“रखा हुआ सोना अगर जरूरत पर काम नहीं आएगा तो यह कैसा धन है…।” मनोज बाजपेयी की आने वाली फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के ट्रेलर में बोला गया यह संवाद सिर्फ एक सिनेमाई लाइन नहीं है। यह उस दौर की असली बेचैनी का सार है, जब भारत आर्थिक रूप से लगभग टूट चुका था और देश को बचाने के लिए सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को अपने स्वर्ण भंडार तक गिरवी रखने पड़े थे।
फिल्म का ट्रेलर 1990-91 के उस संकट की याद दिलाता है, जब देश के सामने सवाल सिर्फ महंगाई या मंदी का नहीं था, बल्कि यह था कि क्या भारत दुनिया के सामने खुद को दिवालिया घोषित करने जा रहा है?
ट्रेलर में सड़कों पर गुस्सा, राशन और महंगाई से जूझती जनता, राजनीतिक अस्थिरता और बंद कमरों में लिए जा रहे कठिन फैसलों को दिखाया गया है। मनोज बाजपेयी एक ऐसे गवर्नर की भूमिका में दिखाई देते हैं जो देश को आर्थिक बर्बादी से बचाने की कोशिश कर रहा है।
उनका एक संवाद आता है, “कुर्सी पर दीमक लग जाएगा तो दूसरा कुर्सी आ जाएगा, देश कहां से आएगा सर।” यह संवाद उस समय की राजनीति और देश के मौजूदा हालात के टकराव को सामने रखता है। ट्रेलर में लिखा आता है कि यह कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है। तो आइए समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाते हैं और जानते हैं कि आखिर भारत उस ऐतिहासिक मोड़ तक पहुंचा कैसे?
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आखिर भारत उस मोड़ तक पहुंचा कैसे?
1990 के अंत और 1991 की शुरुआत में भारत की आर्थिक हालत बेहद खराब हो चुकी थी। देश का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर सिर्फ 1.2 अरब डॉलर रह गया था। यह रकम इतनी कम थी कि भारत इससे केवल दो हफ्तों तक जरूरी सामान, जैसे कच्चा तेल और दवाइयां, आयात कर सकता था।
अगर विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खत्म हो जाता, तो भारत अंतरराष्ट्रीय भुगतान करने में असमर्थ हो जाता। इसका मतलब होता कि दुनिया भारत को एक “डिफॉल्टर” देश मान लेती। ऐसे में न तो कोई देश उधार देता और न ही जरूरी सामान बेचता।
यह संकट अचानक नहीं आया था। इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण थे। उस समय इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला कर दिया था, जिससे खाड़ी युद्ध शुरू हो गया। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और भारत का आयात बिल बेकाबू हो गया।
उधर, कुवैत और इराक में काम करने वाले लाखों भारतीयों की वापसी के कारण विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत अचानक कमजोर पड़ गया। इसी दौरान सोवियत संघ, जो भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार था, टूटने की कगार पर पहुंच गया। भारत का निर्यात प्रभावित हुआ और डॉलर की कमी और बढ़ गई।
घरेलू स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था लाइसेंस राज और सरकारी नियंत्रणों में जकड़ी हुई थी। विदेशी निवेश सीमित था, उद्योगों पर भारी नियंत्रण था और सरकार का खर्च उसकी आय से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था।
जब आरबीआई ने सोना गिरवी रखने का फैसला लिया
फिल्म ‘गवर्नर’ संभवतः तत्कालीन आरबीआई गवर्नर एस, वेंकेटरमणन और उस दौर में रिजर्व बैंक की भूमिका से प्रेरित है। ट्रेलर में मनोज बाजपेयी का संवाद, “रखा हुआ सोना अगर जरूरत पर काम नहीं आएगा तो यह कैसा धन है,” दरअसल 1991 के उस वास्तविक संकट की ओर इशारा करता है, जब भारत के सामने कोई आसान विकल्प नहीं बचा था।
इस पूरे घटनाक्रम की तत्कालीन आरबीआई डिप्टी गवर्नर सी. रंगराजन ने मार्च 2016 के एक लेख में विस्तार से चर्चा की थी। वे लिखते हैं कि 1990 के अंत तक भारत की भुगतान संतुलन की स्थिति तेजी से बिगड़ चुकी थी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान तथा विदेशी बैंक भारत को अतिरिक्त मदद देने से हिचक रहे थे।
रंगराजन के अनुसार, उस समय आरबीआई गवर्नर एस. वेंकटरमणन लगातार बाजार के प्रमुख खिलाड़ियों से बातचीत कर रहे थे। हर तरफ एक ही सवाल पूछा जा रहा था कि जब भारत के पास इतना बड़ा स्वर्ण भंडार है, तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा?
आरबीआई के भीतर भी यह चर्चा शुरू हो चुकी थी कि विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए सोने का इस्तेमाल करना पड़ेगा। लेकिन यह फैसला आसान नहीं था। भारत जैसे देश में सोना सिर्फ आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व भी रखता है।
रंगराजन के मुताबिक सबसे पहले सोने का बाजार मूल्य तय किया गया। फिर आरबीआई अधिनियम 1934 के प्रावधानों के तहत विदेशी मुद्रा जुटाने की कानूनी प्रक्रिया तैयार की गई। इसके बाद सरकार ने पहले 20 टन सोना बेचने का फैसला किया, लेकिन उससे मिली रकम संकट से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
तब सरकार और आरबीआई ने विदेशी बैंकों के पास सोना गिरवी रखने का रास्ता चुना। रंगराजन लिखते हैं कि बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान उन गिने-चुने संस्थानों में थे जो भारत की मदद के लिए तैयार हुए।
इस पूरे ऑपरेशन को बेहद गोपनीय रखा गया। सोने को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढाला गया, पैक किया गया और विशेष सुरक्षा के बीच विदेश भेजा गया। जुलाई 1991 में लगभग 46.91 टन सोना चार किश्तों में विदेश भेजा गया, जिसके बदले भारत को करीब 405 मिलियन डॉलर का ऋण मिला।
रंगराजन लिखते हैं कि, यह सिर्फ आर्थिक फैसला नहीं था, बल्कि भारत के लिए एक मनोवैज्ञानिक झटका भी था। देश को पहली बार एहसास हुआ कि आर्थिक संकट कितना गंभीर हो सकता है।
उन्होंने अपने लेख में लिखा था कि सोना गिरवी रखने की घटना ने भारत को आर्थिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया। उसी के बाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों का रास्ता खुला, जिसने आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी।
फिर कैसे बदली भारत की किस्मत?
सोना गिरवी रखने के बाद भारत को तत्काल राहत मिली और देश डिफॉल्ट होने से बच गया। लेकिन यह केवल अस्थायी समाधान था। असली बदलाव तब आया जब उसी साल आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई।
91 में जब पीवी नरसिम्हा राव की सरकार बनी तो मनमोहन सिंह वित्तमंत्री बने। सिंह ने आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार के लिए खोलने का फैसला लिया। लाइसेंस राज में ढील दी गई, विदेशी निवेश को अनुमति मिली और निजी क्षेत्र के लिए नए रास्ते खुले। यही वह मोड़ था जिसने आने वाले दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी।
आज स्थिति पूरी तरह अलग है। भारत के पास सैकड़ों अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और आरबीआई के स्वर्ण भंडार भी लगातार बढ़े हैं। आरबीआई के पास आज कुल 880.52 मीट्रिक टन सोने का भंडार है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय सोने के इस भंडार की कुल वैल्यू लगभग 113.5 अरब डॉलर (करीब 9.4 लाख करोड़ रुपये) है।
बहरहाल ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ फिल्म की बात करें तो इसमें मनोज वाजपेयी के साथ अभिनेत्री अदा शर्मा भी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म की कहानी और पटकथा सुवेंदु भट्टाचार्य, सौरभ भारत, रवि असरानी और निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह ने मिलकर तैयार की है। फिल्म के सह-निर्माता आशिन ए. शाह हैं।
फिल्म का संगीत भी इसकी बड़ी खासियत माना जा रहा है। दिग्गज गीतकार जावेद अख्तर के लिखे गीतों को संगीतकार अमित त्रिवेदी ने अपनी धुनों से सजाया है। ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ 12 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

