महज 50 साल की उम्र, 16 साल का फिल्मी सफर और बतौर निर्देशक सिर्फ पांच हिंदी फिल्में। आंकड़ों के हिसाब से यह करियर छोटा और संक्षिप्त लग सकता है, लेकिन सिनेमाई प्रभाव के पैमाने पर देखें तो निशिकांत कामत का कद अपने समकालीन निर्देशकों में काफी ऊंचा नजर आता है। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे बड़े सितारों से ज्यादा आम आदमी की कहानी पर भरोसा करते थे। शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्में दर्शकों के दिलों तक सीधे पहुंचती थीं।
17 जून 1970 को मुंबई के दादर में जन्मे निशिकांत का बचपन किसी फिल्मी माहौल में नहीं बीता। उनके पिता गणित के प्रोफेसर और मां संस्कृत की शिक्षिका थीं। कॉलेज के दिनों में थिएटर से उनका जुड़ाव हुआ और यहीं से अभिनय के साथ निर्देशन की दुनिया में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। शुरुआत में उन्होंने मराठी टेलीविजन और थिएटर में छोटे-छोटे काम किए। एक समय ऐसा भी था जब उनका काम शूटिंग की टेप उठाकर एडिटर तक पहुंचाना भर था। लेकिन इसी दौरान उन्होंने एडिटिंग की बारीकियां सीखीं और बहुत कम उम्र में पेशेवर एडिटर बन गए।
शायद यही वजह थी कि बाद में उनकी फिल्मों में गति, तनाव और सस्पेंस का संतुलन इतना प्रभावशाली नजर आता है। दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने की कला उन्होंने तकनीक और अनुभव, दोनों के दम पर हासिल की थी।
आम आदमी की कहानी को बनाया अपनी पहचान
साल 2005 में आई मराठी फिल्म ‘डोंबिवली फास्ट’ ने निशिकांत कामत को पहली बड़ी पहचान दिलाई। व्यवस्था से परेशान एक आम व्यक्ति के गुस्से को केंद्र में रखकर बनाई गई इस फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली और इसे सर्वश्रेष्ठ मराठी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। दिलचस्प बात यह है कि बाद के वर्षों में भी उनकी फिल्मों का केंद्रीय पात्र कोई सुपरहीरो नहीं, बल्कि आम इंसान ही रहा।
‘मुंबई मेरी जान’ में मुंबई धमाकों के बाद का दर्द झेलते लोग थे, ‘मदारी’ में व्यवस्था से सवाल पूछता एक पिता था और ‘दृश्यम’ में चौथी पास केबल ऑपरेटर विजय सालगांवकर था, जो अपने परिवार को बचाने के लिए पूरे सिस्टम को चुनौती देता है। निशिकांत की फिल्मों में अक्सर एक व्यक्ति व्यवस्था, सत्ता या हालात के खिलाफ संघर्ष करता दिखाई देता है। यही उनके सिनेमा की सबसे बड़ी पहचान बनी।
मराठी सिनेमा में सफलता हासिल करने के बाद निशिकांत ने 2008 में ‘मुंबई मेरी जान’ के जरिए बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने ‘फोर्स’, ‘दृश्यम’, ‘रॉकी हैंडसम’ और ‘मदारी’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। दिलचस्प बात यह है कि उनकी हिंदी फिल्मों की संख्या भले ही सिर्फ पांच रही, लेकिन लगभग हर फिल्म दर्शकों की पसंदीदा सूची में शामिल हो गई।
एक सफल रीमेक निर्देशक भी थे निशिकांत कामत
निशिकांत कामत को हिंदी सिनेमा के सबसे सफल रीमेक निर्देशकों में भी गिना जाता है। उनकी सबसे चर्चित फिल्म ‘दृश्यम’ दरअसल 2013 में रिलीज हुई इसी नाम की मलयालम फिल्म का हिंदी रूपांतरण थी। मूल फिल्म का निर्देशन लेखक-निर्देशक जीतू जोसेफ ने किया था और इसमें मोहनलाल मुख्य भूमिका में थे। वहीं हिंदी संस्करण में अजय देवगन, तब्बू और श्रिया सरन नजर आए। कहानी की आत्मा को बरकरार रखते हुए निशिकांत ने इसे हिंदी दर्शकों के लिए इस तरह रूपांतरित किया कि यह अपने आप में एक अलग पहचान बनाने में सफल रही।
‘दृश्यम’ से पहले उन्होंने 2011 में ‘फोर्स’ का निर्देशन किया था, जो तमिल निर्देशक गौतम वासुदेव मेनन की चर्चित फिल्म ‘काखा काखा’ का हिंदी रीमेक थी। जॉन अब्राहम और जेनेलिया डिसूजा अभिनीत इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता हासिल की और विद्युत जामवाल को भी बड़ी पहचान दिलाई।
इसके बाद 2016 में आई ‘रॉकी हैंडसम’ भी एक आधिकारिक रूपांतरण थी। यह दक्षिण कोरियाई एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘द मैन फ्रॉम नोवेयर’ पर आधारित थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म में निशिकांत ने निर्देशन के साथ-साथ खलनायक की भूमिका भी निभाई थी। वह एक अच्छे अभिनेता भी थे और अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े प्रशंसक थे। रॉकी हैंडसम के अलावा उन्होंने ‘404: एरर नॉट फाउंड’, ‘डैडी’, ‘जूली 2’, ‘भावेश जोशी सुपरहीरो’ में उन्होंने अपने अभिनय से गहरी छाप छोड़ी।
अमिताभ बच्चन के बड़े प्रशंसक होने के नाते उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश थी कि वह एक फिल्म में उन्हें डायरेक्ट करें। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। महज 50 की उम्र में वह 17 अगस्त 2020 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनके निधन का कारण लिवर सिरोसिस बताया गया।

