कराची: पाकिस्तान के कराची में अलग ‘सिंधुदेश’ की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसा में बदलने के बाद तनाव बढ़ गया है। इस दौरान पथराव, तोड़फोड़ और पुलिस के साथ तीखी झड़पें हुईं। हिंसा रविवार को सिंधी संस्कृति दिवस पर अलग ‘सिंधुदेश’ की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों के सड़कों पर उतरने के बाद शुरू हुई।
जिये सिंध मुत्तहिदा महाज (JSSM) के बैनर तले सिंधियों के एक बड़े समूह ने ‘आजादी’ और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। उन्होंने सिंध की आजादी का आह्वान किया, जिससे सिंधी राष्ट्रवादी दलों की लंबे समय से चली आ रही भावना और प्रबल हो गई।
1947 में भारत के विभाजन के बाद सिंधु नदी के पास का क्षेत्र- सिंध प्रांत पाकिस्तान में चला गया। महाभारत की कथा के अनुसार, सिंधुदेश आधुनिक सिंध का प्राचीन नाम था। फिलहाल यह पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा प्रांत है।
बहरहाल, रविवार को अधिकारियों द्वारा रैली का मार्ग बदलने के बाद तनाव तेजी से बढ़ गया, जिससे हजारों प्रदर्शनकारी नाराज हो गए। स्थिति तब और बिगड़ गई जब भीड़ के कुछ लोगों ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव और तोड़फोड़ शुरू कर दी। इसके बाद कराची की पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार हिंसा के सिलसिले में कम से कम 45 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, हिंसा में पाँच पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। सरकार ने पुलिस को संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ करने वालों की पहचान करने और उन्हें गिरफ्तार करने का निर्देश दिया है।
संयुक्त राष्ट्र, पीएम मोदी से अपील
लंबे समय से सिंधी संगठन प्रांत में लगातार राजनीतिक दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल की शुरुआत में, निर्वासित अध्यक्ष शफी बुरफत के नेतृत्व में जेएसएसएम ने संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप करने और सिंधुदेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया था।
जेएसएसएम ने सिंध और भारत के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अपनी मांग का समर्थन करने की अपील की थी।
अपने बयान में संगठन ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर सिंध में ‘गंभीर मानवाधिकार हनन’ का आरोप लगाया, जिसमें कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को जबरन गायब करना, यातना देना और हत्याएँ शामिल हैं। इसने यह भी दावा किया कि उसके सिंधुदेश आंदोलन को निशाना बनाने के लिए आतंकवाद विरोधी कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है।
खबरों में क्यों आया सिंधुदेश?
सिंध को लेकर नए सिरे से चल रही राजनीतिक हलचल के बीच सिंधुदेश की मांग को नई हवा मिली है। पिछले हफ्ते एक पाकिस्तानी समाचार चैनल ने एक चर्चा प्रसारित की जिसमें एक पत्रकार और एक विशेषज्ञ ने दावा किया कि MQM (मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट) के प्रमुख अल्ताफ हुसैन ने एक बार सिंध के पूर्व गृह मंत्री जुल्फिकार मिर्जा से कहा था कि 18वें संशोधन के पारित होने के बाद ‘सिंधुदेश कार्ड अब हमारे हाथ में है।’
भारत में भी इस मुद्दे ने तब ध्यान खींचा जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विश्वास जताया कि सिंध क्षेत्र एक दिन भारत में वापस आ जाएगा।
पिछले महीने नई दिल्ली में सिंधी समाज सम्मेलन में बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि उनकी पीढ़ी के कई सिंधी हिंदुओं ने 1947 के उस फैसले को ‘कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया’ जिसमें सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था।
उन्होंने कहा कि सिंध हमेशा से सांस्कृतिक रूप से भारत से जुड़ा रहा है। राजनाथ ने कहा, ‘आज सिंध भले ही भारत का हिस्सा न हो, लेकिन सभ्यता की दृष्टि से सिंध हमेशा भारत का हिस्सा रहेगा। जहाँ तक जमीन का सवाल है, सीमाएँ बदल सकती हैं। कौन जाने, कल सिंध फिर से भारत में वापस आ जाए।’
1971 के बाद सिंधुदेश की मांग ने पकड़ा जोर
हालाँकि, पाकिस्तान के सिंध प्रांत में भारत में विलय की वकालत करने वाला कोई खास राजनीतिक आंदोलन नहीं है। ये संगठन पाकिस्तान के भीतर स्वायत्तता या एक स्वतंत्र सिंधुदेश का गठन चाहते हैं। औपनिवेशिक काल में सिंध ब्रिटिश भारत के अधीन एक अलग प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में था, उसके बाद उसका विलय कर दिया गया। विभाजन के बाद यह पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
अलग सिंधुदेश की पहली मांग 1967 में विभाजन के शुरुआती समर्थकों में से एक जीएम सैयद और पीर अली मोहम्मद रश्दी के नेतृत्व में शुरू हुई थी। 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के बाद इसने और जोर पकड़ा। यह समुदाय बंगाली भाषा आंदोलन से प्रेरित था और सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी सिंध की विशिष्ट जातीय, भाषाई और ऐतिहासिक पहचान पर जोर देता रहा है।

