्टेलिटी।
ऐसे समय में दुनिया में बहुत सारे लोग, बहुतेरे समाज, देश ख़ुद अपने लोगों के ऊपर दमन करना, ख़ुद के लोगों को हिंसा से पीड़ित करने का रास्ता अपना रहे। आपने देखा होगा कि दुनिया में सभी जगह डेमोक्रेसी चली गई। डिक्टेटरशिप आई। हर डिक्टेटर अपने ख़ुद के लोगों को ही परेशान कर रहा है और यह सिलसिला पूरी दुनिया में फैला है। दिस इज़ ए न्यू फ़ेज़ ऑफ़ रियलिटी।
अब यह समझने के लिए हमारे पास कोई अच्छा व्यास होना चाहिए। अच्छा गणेश होना चाहिए। अच्छे महाभारत का निर्माण होना चाहिए। वह कौन करेगा? उस प्रतिभा के लोग होने चाहिए। कोई एक रवींद्रनाथ टैगोर, कोई एक होमर होता, कोई वाल्मीकि, कोई एक व्यास होता।
हमारे समय में शायद आपको और हमको मिलकर यह काम करना पड़ेगा। शायद।


सर, अद्भुत साक्षात्कार किया। जी एन देवी ने महाभारत को समझने जानने का नजरिया बदल दिया आपके मार्फत।
मुकुंद