हमारा अतीत हमारे शहरों में बसता है। उन्हीं शहरों में जहाँ छूट जाता है हमारा बचपन, हमारा यौवन और वो अपने, वो सपने जो एक समय के बाद यादों में तब्दील हो जाते हैं। जो न हमसे छूट पाते हैं और न हमें छोड़ पाते हैं, बचे रहते हैं हमारे भीतर समूचे संसार की तरह। इन शहरों की याद जितना उदास करती है उससे कहीं ज्यादा आनन्दित। इन छूट गए शहरों से मिलना अपने आप से मिलना है। दोहराना उस दास्ताँ को जो झाँकती है अतीत के धुँधलके से। प्रियदर्शन की किताब ‘क्या यह शहर तुम्हारा है?’ इसी जुड़ाव की मिसाल पेश करती है। यहाँ उन्होंने छोटे बड़े लेखों-आलेखों के जरिए अपने शहर और उसकी स्मृतियों को उकेरा है। जो कई जगह संस्मरणों का आभास देते स्मृतियों की दुनिया में ले जाते हैं।
24 जून 1968 को राँची में जन्मे प्रियदर्शन हिन्दी जगत के उन विरले रचनाकारों में हैं जिनका साहित्य बहुविध और विचारशील है। वे न सिर्फ एक सुलझे हुए साहित्यकार बल्कि प्रखर पत्रकार भी हैं। उनकी भाषा पर जितना प्रभाव साहित्य का है उतना ही पत्रकारिता का।
उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण, नाटक और आलोचना जैसी अनेक विधाओं में वैचारिक और उल्लेखनीय लेखन करते हुए साहित्य और पत्रकारिता में अपनी सार्थक उपस्थिति बना रखी है। उनकी रचनाओं की बड़ी विशेषता संतुलित विचार-दृष्टि, सामाजिक सरोकार और सहज भाषा है। हिन्दी जगत को उन्होंने अपने समृद्धशाली लेखन से बाइस कृतियाँ सौंपी हैं। “क्या यह शहर तुम्हारा है” में संकलित संस्मरण उनके अपने शहर राँची के इर्द-गिर्द बुने गए हैं।
यह किताब यादों-संवादों का वो सिलसिला है जो पाठक को उसी आबो-हवा में ले जाता है जिसे लेखक ने बरसों-बरस जिया, महसूस किया और शब्दों में सँजोया है। वो जगह जो पाठक को उस शहर की खाद-पानी, धूल-मिट्टी से मिलाती है। किताब में आए संस्मरण किसी एक व्यक्ति के लिए या सिर्फ एक शहर की स्मृति नहीं है, बल्कि उन तमाम भारतीय शहरों की कहानी है जो गाँवों से कस्बों, कस्बों से शहरों और शहरों से महानगरों में बदलते चले गए। राँची का बदलता स्वरूप यहाँ एक प्रतीक की तरह उपस्थित है। छोटे शहर से राजधानी बनने तक की यात्रा में आए सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय बदलावों को लेखक ने बड़ी सूझ-बूझ और संवेदनशीलता से दर्ज किया है। किताब में जहाँ शहर के विविध रंग हैं वहीं एक महक है माटी की, एक छाया है स्मृतियों की। यह रंग और खुशबू पन्ना दर पन्ना पाठक की अनुभूति में उतरते जाते हैं और समय के साथ लगातार बदलने के बाद भी अपनी पहचान नहीं खोते बल्कि अपनी मूल पहचान संजोए, शहर का अस्तित्व दर्ज़ कराते, एक नयी पहचान के साथ दाखिल होते हैं।
किसी शहर की स्मृतियाँ हमारे भीतर कितनी मिटती-सिमटती और जीवित रहती हैं, यह उन संबंधों-सरोकारों पर निर्भर है जो हमें उससे जोड़ते और हमारे भीतर उन जड़ों को जमाए रखते हैं। हालांकि यह शहर छूटने के बाद ही पता चलता है कि उसकी जड़ें हमारे भीतर कितनी गहरी और मजबूत हैं। यहाँ झीलों, तालाबों से आती अंचल की वो महक मौजूद है जिसकी स्मृतियाँ लेखक के भीतर सामाजिक सरोकारों की तरह उभरती हैं। शहरों की इस तब्दीली के साथ लोगों का मिलना-बिछुड़ना अनवरत चलता रहता है। लेकिन शहर सिर्फ बाहर ही नहीं बदलते वे हमारे भीतर भी अपना एक स्थाई स्वरूप छोड़ जाते हैं। समय के साथ गली-मौहल्ले-इमारतें बदल जाते हैं मगर उनकी स्मृतियों की सुगंध बची रहती है। किताब में उन टूटते घरों, दरकते मोहल्लों की कहानी दर्ज़ है जो अपार्टमेंट के नक्शे या कि आधुनिक घरों में बदलते चले गए। जिनमें ड्राइंगरुम, बेडरूम, बालकनी, पार्किंग जैसी तमाम सुविधाएं हैं लेकिन घर की आत्मा कहा जाने वाला वो आँगन नहीं है जहाँ पेड़-पौधों, बेल-बूटों की ऐसी बाड़ी तैयार की जा सके कि रिश्ते साँस लेते रहें।

इन लेखों की खासियत है कि यहाँ अतीत का विलाप नहीं है बल्कि बदलाव का स्वीकार है। जिसे लेखक ने मनुष्य और समाज की बदलती प्रकृति के रूप में देखा है। वे लिखते हैं- “धीरे-धीरे नई इमारतों में भी लोग बसेंगे, नई पहचानें बनेंगी और नए रिश्ते जन्म लेंगे।” यहाँ स्मृति और आशा के बीच एक संतुलन है। किताब के छोटे-छोटे प्रसंगों में एक पूरे समय का इतिहास दर्ज है। यहाँ कहीं रंगमंच की हलचल है, कहीं सिनेमा की स्मृतियाँ, कहीं साहित्यिक गतिविधियों की गूँज है तो कहीं मोहल्लों, सड़कों, तालाबों से जुड़े जीवन की कहानियाँ। लेखक की दृष्टि केवल अतीत की इमारतों तक सीमित नहीं है बल्कि उन लोगों तक भी पहुँचती है जिन्होंने अपनी उपस्थिति, संघर्ष और सृजनशीलता से शहर को उसका वास्तविक चरित्र प्रदान किया या कहना चाहिए शहर को शहर बनाया। यही कारण है कि यह किताब किसी एक शहर का वृतांत नहीं बल्कि समय, शहर, स्मृतियों और पारस्परिक संबंधों का जीवंत दस्तावेज़ है।
प्रियदर्शन की चिंता केवल भौतिक बदलावों तक सीमित नहीं है। उन्हें इस बात की भी फ़िक्र है कि आज शहरों के तेवर तीव्रता से बदल रहे हैं। वे लिखते हैं कि “भीड़ बढ़ी है, लेकिन सार्वजनिकता की जगह सिकुड़ी है। विकास के नाम पर शहर अधिक व्यस्त, अधिक हिंसक और अधिक अजनबी होते गए हैं। यह बदलाव केवल वास्तुशिल्प का नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों का भी है। लोग साथ रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।” यहाँ लेखक की चिंता उस बदलते स्वरूप को लेकर है जहाँ आदमी अपने ही परिवेश में अकेला होता जा रहा है। जिसकी एक बड़ी वजह बाज़ार का प्रभाव और भीड़ का दबाव है जिसे हमने विकास का नाम दे दिया है। इन दिनों गाँवों-कस्बों-शहरों के भीतर घटते मानवीय और नैतिक मूल्य भी इसी विकास में शामिल हैं।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि इसमें दर्ज़ अनुभव निजी होते हुए भी सामूहिक लगते हैं। राँची की गलियों के ये किस्से पढ़ते हुए पाठक अपने शहर की स्मृतियों में लौटने लगता है। उसे अपने मोहल्ले, अपने स्कूल, अपने मित्र और अपने छूटे हुए समय याद आने लगते हैं।
लेखक बार-बार स्मृति के महत्व को रेखांकित करते हैं। उनके अनुसार इतिहास केवल बड़ी घटनाओं से नहीं बनता, बल्कि उन छोटी-छोटी चीज़ों से भी बनता है जिन्हें लोग अक्सर महत्वहीन समझकर छोड़ देते हैं। वे लिखते हैं— “उस इतिहास को बचाना ज़रूरी है जिसे हमने बनाया और जिसने हमें बनाया।” इसे किताब का मूल भाव कह सकते हैं।
प्रियदर्शन की लेखन-शैली की विशेषता उनकी संक्षिप्त और प्रभावी अभिव्यक्ति है। छोटी बात को बड़े अर्थ में समेट लेने की उनकी यह कला लेखन को गहराई देती स्मरणीय बनाती है। इसकी एक बानगी यहाँ मिलती है- “इमारतें ऊँची होती जा रही हैं, मन छोटा होता जा रहा है। रास्ता फैल रहा है, वास्ता सिकुड़ रहा है।” ऐसे वाक्य दरअसल हमारे समय की व्याख्या हैं। इन ऊँची होती इमारतों के बीच कहीं जातीय विभाजन की झलक है तो कहीं बदलती जीवनशैली या कहना चाहिए तकनीकी युग का प्रभाव। संचार क्रांति और इंटरनेट के दौर में बदलती संवेदनाओं को भी प्रियदर्शन सूक्ष्मता से दर्ज करते, उसके प्रभाव को दर्शाते हैं। इस अर्थ में यह पुस्तक केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का दस्तावेज़ भी है। जिसे पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक अपने अस्तित्व को अपने शहर की स्मृतियों से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए शहर कोई भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवन का विस्तार है। वे लिखते हैं कि “शहर हमारे भीतर बसते हैं; हम वहाँ रहें या न रहें, वे हमारे साथ चलते रहते हैं। हम उन्हें छोड़ नहीं पाते और वे हमसे छूट नहीं पाते।” किताब उन तमाम शहरों की कहानी है जहाँ कभी सड़कों पर पैदल चलते लोग, साइकिलों की घंटियाँ, मोहल्लों की चहल-पहल और पड़ोस की आत्मीयता जीवन का हिस्सा हुआ करती थी या कहना चाहिए उन लम्हों की जो लौटकर नहीं आते, लेकिन स्मृतियों में हमेशा बने रहते हैं। यहाँ अतीत की उदासी है, वर्तमान का कोलाहल है और भविष्य के लिए कुछ बचा लेने की बेचैनी भी।
प्रियदर्शन ने अपने शहर को उसकी जटिलताओं को समझते, उसकी असलियत को पहचानते और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखते हुए जिस आत्मीयता, संवेदनशीलता और वैचारिक गहराई के साथ दर्ज़ किया है, वह इस पुस्तक को संस्मरण से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ बनाते हैं। किताब का सबसे मार्मिक पक्ष शहर के प्रति लेखक की वो आत्मीयता है जो उसे अतीत से मिलाती और उस अतीत में अपने होने का एहसास कराती है। कुल मिलाकर क्या यह शहर तुम्हारा है? समय, समाज, स्मृति और शहर के अंतर्संबंधों को समझने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह किसी एक शहर की कथा न होकर थोड़ी-थोड़ी उन सभी शहरों की दास्तान है जो बदलते समय के साथ अपनी पुरानी पहचान खोते और नई पहचान गढ़ते आए हैं।
किताब पाठकों को अपने शहरों से इस कदर जोड़ती है कि वे पढ़कर महसूस कर पाते हैं कि शहर केवल इमारतों और सड़कों से नहीं बनते; वे स्मृतियों, रिश्तों और उन अनगिन अनुभवों से बनते हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलते हुए हमें गढ़ते-गुनते, बुनते-बदलते रहते हैं।
शीर्षक – क्या यह शहर तुम्हारा है?
लेखक – प्रियदर्शन
विधा – संस्मरण
प्रकाशन वर्ष – 2025
प्रकाशक – रुद्रादित्य प्रकाशन
पृष्ठ संख्या – 109
मूल्य – ₹ 225


प्रियदर्शन मेरे भी प्रिय लेखक हैं। उनकी रचनाएं बहुत मन से पढ़ता हूं। ममता जयंत ने जिस तरह नई पुस्तक की समीक्षा की है, उससे तो लगता है कि अब तुरंत मंगवा लेनी चाहिए…