तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म पर दिए गए बयान से जुड़े मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट को न तो घृणा भाषण कहा जा सकता है और न ही उससे किसी समुदाय के खिलाफ वैमनस्य फैलाने का इरादा साबित होता है। जस्टिस श्रीमथी ने कहा कि उदयनिधि स्टालिन का ‘सनातन धर्म के उन्मूलन’ का आह्वान ही वास्तविक विवाद की जड़ है।
यह मामला 2 सितंबर 2023 का है, जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन उन्मूलन सम्मेलन में दिए अपने भाषण में सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोविड जैसी बीमारियों से की थी। उन्होंने तमिल भाषा में कहा था कि कुछ चीजों का केवल विरोध नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें खत्म किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने सनातन ओझिप्पु शब्द का इस्तेमाल किया, जिसका अर्थ उन्मूलन या समाप्त करना बताया गया।
इस भाषण का वीडियो भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किया और सवाल उठाया कि क्या यह बयान भारत की करीब 80 प्रतिशत आबादी के खिलाफ हिंसा या नरसंहार का आह्वान नहीं है, जो खुद को सनातन धर्म से जुड़ा मानती है। इसके बाद मालवीय के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई और उन पर आईपीसी की धारा 153ए और 505 के तहत मामला दर्ज हुआ। आरोप था कि उन्होंने मंत्री के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और इससे समुदायों के बीच वैमनस्य फैलने की आशंका पैदा हुई।
ओझिप्पु शब्द और अदालत की टिप्पणी
मालवीय ने इस एफआईआर को रद्द करने के लिए अदालत का रुख किया था। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस श्रीमथी ने कहा कि पूरा अभियोजन उदयनिधि स्टालिन द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘ओझिप्पु’ शब्द के अर्थ पर टिका हुआ है। अदालत ने नोट किया कि राज्य सरकार भी इस शब्द का अर्थ ‘एबॉलिश’ यानी समाप्त करना ही मानती है। न्यायालय ने शब्दकोश और सामान्य अर्थों के आधार पर कहा कि एबॉलिश के समानार्थी शब्दों में खत्म करना, मिटा देना, नष्ट करना जैसे शब्द आते हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि जब इस तरह की भाषा किसी धर्म के संदर्भ में इस्तेमाल की जाती है, तो वह केवल विचारों तक सीमित नहीं रहती। कोर्ट के शब्दों में, “अगर कहा जाता है कि सनातन धर्म नहीं रहना चाहिए, तो इसका अर्थ यह भी निकलता है कि उसे मानने वाले लोग भी नहीं रहने चाहिए।” इसी आधार पर अदालत ने कहा कि मालवीय द्वारा उठाया गया सवाल स्वाभाविक था और उसे घृणा भाषण नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मालवीय की पोस्ट एक सवाल के रूप में थी, न कि किसी हिंसा या आंदोलन का आह्वान। उन्होंने किसी समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काने की कोशिश नहीं की। अदालत ने राज्य सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि मालवीय की पोस्ट से हिंदू बहुसंख्यक समुदाय को अन्य समूहों के खिलाफ उकसाया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए, तो यही बात मंत्री के बयान पर भी लागू होगी।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 153ए और 505 के तहत अपराध तभी बनता है, जब उसमें स्पष्ट मंशा हो और कम से कम दो पहचाने जा सकने वाले समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने की कोशिश की गई हो। इस मामले में ऐसी कोई मंशा या तत्व नहीं पाया गया।
इतिहास और महापुरुषों का गलत हवाला देने पर फटकार
कोर्ट ने राज्य की ओर से दिए गए उस तर्क को भी गलत ठहराया, जिसमें महात्मा गांधी, बुद्ध, रामानुजाचार्य और वल्लालार जैसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक व्यक्तियों को सनातन धर्म का विरोधी बताया गया था। अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा कि गांधी स्वयं को सनातनी हिंदू मानते थे, बुद्ध भारतीय दार्शनिक परंपरा से जुड़े थे और रामानुजाचार्य तो सनातन धर्म के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ई.वी. रामासामी उर्फ पेरियार को छोड़कर इनमें से किसी ने भी सनातन धर्म के खिलाफ बात नहीं की।
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि अक्सर घृणा भाषण देने वालों पर कार्रवाई नहीं होती, जबकि उस पर प्रतिक्रिया देने वालों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। साथ ही, जांच अधिकारी द्वारा हलफनामे में राजनीतिक रंग भरने पर भी नाराजगी जताई और कहा कि सरकारी अधिकारियों को निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक रहना चाहिए।
इन सभी कारणों के आधार पर हाईकोर्ट ने अमित मालवीय की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। मालवीय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत पद्मनाभन ने पैरवी की, जबकि तमिलनाडु सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अजमल खान और अधिवक्ता अब्दुल कलाम आजाद पेश हुए।

