Home साइंस-टेक NavIC को बड़ा झटका, एक और सैटेलाइट की ‘एटॉमिक क्लॉक’ हुई खराब,...

NavIC को बड़ा झटका, एक और सैटेलाइट की ‘एटॉमिक क्लॉक’ हुई खराब, भारत के अपने GPS के लिए क्यों हैं महत्वपूर्ण?

सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम में एटॉमिक क्लॉक बेहद अहम भूमिका निभाता है। इसी की मदद से उपग्रह सिग्नल के यात्रा समय को बेहद सटीकता से मापते हैं और किसी स्थान की लोकेशन तय करते हैं।

0
NavIC satellite loses its atomic clock
एआई द्वारा निर्मित प्रतिकात्मक तस्वीर।

भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली नैविक (NavIC) को एक और तकनीकी झटका लगा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया कि उसके एक प्रमुख उपग्रह के एटॉमिक क्लॉक के बंद हो जाने से उस उपग्रह से मिलने वाला लोकेशन डेटा प्रभावित हो गया है। इससे भारत की अपने जीपीएस जैसी प्रणाली को मजबूत बनाने की कोशिशों पर असर पड़ सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, इसरो ने बताया कि मार्च 2016 में लॉन्च किया गया IRNSS-1F उपग्रह अपनी 10 वर्ष की निर्धारित मिशन अवधि पूरी कर चुका है। 13 मार्च 2026 को इस उपग्रह में लगा एटॉमिक क्लॉक काम करना बंद कर गया। हालांकि, यह सैटेलाइट पूरी तरह बेकार नहीं हुआ है। यह अंतरिक्ष में घूमता रहेगा और ‘वन-वे ब्रॉडकास्ट मैसेजिंग’ जैसे कि आपदा चेतावनी जैसी सेवाओं के लिए काम करता रहेगा, लेकिन नेविगेशन के लिए इसका इस्तेमाल अब संभव नहीं होगा।

एटॉमिक क्लॉक क्यों जरूरी है, IRNSS या NavIC क्या है?

सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम में एटॉमिक क्लॉक बेहद अहम भूमिका निभाता है। इसी की मदद से उपग्रह सिग्नल के यात्रा समय को बेहद सटीकता से मापते हैं और किसी स्थान की लोकेशन तय करते हैं। यह तकनीक वाहनों की नेविगेशन, मैपिंग, सर्वेक्षण और बड़े निर्माण प्रोजेक्ट की योजना बनाने जैसे कई कामों में इस्तेमाल होती है।

भारत की क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS), जिसे संचालन के स्तर पर नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टिलेशन (NavIC) कहा जाता है, सात उपग्रहों का एक नेटवर्क है। इसे भारत और उसके आसपास लगभग 1500 किलोमीटर तक सटीक लोकेशन जानकारी देने के लिए तैयार किया गया था।

यह प्रणाली अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) की तरह काम करती है, लेकिन भारत के ऊपर सीधे स्थित उपग्रहों के कारण यहां अधिक सटीक सिग्नल देने के लिए डिजाइन की गई है। इससे पहाड़ी, घाटी या घने जंगल वाले इलाकों में भी बेहतर सिग्नल मिलने की उम्मीद रहती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के बाद तक इस प्रणाली में पांच उपग्रह लोकेशन डेटा दे रहे थे- IRNSS-1B, IRNSS-1C, IRNSS-1F, IRNSS-1I और नई पीढ़ी का NVS-01। अब IRNSS-1F का एटॉमिक क्लॉक बंद होने से यह संख्या और कम हो गई है। इसके अलावा शुरुआती उपग्रहों में लगे एटॉमिक क्लॉक पहले भी समय से पहले खराब होते रहे हैं। IRNSS-1A लगभग निष्क्रिय हो चुका है, जबकि 1B और 1C भी अपनी निर्धारित आयु पार कर चुके हैं।

नई पीढ़ी के उपग्रहों से उम्मीदें थीं, लेकिन NVS-02 भी पूरी तरह सफल नहीं हो सका। इसे जनवरी 2025 में GSLV-F15 से लॉन्च किया गया था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण यह अपनी अंतिम कक्षा में नहीं पहुंच पाया। जांच में सामने आया कि इंजन को सक्रिय करने वाला सिग्नल पायरो वाल्व तक नहीं पहुंचा, जिससे इंजन चालू ही नहीं हो सका।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछली विफलताओं से सीखते हुए इसरो ने अब अपनी रणनीति बदल दी है और अब विदेशी घड़ियों के बजाय खुद की विकसित की हुई स्वदेशी परमाणु घड़ियों का इस्तेमाल कर रहा है। नए सैटेलाइट्स में ‘L1’ फ्रीक्वेंसी जोड़ी गई है जो जीपीएस के साथ आसानी से तालमेल बिठाती है और स्मार्टवॉच जैसे छोटे उपकरणों के लिए बहुत उपयोगी साबित हो रही है। साथ ही, अब नए सैटेलाइट्स को 12 साल के लंबे मिशन जीवन के साथ अंतरिक्ष में भेजा जा रहा है।

मौजूदा दौर में दुनिया में केवल चार प्रमुख वैश्विक प्रणालियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें अमेरिका का GPS, रूस का GLONASS, यूरोप का Galileo और चीन का Beidou शामिल हैं। इनके अलावा जापान और भारत के पास अपने खुद के क्षेत्रीय सिस्टम मौजूद हैं जो विशिष्ट क्षेत्रों को कवर करते हैं।

author avatar
अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version