Wednesday, April 8, 2026
Homeभारतसरकार ने इंडस्ट्री के लिए LPG आवंटन का तय किया नया फॉर्मूला,...

सरकार ने इंडस्ट्री के लिए LPG आवंटन का तय किया नया फॉर्मूला, जानें किसे दी गई प्राथमिकता?

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, नए प्रावधान के तहत फार्मा, फूड, पॉलीमर, कृषि, पैकेजिंग, पेंट, यूरेनियम, हैवी वाटर, स्टील, बीज, मेटल, सिरेमिक, फाउंड्री, फोर्जिंग, ग्लास और एयरोसोल जैसे उद्योगों को बल्क एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

नई दिल्लीः केंद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उद्योगों को बड़ी राहत देते हुए ‘बल्क एलपीजी’ (Bulk LPG) आवंटन की नई नीति को मंजूरी दे दी है। बुधवार को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा जारी इस नए फॉर्मूले का मुख्य उद्देश्य उन उद्योगों को प्राथमिकता देना है, जहां एलपीजी उत्पादन प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है और उसका कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है।

नई नीति के तहत फार्मा, फूड प्रोसेसिंग, कृषि, पॉलीमर, पैकेजिंग, पेंट, स्टील, ग्लास, सिरेमिक, फाउंड्री, फोर्जिंग और एयरोसोल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बल्क एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसके अलावा यूरेनियम, हैवी वाटर और बीज उत्पादन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को भी इस सूची में शामिल किया गया है।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन कारखानों में एलपीजी की जगह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल तकनीकी रूप से संभव नहीं है, उन्हें आवंटन में सबसे पहले वरीयता दी जाएगी।

जानें आवंटन की सीमा और शर्तें

मंत्रालय के मुताबिक, चिन्हित उद्योगों को मार्च 2026 से पहले की उनकी औसत खपत का 70 प्रतिशत एलपीजी कोटा आवंटित किया जाएगा। हालांकि, पूरे औद्योगिक क्षेत्र के लिए कुल आपूर्ति की सीमा 0.2 टीएमटी (हजार मीट्रिक टन) प्रति दिन निर्धारित की गई है।

बता दें कि इसका लाभा उठाने के लिए कंपनियों को तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के साथ पंजीकरण कराना होगा। साथ ही, उन्हें सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के पास पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) कनेक्शन के लिए आवेदन करना होगा। हालांकि, जहाँ एलपीजी का कोई विकल्प संभव नहीं है, वहां पीएनजी आवेदन की शर्त से छूट दी गई है।

राज्यों के लिए ‘रिफॉर्म-लिंक्ड’ इंसेंटिव

सरकार ने राज्यों के लिए एलपीजी आवंटन में सुधारों को भी जोड़ा है। राज्यों को पैक्ड नॉन-डोमेस्टिक एलपीजी का 70 प्रतिशत हिस्सा पहले ही आवंटित किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त 10 प्रतिशत कोटा उन राज्यों को मिलेगा जो निम्नलिखित तीन कदम उठाएंगे।

1. डिस्ट्रीब्यूशन ऑर्डर 2026: ‘नेचुरल गैस एंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूशन ऑर्डर 2026’ को सभी संबंधित विभागों तक पहुंचाना।

2. सुधार प्रक्रिया: रिफॉर्म-लिंक्ड एलपीजी आवंटन का लाभ उठाने के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया तेज करना।

3. बायो-गैस नीति: कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG) से जुड़ी राज्य स्तरीय नीति को जल्द से जल्द नोटिफाई करना।

5-किलो सिलेंडर की मांग में इजाफा

मंत्रालय ने छोटे सिलेंडरों की बिक्री के आंकड़े साझा करते हुए बताया कि 23 मार्च से अब तक देशभर में लगभग 7.8 लाख (5-किलो वाले) फ्री ट्रेड एलपीजी सिलेंडर बेचे जा चुके हैं। बाजार में इनकी मांग तेजी से बढ़ी है; सोमवार को ही 1.06 लाख से अधिक सिलेंडर बिके, जबकि फरवरी में इनका दैनिक औसत मात्र 77,000 सिलेंडर था।

सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने मांग को देखते हुए पिछले चार दिनों में 1,300 से अधिक जागरूकता शिविर आयोजित किए हैं, जिससे जमीनी स्तर पर इनकी उपलब्धता और बिक्री में सुधार हुआ है।

ईंधन की कमी से उद्योग पड़े पस्त

गौरतलब है कि ईरान युद्ध के चलते एलपीजी संकट से देशभर के उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। ईंधन की कमी और कच्चे माल की सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने उत्पादन की रफ्तार धीमी कर दी है। इसका सबसे ज्यादा असर एमएसएमई सेक्टर पर पड़ा है, जहां बड़ी संख्या में कॉन्ट्रैक्ट और गिग वर्कर्स की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है।

कानपुर में 1250 से अधिक फैक्ट्रियां और राज्यभर में लगभग 250 लघु उद्योग बंद हो चुके हैं। इसकी वजह से राज्यभर में 40-50% उत्पादन प्रभावित हुआ है। छोटे उद्योगों- रोलिंग मिल, प्लास्टिक, चूड़ी कारखानों, रेस्त्रां-हाटलों में ताले लग गए हैं और मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन भी शुरू हो गया है। गाजियाबाद और साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्रों में भी उत्पादन ठप हो गया है।

उधऱ, पंजाब के प्रमुख औद्योगिक केंद्र- लुधियाना, जालंधर और अमृतसर में श्रमिकों की कमी तेजी से गहराती दिख रही है। आमतौर पर मई के बाद शुरू होने वाला प्रवासी मजदूरों का पलायन इस बार अप्रैल में ही शुरू हो गया है। उद्योग जगत का कहना है कि एलपीजी की कमी, उत्पादन में गिरावट और काम के घंटों में कटौती इसकी मुख्य वजह हैं।

सप्लाई चेन में आई रुकावटों के चलते कई अहम उद्योगों की लागत बढ़ गई है। ऑटोमोबाइल और स्टील सेक्टर में ऑटो कंपोनेंट निर्माता सबसे ज्यादा दबाव में हैं, जबकि टेक्सटाइल और लेदर जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों में उत्पादन की गति धीमी पड़ गई है। फार्मा और मेडिकल डिवाइसेज सेक्टर कच्चे माल की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं ग्लास और सिरेमिक उद्योगों में ईंधन संकट के चलते कई भट्टियां बंद करनी पड़ी हैं।

एलपीजी संकट का असर सेवा क्षेत्र पर भी साफ दिख रहा है। क्लाउड किचन, क्विक सर्विस रेस्तरां (क्यूएसआर) और डाइन-इन आउटलेट्स को आंशिक रूप से परिचालन बंद करना पड़ा है। बड़े ब्रांड अब विकल्प तलाश रहे हैं- जुबिलेंट फूडवर्क्स (डोमिनोज) बिजली और पाइप्ड गैस पर निर्भरता बढ़ा रही है, जबकि किर्लोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों को एलपीजी की कमी के कारण कुछ प्लांट अस्थायी रूप से बंद करने पड़े।

इसका सीधा असर गिग इकोनॉमी पर भी पड़ रहा है। देश में करीब 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स डिलीवरी और कैब सेवाओं से जुड़े हैं, और विशेषज्ञों के मुताबिक यह वर्ग मौजूदा संकट के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील बना हुआ है।

समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments