‘अब लग रहा है कि मैं घर आया हूं।’ मेरे लिए इम्तियाज़ अली की फ़िल्म “मैं वापस आऊंगा” इसी एक वाक्य से खुलती है। मैं इम्तियाज़ के शहर जमशेदपुर के थिएटर में बैठकर यह पंक्ति सुनता हूं। तंज़, खीज, हताशा और ऊब में निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) की कही यह बात पूरे समय तक मेरे दिमाग़ में पेपरवेट की तरह धरी रह जाती है और किसी और सिरे में जाने ही नहीं देती। फिल्म देखकर बाहर जब इम्तियाज़ के पुराने अड्डे “मसाला कोक” के आगे खड़ा होता हूं तो ख़ुद से दोहराता हूं- ‘घर बहुत बड़ी चीज़ है, सचमुच बहुत बड़ी चीज़।’
फ़िल्म में निर्वैर जिस ग्रेवाल परिवार से आते हैं वो एक अविभाजित घर है जिसका सिरा तीन पीढ़ियों को छूता है- एक तो निर्वैर ख़ुद, दूसरे उसके पिता इक़बाल ग्रेवाल और तीसरे उनके पिता ईश्वर सिंह( नसीरउद्दीन शाह) जो अपने इश्क़िया पहचान में कीनू हैं और जिनका अपने प्रेम ज़िया( शरवरी वाग ) से वादा है कि वो एक दिन ज़रूर वापस आएगा और पूरी फ़िल्म इसी एक वादे के इर्द-गिर्द घूमती है, आगे बढ़ती है और एक ऊंचाई पर जाकर हम दर्शकों के भीतर प्रभाव पैदा कर जाती है।
निर्वैर का घर अविभाजित है लेकिन घर में रहनेवाले लोगों का मन बुरी तरह बंटा हुआ है, विभाजित है। यह विभाजन इतना गहरा है कि लंदन से निर्वैर जब इस घर में दाख़िल होता है, अपने पिता और मां के बीच होता है तो घर का एक विलोम नज़र आने लगता है। घर का विलोम क्या हो सकता है? बेदख़ल, निर्वासित, दहशत, हताशा, बेचैनी? यह घर किसी दूसरे एनआरआई की तरह निर्वैर को नॉस्टैल्जिया में नहीं ले जाता और न ही भीतर ऐसा भाव पैदा करता है कि वो बॉर्डर फ़िल्म का गाना गुनगुनाने लगे- कि घर कब आओगे? निर्वैर घर आकर भी सुकून महसूस नहीं करता, आपसी रिश्तों में वो गर्माहट नहीं पाता जिससे कि नक़्शे पर बना एक अविभाजित मकान घर की शक़्ल में नज़र आए।
इन सबके बीच, इसी घर में एक अटका हुआ मन है। इश्क़ में बेइंतहां डूबा कीनू का मन, ईश्वर सिंह का मन। अस्पताल में पड़े उस मरीज़ का मन जिसकी कलाई पर हॉस्पिटल के टैग के बदले, गुदवाए हर्फ़ हमें भीतर तक तर कर जाते हैं। निर्वैर के दादू का मन। एक मन जो कि नक़्शे पर एक मुल्क़ के दो हिस्से हो जाने पर इस बात को रजिस्टर ही नहीं कर पाता कि अब पहले की तरह इस पार से उस पार बिना किसी रोक-टोक के नहीं जाया जा सकता। उस पार यानी ईश्वर सिंह का बचपन, जवानी, प्यार और वहां की मिट्टी पर खड़े होकर किया गया वादा कि वो एक दिन वापस आएगा। एक वादा किसी इंसान की ज़िंदगी का सबसे ज़रूरी, अधूरा काम हो सकता है जिसे कि पूरा करने के लिए वो डेथ बेड पर पड़े-पड़े बेचैन हो सकता है- एक ज़रा सा सेम पेज़ पर न होने की हालत में चट से ब्लॉक कर देने और पट से ओके, सॉरी, बाय कहकर एक ही शहर में रहते हुए किसी करप्ट फाईल की तरह डम्प हो जाने या कर दिए जाने के दौर में ये बात पहले तो हमें पुराने ज़माने का एक सधुआया हुआ मन लगता है और हम इस पर ये लेबल चस्पां कर ही रहे होते हैं कि निर्वैर अपने दादू की इस बेचैनी के भीतर से एक थेरेपी खोजने की कोशिश करने के लिए उद्यत हो जाता है और देखते ही देखते उसमें इतना रम जाता है कि हम इस गहरे यकीं से भर जाते हैं कि घर हो या मुल्क़, एक इंसान के तौर पर इसके भीतर जीने का एक ही रास्ता है और हो सकता है- प्रेम।

निर्वैर की इस कोशिश के बीच फ़िल्म में मलिक मोहम्मद जायसी की लिखी पंक्ति “छार उठाय लीन्ह एक मूँठी, दीन्ह उड़ाइ पिरथिमी झूठी” हवा के झोंके सी शामिल मालूम पड़ती है और अलग-अलग दृश्यों और मनोवेगों के साथ इस समझ को मजबूत करती है कि इस पृथ्वी पर जिसे प्यार नहीं मिला, वो अलाउद्दीन ख़िलजी की तरह अभागा है। शासक होते हुए भी निरीह, साधन होते हुए भी सबसे असहाय।
और तब हम समझ पाते हैं कि क्यों ग्रेवाल परिवार का घर नक़्शे पर अभिवाजित होते हुए घर के एक-एक सदस्य बंटा हुआ, विभाजित, निर्वासित, आज की शब्दावली में कहें तो ‘लेफ़्टआउट’ महसूस करता है और जिस ईश्वर सिंह की आंख के आगे नक़्शे पर मुल्क़ बंट गया, मन से अभी भी वो अविभाजित है। घर में, अस्पताल तक में इग्नोर किए जाने के बावज़ूद ख़ुद को निर्वासित, लेफ़्टआउट महसूस नहीं करता। अपने दादू की इस बेचैनी को थेरेपी की दिशा में ले जाने की कोशिश करता निर्वैर महज उनकी सेहत को दुरुस्त करने की दिशा में नहीं बढ़ता नज़र आता है बल्कि उसकी इस कोशिश से विभाजित मन का उसके माता-पिता का घर भी धीरे-धीरे अविभाजित, संगम घर की शक़्ल लेता नज़र आने लगता है। एक ऐसा घर जिसमें आपसी असहमति, सोचने और जीन के अलग-अलग तरीक़े के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता तो है ही, असहमति को अपना लिए जाने की संभावना भी है और यहीं पर आकर यह फ़िल्म तीन पीढ़ियों से जुड़कर एक पीढ़ी का दूसरे पीढ़ी से अलगाव के बजाय एक-दूसरे की एक्सटेंशन नज़र आने लग जाती है। जहां पुनर्जन्म की मान्यता के स्वीकार-अस्वीकार की बहस से अलग एक समझ बनती हुई जान पड़ती है कि अतीत का दंश, ज़रूरी नहीं कि वर्तमान में दंश बनकर डेथबेड तक चिपका रह जाय, आगे की पीढ़ी उस दंश को यदि साझेपन के साथ सुनती है, जानना चाहती है और प्रेम की अनुपस्थिति-उपस्थिति का ठीक-ठीक आकलन कर पाती है तो अतीत थेरेपी का काम करने लग जाती है।
अतीत का इससे सुंदर उपयोग भला और क्या हो सकता है, जहां तीन अलग-अलग पीढ़ी के लोगों के लिए एक ही कविता की पंक्तियां स्कूल की एसेम्बली गीत सी दोहरायी जा सके-
“किसी और ने नहीं नहीं,
मैंने ही तोड़ दिया है कभी कभी
अपने को झूठे वादे की तरह
यह जानते हुए भी कि बार बार
लौटना है मुझे
प्रेम की तरफ़
विश्वास बनाये रखना मनुष्य में
सिद्ध करते रहना है
कि मैं टूटा नहीं
चाहे कविता बराबर ही
जुड़े रहना है किसी तरह सबसे।“
कुंवर नारायण
अपने बचपन-जवानी और प्रेम-शहर सरगोधा (अब पाकिस्तान में) की तलाश, जाने की कामना, अधूरे वादे निभाने की तड़प ये सबकुछ एक बुज़ुर्ग के लिए झक्कीपन न होकर, एक पीढ़ी लांघकर उसके पोते और उसके दोस्तो के लिए एक मिशन हो सकता है। इसकी स्वीकार्यता अभी हमारे बीच न के बराबर है। अव्वल तो इस भाव की साझेदारी ही मुश्किल है और ग़र हिम्मत और उम्मीद से बुज़ुर्ग कर भी दे तो इसका रिज़ेक्शन एक झटके में हो जाएगा। हम अपने आसपास, अपने ही लोगों के बीच बुज़ुर्गों को सारे साधन होने के बीच समय पर खाना और ज़रूरत की दवाईयों के लिए निरीह आंखों से निहारते देखते आए हैं, ऐसे में यह भाव कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे भारी अकाल और अभावग्रस्त मेरीगंज जहां स्त्रियों के कपड़े तार-तार हों, उनके बीच लच्छमी दासी का हारमोनियम की कवर के लिए कपड़े की मांग रखना(मैला आंचलः फणीश्वरनाथ रेणु)…लेकिन एक बार निर्वैर जैसी औलाद इसे रजिस्टर कर ले और इस कोशिश में लग जाय तो हम एक-एक करके बेहतर ढंग से समझने लग जाते हैं कि हाड-मांस के एक मनुष्य के होने में कविता का, दोस्ती और प्रेम का, कला का, किए गए वादों का, लिखे गए शब्दों और गाए गए गीतों के क्या मायने हो सकते हैं !

इन सबके जीवन से विस्मृत होते चले जाने के बीच आज की तकनीक और हाई स्पीड इंटरनेट जिन्हें कि हमने रील देखने-बनाने और फिर जमकर कोसने तक महदूद कर दिया है, कि क्या भूमिका हो सकती है ! ये फ़िल्म उसकी महत्तम सर्जनात्मक का उपयोग करती है और इस एक कोशिश से हम वो सबकुछ और क्या-क्या बचा सकते हैं जिनके ठिकाने लगाने की शर्त पर हमने जो जुटाया और जिनसे हमारा जीवन एक समृद्ध कबाड़ में तब्दील हो गया है।
विभाजन का दंश हम सबके भीतर किसी न किसी रूप में धंसा है, लेकिन असल सवाल है कि उस दंश का हम करते क्या हैं? और किया क्या जाना चाहिए? और इसकी शुरुआत कैसे और कहां से हो…इन सारे सवालों के जवाब के लिए “मैं वापस आऊंगा” गहरी टीस और हताशा के बीच की बची हुई संभावना की तलाश है। जाहिर है, ये तलाश वायवीय समाज के बीच से कहीं ज़्यादा हमारे भीतर है, हर उस मन के भीतर जो अपने-अपने अविभाजित घरों में रहते हुए भी बंटता चला गया है और उन घरों में अटका एक अविभाजित मन है जिसका होना, जिसे समझा जाना…अतीत के माध्यम से वर्तमान की रगड़ को कम करना और भविष्य में उस दंश को पास ऑन होने नहीं देना है।
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