तिरुवनंतपुरम: केरल हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई में स्पष्ट किया कि नियोक्ता वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर किसी कर्मचारी को नौकरी जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यदि कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी का इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार करता है, तो यह ‘बंधुआ मजदूरी’ के बराबर है।
वेबसाइट बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस एन नागरेश ने कहा कि एक बार जब कोई कर्मचारी रोजगार की तय की गई शर्तों के अनुसार इस्तीफा देता है, तो उसे स्वीकार करना नियोक्ता का कर्तव्य है, ‘जब तक कि संविदात्मक शर्तों का पालन में कोई विफलता न हो।’
जज ने स्पष्ट किया कि इस्तीफे को केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही अस्वीकार किया जा सकता है, जैसे कि जब नोटिस अवधि की जरूरत हो या ‘भावनात्मक आवेश’ में दिए गए इस्तीफे जिन्हें वापस लिया जा सकता है। साथ ही अगर गंभीर अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित हो जिसमें बड़े दुर्व्यवहार या संगठन को वित्तीय नुकसान शामिल हो, उस हालात में भी इस्तीफा अस्वीकार किया जा सकता है।
हालांकि, मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि इनमें से कोई भी स्थिति मौजूद नहीं थी और वित्तीय संकट का हवाला देते हुए कंपनी द्वारा अपने कंपनी सचिव के इस्तीफे को स्वीकार करने से इनकार करना कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा, ‘वित्तीय समस्याएँ या वित्तीय आपातकाल किसी कंपनी सचिव को उसकी इच्छा के विरुद्ध और उसकी सहमति के बिना किसी कंपनी में काम करने के लिए बाध्य करने का कारण नहीं हो सकते।’
अदालत ने कहा, ‘याचिकाकर्ता के विरुद्ध कंपनी की ओर से प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्यवाही को प्रतिवादियों द्वारा याचिकाकर्ता के सेवा से इस्तीफा देने के अधिकार का उल्लंघन करने का प्रयास ही माना जा सकता है।’
अदालत ने कहा कि इस्तीफा स्वीकार न करना ‘बंधुआ मजदूरी’ के समान होगा, जिस पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत रोक है।
क्या था मामला?
यह मामला एक कंपनी सचिव से संबंधित था, जिसने राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम- ट्रैको केबल कंपनी लिमिटेड से इस्तीफे की मांग की थी। याचिकाकर्ता ग्रीवस जॉब पनाक्कल के अनुसार अक्टूबर 2022 से उनके वेतन का भुगतान नियमित तरीके से नहीं हो रहा था। इसके कारण वे अपना गुजारा करने और अपनी बीमार मां की देखभाल करने में असमर्थ थे, जिन्हें लगातार चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता थी।
ऐसे में ग्रीवस ने मार्च 2024 में सेवामुक्त करने का अनुरोध करते हुए अपना इस्तीफा किया। हालांकि, कंपनी के बोर्ड ने यह कहते हुए उनका इस्तीफा अस्वीकार कर दिया कि पनाक्कल की भूमिका जरूरी है और कंपनी गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही है। प्रबंधन ने उन्हें बार-बार कार्यभार संभालने के लिए कहा और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
कपंनी की इन्हीं कार्रवाइयों को चुनौती देते हुए ग्रीवस ने अपने खिलाफ जारी किए गए ज्ञापनों को रद्द करने और कंपनी को उनका इस्तीफा स्वीकार करने का निर्देश देने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की।
मामले को लेकर तमाम दलीलों पर विचार करने और दस्तावेजों को देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि कपनी सचिव/सेक्रेटरी की नियुक्त कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास पंजीकृत होती है और जब तक नियोक्ता आवश्यक वैधानिक फॉर्म जमा नहीं करता, कंपनी सचिव कहीं और इसी तरह का रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता।
कोर्ट ने यह भी पाया कि इससे याचिकाकर्ता को दूसरी नौकरी मिलने में मुश्किलें पेश आ रही थी। कोर्ट ने यह भी पाया कि कंपनी ने याचिकाकर्ता को लंबे समय से वेतन का भुगतान नहीं किया है और कंपनी का लैपटॉप अपने पास रखने के आरोप में उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही भी शुरू की है।
दो महीने में सेवामुक्त करने का आदेश
कोर्ट ने पाया कि कंपनी की ऐसी कार्रवाई कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकती क्योंकि याचिकाकर्ता को बिना किसी वैध कारण के उसके इस्तीफे के अधिकार से वंचित किया जा रहा था। ऐसे में कोर्ट ने पनाक्कल के इस्तीफे को अस्वीकार करने वाले ज्ञापनों और अनुशासनात्मक कार्यवाही के नोटिसों को रद्द करने का आदेश दिया।
साथ ही कोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह औपचारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार करे और याचिकाकर्ता को दो महीने के भीतर सेवामुक्त करे। कोर्ट ने कंपनी की वित्तीय स्थिति के आधार पर याचिकाकर्ता के वेतन, लीव सरेंडर बेनिफिट और अन्य अंतिम बकाया को भी जल्द से जल्द भुगतान करने का आदेश दिया।

