थोड़ी देर इंतजार के बाद ही मेरा नंबर आ गया। डॉक्टर रविन्द्र जी हमारे पुराने परिचित हैं सो ज्यादा लाइन में नहीं लगना पड़ता। मूलतः पंजाब के हैं पर लंबे समय से यहीं पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मुझे बिठाया और पूछा कि कैसे आना हुआ ? मैंने कहा “आजकल गैस खूब बनती है, पेट भारी भारी रहता है, सिर भी दुखता है।” डॉक्टर साहब बोले “हाँ पेट भी काफी बाहर आ गया है।”
आगे बोले “आज से पैंतीस चालीस साल पहले जब मैं नया नया यहाँ आया था तब मोटे आदमी बहुत कम होते थे सभी बड़े लंबे चौड़े और फिट हुआ करते थे।”
“मुझे तो लगता है इस गेहूँ ने तुम्हारा खूब कबाड़ा कर दिया है। कीटनाशक वाली गेहूँ खाकर हमारा पंजाब तो बीमार ही हो गया। हमारे वहाँ से बीकानेर को एक ट्रेन चलती है उसका नाम ही “कैंसर ट्रेन” पड़ गया। कारण ये कि उसमें अधिकतर कैंसर के रोगी ही होते हैं। अब ये बीमारी तुम्हारे थार में भी आ गई। यहाँ लोग शुद्ध बाजरे की रोटी खाते थे और बड़े स्वस्थ रहते थे। कभी कभार कोई मेहमान आ जाए तब ही गेहूँ की रोटी बनती थी। बच्चे खूब माला फेरते थे कि कब कोई मेहमान आए और हमें “फाफरा” खाने को मिले। पर जब से मुफ्त राशन में सरकारों ने गेहूँ बांटना शुरू किया तब से ही मारवाड़ की सेहत खराब हो गई। पहले यहाँ कैंसर के रोगी नगण्य से थे, अब ये आम हो गया है।”
मैं तो क्या ही वार्ता का क्रम आगे बढ़ाता। शर्मिंदगी के मारे इधर उधर देख ही सकता था। डॉक्टर साहब ने कुछ दवाई लिखी, खान पान सुधारने और वर्जिश करने का कहकर मुझे विदा किया।
घर आकर डॉक्टर साहब की बात पर ही विचार करने लगा। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान जयपुर में रहना हो या काम धंधे की तलाश में देश के दूसरे हिस्सों में जाना हो, जब भी किसी ने पूछा कि आपका फेवरेट ब्रेकफास्ट क्या है? तो बिना कुछ सोचे एक ही जवाब आता था “बाजरे की रोटी, दही और माखन।” रात वाली ठंडी रोटी, उसके ऊपर मक्खन डाल देते थे, थोड़ी सी लाल मिर्च की चटनी। फिर दही से लगा लगाकर खाते थे। सबकुछ घर का। एकदम ऑर्गेनिक। बरसों बरस यही रहा था थार का झारा। नाश्ते को यहां “झारो” या “जाखल” कहते हैं।
फाइबर, आयरन और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों से भरी हुई बाजरे की रोटी ने सदियों से थार के बाशिंदों को मजबूत और तंदुरुस्त रखा हैं। अंग्रेजी में इसे ‘पर्ल मिलेट’ कहते हैं। यहाँ की शुद्ध बाजरी बड़ी मीठी होती है। अनेक रासायनिक खाद मिला देने पर वह स्वाद नहीं रहता है।
इतने में काकोसा आ गए तो बाजरी की ही चर्चा आगे चल पड़ी। उन्होंने कहा कि “उस समय तो अमूमन सभी घरों में और आज भी कई जगह तीनों समय बाजरी की रोटी ही खाते थे। छाछ राबड़ी या कोई भी सुखी सब्जी या कढ़ी/खाटियों के साथ रोटी खा ली जाती है। शहरों में जरूर सर्दी के मौसम में ही बाजरी खाते हैं जबकि ग्रामीण इलाकों में बारह महीने बड़े चाव से इसे खाते हैं। कुछ मीठा खाने का मन हुआ तो गरमा गर्म बाजरी की रोटी को चूरकर उसमें देसी घी और गुड़ मिलाकर बहुत ही स्वादिष्ट चूरमे के लड्डू बना लिए जाते। अपने यहाँ का बड़ा ही प्रसिद्ध “खीच” जो कि बाजरी को ओखली में दरदरा कूट कर और फिर उसे भूनकर बनाया जाता है। इसके बाद घी के साथ गरम गरम खाया जाता है। खीच ठंडा हो जाए तो दही और छाछ के साथ भी खाते हैं।

यहाँ की “राब और राबड़ी” भी ग्रामीण परिवेश में उतनी ही लोकप्रिय है। इसे बाजरी के आटे में छाछ और नमक डालकर बनाते है। इसे ठंडा ही पिया जाता है। बहुत ही स्वाद और पोषण से भरपूर। सर्दियों में बाजरी के आटे से ही गरम राबड़ी भी बनती है।
इस गोल गोल बाजरी के दानों के चारों ओर ही जैसे थार का जीवन चक्र घूमता है। इसका जीवन में इतना असर है कि इस पर कहावतें भी है कि
“जिके री खाओ बाजरी, ऊ ए री बजाओ हाजरी”
अर्थात् जिसकी बाजरी खाई है या जो तनख्वाह देता है उसकी हाजरी में रहना।”
आगे कहते हैं कि “आजकल ट्यूबवेल होने लगे है फिर भी मोटे तौर पर थार में खेती के लिए बारिश पर ही निर्भरता है। अतः वर्षा ऋतु में ही बाजरे की बुवाई होती है।”
“ये खरीफ की फसल है। ढाई तीन महीने में तैयार हो जाती है।
सबसे पहले खेत साफ करते है इसे “सूड़” करना कहते है। फिर बुवाई होती है,पहले ऊंट या बैल काम में आते थे किन्तु आजकल ट्रैक्टर आ गए हैं। फिर खरपतवार को काटने हेतु “नेदान” किया जाता है और अंत में कटाई। कटाई के वक्त भी पैसे देकर मजदूर नहीं लाने पड़ते थे। थार के सहयोगी जीवन का ये बेहतरीन उदाहरण है। इसमें गांव के ही लोग जिसके यहाँ फसल कटनी है सुबह ही पहुंच जाते और एक साथ गीत गाते हुए शाम तक सारी फसल काट लेते थे। खेत के मालिक को बस इनके अच्छे खाने का इंतजाम करना होता था। इसे “ल्हास” बोलते है। अब जरूर इन चीजों में कमी आ गई है।”
दो तीन बारिश ठीक से हो जाए तो साल भर खाने लायक अन्न हो जाता है साथ ही फसल को मंडी में बेचकर कुछ मुनाफा भी हो जाता है। बाजरी की फसल सूखे, मिट्टी की कम उर्वरता और अधिकतम तापमान के अनुसार खुद को अनुकूल बना लेती है। यह कम बारिशों वाले स्थान पर उगती है जहां पर 50-70 सेमी तक बारिश होती है। यह सूखे के अनुकूल फसल है । यहां के लोगों की तरह ही बाजरी की फसल मौसम की विपरीत स्थितियों में बनी रहती है।
बाड़मेर में बाजरे का उत्पादन राजस्थान में सर्वाधिक होता है, जहां प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख मीट्रिक टन बाजरा पैदा होता है। यह उत्पादन लगभग 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होता है। बाड़मेर बाजरे के उत्पादन और क्षेत्रफल दोनों ही मामलों में राजस्थान और देश में अग्रणी है।
बाजरी का जो तना होता है उससे पशुओं के लिए बड़ा पौष्टिक चारा मिल जाता है। स्थानीय भाषा में इसे “डोका” कहते है और इसके चारे को “कुत्तर” ।
काकोसा ने यहाँ के निवासियों की भलेपन की बात बताई कि ” “अकाल यहां खूब पड़ते रहे है। ऐसे समय में किसानों का यही मनोभाव रहता है कि बाजरी चाहे कम भी हो जाए पर गायों के खाने लायक चारा जरूर हो जाए। हम तो फिर भी इधर उधर कमाकर खा लेंगे पर ये पशु बेचारे कहाँ जायेंगे।”
अब तो काफी जगह पक्के मकान हो गए फिर भी मारवाड़ के गांवों में हर घर में एक दो कच्चे झोंपड़े दिखाई दे ही जायेंगे। इनको बनाने में बाजरी के डोके का ही उपयोग करते थे।”
मैंने भी अपनी बात जोड़ी कि “मुझे अब भी याद आता है कि कितने चाव से पौंख खाया करते थे।” बाजरी की फसल जब लगभग पकने को ही होती थी तब उसके सिरटे तोड़कर उसे सेंकते थे। फिर जैसे मक्के को खाते है ठीक वैसे ही खाते थे। मक्के को देखकर मुझे बड़ी ईर्ष्या भी होती है कि मेरा बाजरा भी ठीक वैसा ही पर इसकी मक्के जैसी कदर कहाँ? मक्का आज कॉर्न हो गया है, कॉर्न फ्लेक्स, पॉप कॉर्न, क्रिस्पी कॉर्न, कॉर्न पफ, बेबी कॉर्न और भी सैकड़ों खाने पीने और औद्योगिक उपयोग की चीजें बनती है। मक्का मक्के दी रोटी और सरसों दा साग से कितना आगे निकला गया जबकि हमारी बाजरी आज भी रोटी तक ही सीमित रह गई।

कुछ साल पहले भारत में “मिलेट ईयर” मनाया गया था मोटे अनाज को बढ़ावा देने हेतु। देश विदेश से आए मेहमानों को भी बाजरे और अन्य मोटे अनाजों से बने व्यंजन परोसे गए थे। बाजरे से बने बिस्किट और केक भी बने थे। एक उम्मीद जगी थी कि बाजरी के भी दिन फिरेंगे और इसका भी बड़े शहरों में बोलबाला होगा। पर अब तक ऐसा कुछ नज़र नहीं आता।
हालांकि बाड़मेर के गुड़ामालानी में एक बाजरा अनुसंधान केंद्र स्थापित किया गया है, जो भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान (IIMR) के अधीन है। यह भारत का पहला क्षेत्रीय बाजरा अनुसंधान केंद्र है,जिसकी स्थापना 2023 में की गई थी।
बातों ही बातों में पता ही नहीं चला कब दिन चढ़ आया। खाने का बुलावा आया। हम दोनों घर गए। सामने थाली में बाजरी की रोटी चूरी हुई और हरे प्याज़ की सब्जी थी। पार्श्व में जैसे हिंदी के महान साहित्यकार अज्ञेय जी की कविता ‘कलगी बाजरे की’ सुनाई देने लगी :–
…कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है
मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के, तुम हो, निकट हो, इसी जादू के
निजी किस सहज गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूँ-
अगर मैं यह कहूँ-
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरे बाजरे की?

