जैसलमेर विश्व मानचित्र पर अपना अलग स्थान रखता है। यहां पर देसी ही नहीं विदेशों से हर वर्ष लाखों पर्यटक आते हैं। गुजरात की तरफ से जो भी पर्यटक जैसलमेर अता है वह बाड़मेर से होकर गुजरता है।
दिसंबर का महीना है और बाड़मेर में गुजरात नंबर प्लेट वाली गाड़ियों की धमचक है। इसी क्रम में चौहटन चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस वालों ने गुजरात की गाड़ी को रोका। ट्रैफिक पुलिस का पूरे भारत में एक अलिखित सा नियम है कि किसी दूसरे प्रदेश की नंबर प्लेट वाली गाड़ी दिखाई दे तो उसे रोका जाए उसके कागजात जांचे जाए।
गाड़ी रुकवाई गई ,लाइसेंस,आरसी,पॉल्यूशन सर्टिफिकेट आदि की जांच की, सब ठीक पाए गए। फिर भी यात्री को उतरने के लिए कहा गया कि हमारे साहब से मिलिए। तो यात्री उतरा और एक छोटी सी घुमटी के अंदर थानेदार साहब बैठे थे उनके पास गया। थानेदार साहब पढ़ने लिखने की शौकीन और इतिहास की जानकारी रखने वाले थे। साथ ही अपने शहर से बड़ा ही प्रेम करने वाले। उन्होंने यात्री को बिठाया और उससे पूछा कि किस तरफ जा रहे हो?
यात्री ने कहा, ‘जैसलमेर के अलावा हमारा और कहाँ ठिकाना है।’
थानेदार जी ने कहा कि आप बाड़मेर से होकर जाते हैं तो फिर आप बाड़मेर में क्यों नहीं रुकते हैं?
यात्री बोला -बाड़मेर में देखने लायक है ही क्या ?
थानेदार जी बोले कि ‘बाड़मेर में ऐसी अनेकों जगह है जिन्हें आप देख सकते हैं। जैसे हजार वर्ष पुराना हमारा किराडू का मंदिर है।’
यात्री ने कहा हमने तो कभी सुना नहीं इसके बारे में। थानेदार जी ने यात्री के लिए चाय मंगवाई हो किराडू के बारे मे बताने लगे। दक्षिण भारतीय शैली में बना किराड़ू का मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। बाड़मेर से कोई 43 किलोमीटर दूर हाथमा गांव में ये मंदिर है।
किराड़ू का मंदिर और जगत (उदयपुर) का अंबिका मंदिर और अलवर का नीलकंठ महादेव मंदिर तीनों खजुराहो शैली से समानता रखते हैं। विशेषतया किराडू का मंदिर और उदयपुर के अंबिका मंदिर की स्थापत्य शैली मध्यप्रदेश के खजुराहो मंदिरों की शैली से ज्यादा समानता रखती है। इसीलिए किराड़ू का मंदिर राजस्थान का खजुराहो कहलाता है जबकि अंबिका मंदिर ‘ मेवाड़ का खजुराहो ‘ कहलाता है ।
माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद मंदिर में कोई नही जाता क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि जो भी सूर्यास्त के बाद यहाँ आता है वो पत्थर बन जाता है।
इसको लेकर एक किंवदंती बड़ी प्रसिद्ध है इस क्षेत्र में कि एक साधु अपने शिष्यों के साथ यहां पर रहते थे। साधु किसी काम से बाहर गए थे और गांव वालों को अपने शिष्यों का ध्यान रखने का बोलकर गए थे। वापस लौट कर आए तब देखा कि शिष्यों की हालत बड़ी खराब है, उन्हें गांव वालों पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उनको श्राप दिया। श्राप की वजह से सारे के सारे गांव के लोग पत्थर बन गए। एक महिला थी उसने अवश्य उनके शिष्यों की कुछ देखभाल की थी, उससे कहा था कि तू यहां से चली जाओ और पीछे मुड़कर देखना मत। किराडू मंदिर का जो मुख्य प्रवेश द्वार हैं वहां तक महिला गई और कौतूहल वश उसने पीछे देख लिया तो वह महिला भी पत्थर की हो गई।

कहा जाता है कि 1161 ई. पूर्व इस स्थान का नाम ‘किराट कूप’ था। करीब 1000 ई. में यहां पर पांच मंदिरों का निर्माण कराया गया। इसे पंचायतन शैली या मरु गुर्जर सैलरी भी कहते है। तीन मंदिर शिव को समर्पित है और दो मंदिर विष्णु को समर्पित है। दो मंदिर जो नष्ट हुए हैं वह शायद कृष्ण मंदिर और सूर्य मंदिर थे। शैव वैष्णो मंदिरों का समूह कहा जाता है।
इन मंदिरों का निर्माण किसने कराया, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन मंदिरों की बनावट शैली देखकर लोग अनुमान लगाते है कि इनका निर्माण दक्षिण के गुर्जर-प्रतिहार वंश, संगम वंश या फिर गुप्त वंश ने किया होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार मंदिर 11 वीं शताब्दी के आसपास बनाया गया था और जिसका निर्माण दुशालराजा द्वारा किया गया था और वह परमार वंश से थे।
मंदिर की दीवारों पर कई शिलालेख मौजूद हैं जो 12 वीं शताब्दी के अस्तित्वो को परिभाषित करते है और यह गुजरात के चालुक्य वंश से भी संबंधित है। मंदिरों के खंभों पर इसी तरह के पटकथाओं के साथ उत्कीर्ण हैं और वे मदन भृमदेव चौहान के शासनकाल के दौरान चालुक्य वंश के प्राचीन युग के हिंदू कैलेंडर के हैं।
मंदिरों की इस शृंखला में केवल विष्णु मंदिर और शिव मंदिर (सोमेश्वर मंदिर) थोड़े ठीक हालात में है। बाकि मंदिर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। श्रृंखला में सबसे बड़ा मंदिर शिव को समर्पित नजर आता है। खम्भों के सहारे निर्मित यह मंदिर भीतर से दक्षिण के मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता है, तो इसका बाहरी आवरण खजुराहो का रंग लिए हैं। काले व नीले पत्थर पर हाथी-घोड़े व अन्य आकृतियों की नक्काशी मंदिर की कलात्मक भव्यता को दर्शाती है। श्रृंखला का दूसरा मंदिर पहले से आकार में छोटा है। लेकिन यहां शिव की नहीं विष्णु की प्रधानता है। जो स्थापत्य और कलात्मक दृष्टि से काफी समृद्ध है। शेष मंदिर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
कहा जाता है कि यह गुर्जर प्रतिहार शैली का अंतिम मंदिर है इस कारण भी अपने आप में यह बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है।
महाभारत,रामायण से लेकर कई पौराणिक कथाओं के दृश्य इस पर अंकित है। मुस्लिम अक्रांताओं ने सभी मूर्तियों को खंडित कर दिया विशेष करके महिलाओं की मूर्तियां खंडित किया और हिंदू धर्म में मान्यता है कि खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती।
यहाँ से 1152,1161 और 1178 के अभिलेख मिलते हैं। 1161 की अभिलेख में सिंधु राज परमार का उल्लेख मिलता है माना जाता है कि वह परमार वंश का संस्थापक था। 1178 के शिलालेख मिले है। इसमें लिखा है कि गुजरात के शासक भीमदेव आदित्य ने गौरी को पराजित किया था इसमें लिखा है कि मैंने गौरी शासको के द्वारा खंडित मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। सिंधु राज परमार का अभिलेख मिलता है कि उन्होंने भी यहां पर निर्माण कार्य करवाया था।।चालुक्य शासको ने निर्माण करवाया था।
यहां पर चौहानों का शासन रहा गुजरात के चालू के जिन्हें हम सोलंकी कहते हैं उनका शासन रहा परिवारों का शासन रहा। यह व्यापारी से शुल्क हो चला जाता था इसलिए किराडू आए के स्रोत के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण था। नाडोल के चौहानों ने अल्हण नाम के व्यक्ति को यहां पर गवर्नर के रूप में नियुक्त किया था।
यह सिर्फ मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध नहीं था बल्कि यह एक पर प्राचीन ट्रेड रूट का भाग था। यहाँ से ही महाराष्ट्र,मध्य प्रदेश और गुजरात का माल लाहौर और मध्य एशिया तक जाता था। इस दृष्टि से किराडू एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र और एक जंक्शन था जहाँ यात्री रात्रि विश्राम और व्यापार करने रुकते थे। शासकों को यहाँ से कर के रूप में बड़ा राजस्व प्राप्त होता था।
यात्री बड़े गौर से सब कुछ सुन रहा था और उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस चौहटन चौराहे से होकर अनेक बार वह जैसलमेर गया है किंतु यहां से कुछ ही कोस की दूरी पर हजार वर्ष पुरानी धरोहर स्थित है, उसके दर्शन करने का उसे कभी सौभाग्य नहीं मिला।
थानेदार जी ने बात पूरी करते हुए कहा कि “किराडू के वैभव को पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए। वहां का एक-एक पत्थर मूर्ति सदृश है। देश-विदेश के अनेक शोधार्थी यहाँ आते हैं और इस पर शोध करते हैं। किराडू अपने आप में हजार सालों के इतिहास को समेटे हुए हैं। हजार साल और तीन राजवंशों का इतिहास यहां पर है। सरकार को यहां पर एक प्रोजेक्ट देना चाहिए जिससे कि शोध कार्य को गति मिले।
यहाँ की मूर्तियों यहाँ की स्थापत्य कला और यहाँ के इतिहास और ट्रेड रूट के बारे में लोगो को और अधिक जानकारी प्राप्त हो सके।”
यात्री बोला कि “इस बार तो हमारा सारा कार्यक्रम तय है पर अगली बार जब भी जैसलमेर जाएंगे हम किराडू के मंदिर जरूर देखकर जाएंगे”

