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कथा प्रांतर-11: खुरदरी सड़क पर चाबी की तलाश

साहित्य की तमाम विधाओं के बीच कहानी की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रति वर्ष अनुमानतः पाँच सौ से ज्यादा नई हिंदी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। नई कहानी के दौर में पहली बार कहानियों के विधिवत मूल्यांकन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज वह एक सुदीर्घ परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। ‘कथा प्रांतर’ चुनिंदा कहानियों के मूल्यांकन की एक शृंखला है, जिसकी हर कड़ी में कहानीकार आलोचक राकेश बिहारी किसी समकालीन कहानी की विवेचना करते हैं। इस शृंखला की 11वीं कड़ी में प्रस्तुत है कैफी हाशमी की कहानी ‘चाबी’ का विश्लेषण।

यदि कहानी को एक ग्राफ की तरह देखें तो X अक्ष पर उसके क्षैतिज विस्तार और Y अक्ष पर उसकी उदग्र या ऊर्ध्वाधर गहराई को दर्शाया जा सकता है। कथावस्तु, परिवेश, सामाजिक यथार्थ, ऐतिहासिक संदर्भ और वैचारिक बहुलता मुख्यतः कहानी को क्षैतिज विस्तार देते हैं। जबकि चरित्र-निर्माण, परकाया-प्रवेश, दृष्टिकेन्द्रण, मनोवैज्ञानिक जटिलता और अनुभव की सूक्ष्मता से कहानी की ऊर्ध्वाधर गहराई तय होती है। वाचकीय संरचना इन दोनों को जोड़ने वाला जरूरी माध्यम है, जो तय करती है कि कथा अपने संसार को किस दृष्टि से देखेगी और अपने अनुभवों को पाठक तक किस दूरी या निकटता से संप्रेषित करेगी। भाषा इस पूरे ग्राफ का संवाहक है, जो विस्तार को गति और गहराई को घनत्व प्रदान करती है। एक अच्छी कहानी की खूबसूरती इसी बात पर निर्भर करती है कि वह क्षैतिज विस्तार और ऊर्ध्वाधर गहराई के बीच कितना संतुलन बना पाती है। बड़ी कहानियाँ प्रायः इन दोनों दिशाओं में एक साथ विकसित होती हैं। घटना-संसार और परिवेश के विस्तार तथा पात्र और परिस्थितियों की गहराई में उतरने की क्रिया वहाँ समानांतर रूप से चलती हैं। लेकिन यह रचनात्मक संतुलन आसान नहीं होता है। विशेषतः लंबी कहानियों के सामने यह चुनौती और जटिल हो जाती है।

लंबी कहानियों के साथ ऐसा अक्सर होता है कि वे अपने समय की तमाम जटिल समस्याओं को समेटने की आकांक्षा में क्षैतिज विस्तार तो अर्जित कर लेती हैं, किंतु उदग्र विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाता। वे अपने युग का मानचित्र तो प्रस्तुत करती हैं, पर उसके भीतर जी रहे मनुष्य की आत्मिक भूगोल को उतनी गहराई से नहीं रच पातीं। परिणामस्वरूप वे विचारोत्तेजक तो होती हैं, पर अनुभवगत रूप से हमेशा उतनी सघन नहीं बन पातीं।

लंबी कहानी स्वभावतः विस्तारपरक आख्यान की विधा है। उसमें लेखक के पास इतना अवकाश होता है कि वह एकाधिक पात्रों, प्रसंगों, सामाजिक प्रश्नों और वैचारिक संकेतों को समाहित कर सके। यही उसकी विशेषता भी है और उसका संकट भी। कई बार लेखक को लगता है कि जिस यथार्थ को वह चित्रित करना चाहता है, उसकी समग्रता को व्यक्त करने के लिए अधिकाधिक संदर्भों और प्रसंगों की आवश्यकता है। किन्तु इसी प्रक्रिया में कई बार X अक्ष पर कहानी का क्रमशः क्षैतिज विस्तार तो होता है, लेकिन Y अक्ष पर कहानी अपेक्षित ऊर्ध्वाधर गहराई अर्जित नहीं कर पाती। कथा कई विषयों को छूती है, पर किसी एक अनुभव के केंद्र तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाती है। पात्र अनेक प्रश्नों के वाहक बन जाते हैं, लेकिन उनकी मनुष्यता का विस्तार सीमित रह जाता है। वातावरण बहुस्तरीय हो जाता है, किंतु लेखक परकाया-प्रवेश में चूक जाता है। कहानी अपने समय के बारे में बहुत कुछ कहना चाहती है, पर चरित्रों के भीतर कम उतर पाती है। इस प्रकार कहानी की चौड़ाई और गहराई के बीच एक अंतराल पैदा होता है।

इसलिए लंबी कहानी को पढ़ने और परखने के लिए उसकी चौड़ाई और गहराई पर विचार करना जरूरी हो जाता है। मतलब यह कि किसी लंबी कहानी की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि वह कितने विषयों को समेट लेती है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने विस्तार को अनुभव की सघनता में किस हद तक रूपांतरित कर पाती है। वह कितनी दूर तक जाती है, यह महत्वपूर्ण है, पर उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह कितनी गहराई तक उतरती है। ‘समालोचन’ पर हालिया प्रकाशित कैफ़ी हाशमी की कहानी ‘चाबी’ को इस कसौटी पर परखना एक रोचक और विचारोत्तेजक अनुभव हो सकता है।

‘चाबी’ ने अपने प्रकाशन के साथ ही लेखकों-पाठकों का खूब ध्यान खींचा है। इस कहानी पर आई प्रतिक्रियाओं को एक साथ पढ़ना अपने आप में एक दिलचस्प अनुभव है। एक ओर वे प्रतिक्रियाएं हैं, जो इसे हमारे समय की निर्णायक, बेचैन करने वाली, बहुस्तरीय और भविष्यसूचक कहानी मानती हैं; तो दूसरी और कतिपय वैसी प्रतिक्रियाएं भी हैं, जो इसे सतही, एकांगी, अतिनाटकीय और वैचारिक रूप से संदिग्ध रचना मानती हैं। दो-एक अपवादों को छोड़ दें तो दोनों पक्षों की भाषा प्रायः इतनी निर्णायक, अतिरेकी और वाचाल हैं कि कहानी और पाठ के बीच विश्लेषण की आलोचनात्मक भूमि वहाँ लगभग गायब-सी हो गई है। पाठ-विलग, भावातिरेकी और विशेषणवादी प्रशंसात्मक प्रतिक्रियाएं प्रायः कहानी और कहानीकार दोनों का ही नुकसान करती हैं। इसलिए जरूरी है कि कहानी की सूक्ष्म, धैर्यपूर्ण और पाठ-आधारित आलोचनात्मक पड़ताल की जाए।

‘चाबी’ समकालीन शहरी मध्यवर्गीय जीवन में व्याप्त भय, असुरक्षा और ऋणग्रस्तता की कहानी है। इसका नायक असद एक आईटी कंपनी में काम करने वाला युवक है, जो भारी कर्ज़, होम लोन और आर्थिक दबावों के बीच जीवन बिता रहा है। कहानी की शुरुआत मस्जिद के बाहर उस पर हुए एक हिंसक हमले से होती है। घायल होकर गिरते ही उसकी चेतना छह वर्ष पीछे लौट जाती है और कथा एक लंबे फ्लैशबैक के रूप में खुलती है।

फ्लैशबैक में असद की मुलाकात ‘बडी ऐप’ के माध्यम से किराये पर उपलब्ध दो साथियों- जिगरी और मित्तर से होती है। उनके साथ बिताई गई एक रात में अकेलेपन, बेरोज़गारी, उपभोक्तावाद, प्रेम-संबंधों, शेयर बाज़ार, ऋण और बदलती सामाजिक संरचनाओं पर बातचीत होती है। इसी दौरान असद अपनी फ्लैट की चाबी खो देता है और उसे तलाशते हुए पूरी रात बेचैनी में भटकता रहता है। चाबी की खोज धीरे-धीरे केवल एक वस्तु की खोज न रहकर उसके जीवन की सुरक्षा, स्थिरता और अस्तित्व की खोज का रूप ले लेती है।

रात के अंत में एक रहस्यमयी बच्ची असद को खोई हुई चाबी लाकर देती है, जबकि जिगरी और मित्तर अचानक गायब हो जाते हैं। छह वर्ष बाद असद फिर आर्थिक संकट में फँसा है। नौकरी जा चुकी है, कई ईएमआई बकाया हैं और उसके सामने घर खोने का खतरा मंडरा रहा है। इसी समय वह पुनः उस चाबी के प्रतीकात्मक अर्थ से जूझता दिखाई देता है। कहानी का अंत एक अनिश्चित और रहस्यपूर्ण दृश्य में होता है, जहाँ असद पर हमला हुआ है और वह जीवन, मृत्यु, भय तथा मुक्ति के बीच झूलता हुआ अपनी खोती हुई चेतना में चाबी तलाश रहा है।

कहानी में इस मूल कथा के समानांतर असद के परिवार का इतिहास भी खुलता है। उसके पूर्वज अमानुल्लाह (दादा) और सनाउल्लाह (पिता) विभाजन (1948) तथा 1984 के दंगों जैसी ऐतिहासिक त्रासदियों से उत्पन्न भय के कारण अपना जीवन खो बैठे थे। लेखक इन पीढ़ियों के अनुभवों को जोड़ते हुए यह दिखाने का प्रयास करता है कि भय एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होता रहता है, भले ही उसके कारण बदल जाएँ। जहाँ पुरानी पीढ़ियाँ सांप्रदायिक हिंसा से आतंकित थीं, वहीं असद का भय आर्थिक असुरक्षा, बेरोज़गारी और ऋण-जाल से निर्मित है।

इस प्रकार चाबी ऋण, अकेलेपन, मध्यवर्गीय असुरक्षा, सांप्रदायिक स्मृति और मृत्यु-भय को एक साथ समेटते हुए यह रेखांकित करती है कि समय के साथ भय का स्वरूप भले बदल जाए, पर यह मानव जीवन का स्थाई हिस्सा होता है।

चाबी का सबसे जटिल और रोचक पक्ष उसकी महत्त्वाकांक्षी संरचना है। यह कहानी एक साथ कई दिशाओं में चलना चाहती है। यह इतिहास की कथा भी बनना चाहती है, मनोवैज्ञानिक आख्यान भी। इसे सामाजिक आलोचना भी करनी है और मिथकीय संरचना का निर्माण भी करना है। यह समकालीन शहरी जीवन का दस्तावेज़ भी बनना चाहती है और भय का सार्वकालिक रूपक भी। मेरे लिए प्रश्न यह नहीं है कि इनमें से कौन-सा प्रयास उचित है। बल्कि मेरी चिंता यह है कि क्या ‘चाबी’ की कथा-संरचना इन सबको समान कलात्मक शक्ति के साथ वहन कर पाती है? निश्चित तौर पर ‘चाबी’ भय, ऋण, असुरक्षा, सांप्रदायिक स्मृति, गिग-अर्थव्यवस्था, उपभोक्तावाद, बेरोज़गारी, मध्यवर्गीय जीवन और मृत्यु-बोध जैसे अनेक प्रश्नों को एक साथ समेटने का महत्वाकांक्षी प्रयास करती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह कहानी अपने व्यापक क्षैतिज विस्तार को उसी अनुपात में उदग्र गहराई में रूपांतरित कर पाती है? क्या इसका भय केवल एक मनोवैज्ञानिक अनुभव है, या वह इसकी सामाजिक-ऐतिहासिक संरचनाओं की भी पर्याप्त पड़ताल करता है? क्या इसके पात्र जीवित मनुष्य बन पाते हैं, या अनेक विचारों और प्रतीकों के वाहक बनकर रह जाते हैं? क्या कहानी के रहस्यात्मक तथा प्रतीकात्मक उपकरण उस यथार्थ को गहराई से उजागर करते हैं जिसे कहानी पकड़ना चाहती है, या उसे कुछ धुंधला ही कर देते हैं? इन प्रश्नों के आलोक में इस कहानी का पाठ ही मेरे लिए इसकी आलोचना है।

द्वितीय पुरुष कथन-शैली (‘तुम’ शैली) और उससे निर्मित दृष्टिकेंद्रण (focalization), ‘चाबी’ की बड़ी संरचनात्मक विशेषता है। सामान्यतः प्रथम पुरुष (‘मैं’) और तृतीय पुरुष (‘वह’) कथन शैली की तुलना में द्वितीय पुरुष कथन-शैली की कहानियाँ कम लिखी जाती हैं। पर ‘चाबी’ में यह प्रयोग कथा-दृष्टि का केंद्रीय उपकरण है। कहानी का संसार किसी सर्वज्ञ द्रष्टा की आँखों से नहीं, बल्कि असद की चेतना से छनकर हमारे सामने आता है। यहाँ प्रसिद्ध फ्रांसीसी कथा विज्ञानी जेरार्ड जेनेट के कथा-सिद्धान्त को याद किया जाना चाहिए, जहाँ वे ‘कौन बोल रहा है?’ (Who speaks?) और ‘कौन देख रहा है?’ (Who sees?) को अलग-अलग प्रश्न मानते हैं। ‘चाबी’ का कथानायक असद और कहानी का वाचक दो अलग व्यक्ति हैं। यहाँ वाचक असद को संबोधित कर रहा है। किंतु कथा को देखने वाली आँख मुख्यतः असद की ही है। मतलब यह कि ‘चाबी’ में कथावाचक (narrator) और दृष्टिकेंद्र (focalizer) एक भले नहीं हैं, लेकिन उनके बीच की दूरी अत्यंत कम है। कथा का अधिकांश अनुभव असद की चेतना, स्मृति, आशंका और भय के भीतर से निर्मित होता है।

यही कारण है कि बतौर पाठक हम वस्तुओं और घटनाओं को उनके वस्तुगत रूप में नहीं, बल्कि असद की भयाकुल अनुभूति के रूप में ग्रहण करते हैं। खोई हुई चाबी एक साधारण वस्तु न रहकर सुरक्षा, नियंत्रण, घर और अस्तित्व का प्रतीक बन जाती है। जिगरी और मित्तर कभी मनुष्य तो कभी रहस्य तो कभी मृत्यु-दूत लगने लगते हैं। कहानी के अंत में आई बच्ची वास्तविक और फ़रिश्ते का रूप एक साथ लगने लगती है। इस प्रकार कथा का दृष्टिकेंद्रण बाह्य यथार्थ की तुलना में अनुभूति के आंतरिक प्रभाव और ततनुरूप उसके विश्लेषण को अधिक महत्व देता है। परिणामतः कहानी का प्रभाव क्षेत्र घटनाओं से नहीं, बल्कि उन घटनाओं के प्रति असद की मानसिक प्रतिक्रिया से निर्मित होता है।

यहाँ द्वितीय पुरुष कथन शैली के दो सकारात्मक प्रभाव हैं। एक तो यह कि वाचक का ‘तुम’ सम्बोधन सीधे पाठक तक पहुंच कर उसे प्रत्यक्षतः कहानी से जोड़ देता है। इसका दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रभाव कथानायक का ‘आत्म-विभाजन’ (self-distancing) है। यदि कहानी ‘मैं’ शैली में लिखी जाती तो असद अपने अनुभव का प्रत्यक्ष वक्ता होता लेकिन तब अपने पूर्वजों के किस्से सुनाना उसके लिए जटिल होता। द्वितीय पुरुष कथन शैली जहाँ उसे स्वयं को एक रचनात्मक दूरी से देखने का अवसर देती है, वहीं अपने पूर्वजों की कथा कहना भी उसके लिए आसान हो जाता है। कथानायक का अपने अनुभव को जीने के साथ उसे एक निश्चित दूरी से देखना इस कथन शैली को विशिष्ट बनाता है। किंतु इस प्रक्रिया में एक समस्या भी उत्पन्न होती है, वह यह कि असद की वैयक्तिक विशिष्टता धीरे-धीरे कम होने लगती है। वह एक जीवित व्यक्ति की अपेक्षा एक खास मानसिक स्थिति का वाहक अधिक प्रतीत होने लगता है। उसके जीवन की वे ठोस सामाजिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ, जिन्होंने उसे इस संकट तक पहुँचाया, अपेक्षाकृत कम विकसित रह जाती हैं।

Book cover featuring a circular portrait of a man on a dark background, with a large white key illustration and Nepali text on the right; a red vertical spine with white text on the left.

दृष्टिकेंद्रण की दृष्टि से कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि भय के अनुभव का सघन और विश्वसनीय पुनर्निर्माण है। पाठक भय को बाहर से नहीं देखता, बल्कि कहानी का आंतरिक दृष्टिकेंद्रण जैसे उसे भय के भीतर रख देता है। किंतु कथा संरचना की यही विशेषता तब उसकी सीमा बन जाती है, जब कथा में निहित सामाजिक और ऐतिहासिक यथार्थ भी असद की चेतना से ही छनकर आए लगते हैं। परिणामस्वरूप कहानी ऋण-व्यवस्था, उपभोक्तावाद, बेरोज़गारी, सांप्रदायिक स्मृति और मध्यवर्गीय संकट जैसे विषयों को छूती तो है, पर उन्हें पर्याप्त वस्तुगत दूरी से विश्लेषित नहीं कर पाती। कई बार यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि हम किसी सामाजिक संरचना को देख रहे हैं या उस संरचना के प्रति असद की मानसिक प्रतिक्रिया को।

कहानी के अंत की रहस्यात्मकता भी इसी दृष्टिकेंद्रण का परिणाम है। जिगरी और मित्तर की वास्तविकता, रहस्यमयी बच्ची की पहचान, हमलावरों का स्वरूप और यहाँ तक कि असद की अंतिम स्थिति इन सब पर कुहासे की एक झीनी परत सी चढ़ जाती है। यह रहस्यमयता कथानक की रणनीति नहीं, बल्कि उस दृष्टिकेंद्रण की उपज है, जिसके कारण कहानी लगातार असद की चेतना से संचालित होती है।

चाबी की द्वितीय पुरुष कथन-शैली और उसका आंतरिक दृष्टिकेंद्रण कहानी की संपूर्ण संरचना के केंद्र में स्थित हैं। कहानी की यह संरचना इसे भय, असुरक्षा और अस्तित्वगत संकट की कथा के रूप में प्रभावशाली तो बनाती है, किंतु उसके सामाजिक यथार्थ को कुछ हद तक धुँधला कर देती है। इस प्रकार ‘चाबी’ की कलात्मक उपलब्धि और उसकी रचनात्मक सीमा दोनों का एक ही कारण है- असद की भयग्रस्त चेतना के साथ वाचक की अत्यधिक निकटता।

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‘चाबी’ अपने समय के अत्यंत ठोस सामाजिक यथार्थ की जमीन पर पर खड़ी होती है, लेकिन अंत तक आते-आते उसी यथार्थ को रहस्य, प्रतीक और धार्मिक संकेतों के क्षेत्र में ले जाती है। साहित्य में रहस्य, प्रतीक और रूपक हमेशा से वैध उपकरण की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। लेकिन ‘चाबी’ के परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है कि जब कथा का मूल पदार्थ या मुख्य कच्चा माल स्वयं इतना ऐतिहासिक, सामाजिक और यथार्थपरक है, तब उसे अंततः रहस्यात्मक अर्थ-संरचना में रूपांतरित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

कहानी का आरंभिक संसार पूरी तरह समकालीन भारतीय शहरी मध्यवर्ग के अनुभवों से निर्मित हुआ है। इसमें आईटी सेक्टर की अस्थिर नौकरियाँ हैं, होम लोन है, ईएमआई है, क्रेडिट कार्ड हैं, शेयर बाज़ार है, बेरोज़गारी है, उपभोक्तावादी दबाव है, अकेलापन है और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों द्वारा मुहैया कराई जाने वाली संबंध सेवाएं हैं। जिगरी और मित्तर जैसे पात्रों का एक ऐप-आधारित सेवा के माध्यम से असद के जीवन में प्रवेश करना एक-डेढ़ दशक पूर्व किसी लेखक की कल्पना या फैन्टेसी हो सकती थी। लेकिन पिछले एक दशक में भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में ‘रेंट-अ-फ्रेंड’, ‘सोशल कम्पैनियन’ या ‘पेड कम्पैनियनशिप’ जैसी सेवाएँ वास्तविक यथार्थ का हिस्सा हैं। इसलिए कहानी का यह प्रसंग पाठक के साथ एक यथार्थवादी अनुबंध स्थापित कर बेहिचक उनका भरोसा अर्जित कर लेता है। ऐसे में कहानी के अंत में रची गई रहस्यात्मकता स्वाभाविक अर्थ निर्माण में कठिनाइयाँ पैदा करती हैं।

जिगरी और मित्तर प्रारंभ में पूरी तरह मनुष्य हैं। वे खाते-पीते हैं, बातचीत करते हैं, प्रेम-संबंधों, नौकरी, शेयर बाज़ार, विवाह और आर्थिक संकट पर विचार व्यक्त करते हैं। वे किसी मिथकीय लोक से अवतरित प्राणी नहीं लगते। लेकिन अंत तक आते-आते, उनके चारों ओर एक रहस्यात्मक आभा-सी निर्मित होने लगती है। वे अचानक गायब हो जाते हैं, उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति तर्कातीत हो जाती है, और अंततः वे इस्लामी मान्यताओं के मृत्यु-दूत द्वय ‘मुनकर-नकीर’ की संभावित छवियों में बदलने लगते हैं। इसी प्रकार वह छोटी बच्ची, जो प्रारंभ में केवल खोई हुई चाबी लौटाने वाली एक बच्ची है, धीरे-धीरे फ़रिश्ते या ‘मुलुक-उल-मौत’ की आकृति ग्रहण कर लेती है। कहानी के इस अंतिम हिस्से तक आते-आते यह प्रश्न सहज ही आ खड़ा होता है कि कथा चरित्रों का यह प्रतीकात्मक रूपांतरण कहानी के यथार्थबोध को कम तो नहीं कर देता है? चाबी का मुख्य कलात्मक द्वंद्व इसी प्रश्न में निहित है। कहानी स्पष्टतः भय की एक ऐसी संरचना का निर्माण करती है, जो सामाजिक से ज्यादा धार्मिक और कुछ हद तक अस्तित्वगत भी है।

भय इस कहानी की नाभि में निहित है। कहानी में आई तीनों पीढ़ियाँ (अमानुल्लाह, सनाउल्लाह और असद) भय की गिरफ्त में हैं। विभाजन का दंगा, 1984 की हिंसा और ऋण-संकट से उत्पन्न असुरक्षाबोध इन तीनों पीढ़ियों के भय के अलग-अलग कारण हैं। कहानी अलग-अलग समयों में घटित इन तीन ऐतिहासिक परिस्थितियों को भय की आनुवंशिकता में रूपांतरित करना चाहती है। कथा का यथार्थ से प्रतीक की ओर बढ़ने का एक प्रयोजन यह भी है। कहानी के किसी प्रसंग या पात्र का किन्हीं रूपकों या प्रतीकों में बदल जाना अपने आप में कोई समस्या नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि कथा की यथार्थवादी संरचना इस रूपांतरण के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं करती। यदि जिगरी और मित्तर प्रारंभ से ही किसी मिथकीय, जादुई या स्वप्नवत् संसार के पात्र होते, तो उनका धार्मिक प्रतीकों में रूपांतरित होना सहज लगता। किंतु वे जिस सामाजिक यथार्थ से आते हैं, वह इतना ठोस और विश्वसनीय है कि पाठक उन्हें पहले वास्तविक मनुष्य के रूप में ग्रहण कर चुका होता है। इसलिए जब कथा उन्हें रहस्य में बदलने लगती है तो पाठक के सामने एक द्वंद्व उपस्थित हो जाता है। वह पूरी कहानी में जिन कथा-चरित्रों के साथ विश्वसनीय मनुष्य की तरह संवादरत था, कहानी अचानक ही उसे धार्मिक प्रतीक मानने का सांकेतिक आग्रह करने लगती है।

कुछ पाठकों-समीक्षकों ने इसे जादुई यथार्थवाद से जोड़कर देखा है। किंतु ऐसा करते हुए एक अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है। जादुई यथार्थवाद में अलौकिक तत्व संसार का स्वाभाविक हिस्सा होते हैं; उन मान्यताओं की सार्वजनिक स्वीकृति पाठकों के लिए विस्मय या अविश्वसनीयता का कारण नहीं बनती। लेकिन ‘चाबी’ में ऐसा नहीं है। यहाँ रहस्य एक अनिश्चित संभावना के रूप में उपस्थित है। कथा स्वयं भी यह निर्णय नहीं करती कि बच्ची वास्तव में फ़रिश्ता थी या नहीं, जिगरी-मित्तर वास्तव में कौन थे और अंतिम क्षणों में असद ने क्या देखा। इसलिए इसे जादुई यथार्थवाद से जोड़ना युक्तिसंगत नहीं लगता, बल्कि इसे प्रतीकात्मक अस्पष्टता का नाम जरूर दिया जा सकता है।

कहानी आद्योपांत बार-बार यह स्थापित करती है कि हमारे समय का सबसे बड़ा संकट आर्थिक है। ऋण, ईएमआई, उपभोक्तावाद, बेरोज़गारी और बाज़ार-निर्मित आकांक्षाएँ उसके केंद्रीय सरोकार हैं। किंतु अंततः वह इस संकट को उसके सामाजिक और संस्थागत रूप में देखने के बजाय मृत्यु और नियति के रूपक में रूपांतरित कर देती है। परिणामस्वरूप वित्तीय संस्थाएँ, ऋण उद्योग, उपभोक्तावादी संस्कृति, असुरक्षित श्रम-बाज़ार आदि जिन संरचनाओं की आलोचना की जानी चाहिए थी, वे पृष्ठभूमि में चली जाती हैं और अस्तित्वगत भय ही कहानी की मुख्य चिंता की तरह उपस्थित हो जाता है।

मेरी दृष्टि में, ‘चाबी’ का समकालीन यथार्थ की सर्वथा विश्वसनीय और कुछ हद तक अलग जमीन पर खड़ा होना इसका मजबूत पक्ष है। जिगरी का अपनी प्रेमिका और आर्थिक स्थिति को लेकर असमंजस, शेयर बाज़ार में डूबता निवेश, असद का ऋण-जाल, नौकरी का संकट, ईएमआई का दबाव और भविष्य का भय, ये सब प्रसंग इतने प्रामाणिक और प्रभावशाली हैं कि उन्हें पाठकीय स्वीकृति के लिए किसी अतिरिक्त रहस्यात्मक आवरण की आवश्यकता ही नहीं थी। वे अपने आप में आधुनिक जीवन की त्रासदी को पर्याप्त रूप से व्यक्त करते हैं। इसलिए जब कथा अंत में धार्मिक-रहस्यात्मक संकेतों की ओर मुड़ती है, तो ऐसा लगता है, मानो अबतक का अर्जित सामाजिक यथार्थ कुछ हल्का या धुँधला पड़ गया हो।

दरअसल ‘चाबी’ दो अलग-अलग कलात्मक आकांक्षाओं से रची गई कहानी है। वह एक ओर समकालीन आर्थिक और सामाजिक संकट की कथा बनना चाहती है, दूसरी ओर भय, मृत्यु और मनुष्य की अंतिम असुरक्षा का रूपक रचना चाहती है। यही कलात्मक द्वन्द्व मेरी दृष्टि में इस कहानी की बड़ी सीमा है।

किसी कहानी की संरचना से जुड़ा यह प्रश्न भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि वह किन अनुभवों को दृश्य बनाती है और किन्हें अदृश्य छोड़ देती है। इस दृष्टि से ‘चाबी’ का पाठ कुछ और असुविधाजनक प्रश्न खड़े करता है। कहानी के केंद्र में असद है। उसके इर्द-गिर्द पिता हैं, दादा हैं, जिगरी है, मित्तर है, पार्क का बूढ़ा आदमी है, रिकवरी एजेंट हैं, बैंकिंग और ऋण-व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं। यहाँ तक कि इतिहास के जिन प्रसंगों को कहानी अपने भय-आख्यान में शामिल करती है- विभाजन के बाद के दंगे (1948) और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सामूहिक हिंसा (1984), वे भी मुख्यतः पुरुष पात्रों की स्मृतियों और अनुभवों के माध्यम से ही सामने आते हैं। स्त्रियाँ यहाँ लगभग अनुपस्थित हैं। वे कहीं पत्नी, प्रेमिका, माँ या बेटी के रूप में सक्रिय सामाजिक व्यक्तित्व नहीं हैं। वे या तो स्मृति में हैं, प्रसंगवश उल्लिखित हैं, या कथा के बाहर स्थित हैं। इस अर्थ में ‘चाबी’ समाज की कहानी कम और पुरुष-समाज के संकट की कहानी अधिक प्रतीत होती है। वैसे तो घोषित रूप से कहानी अपने समय के व्यापक संकट का आख्यान रचने का दावा करती है, लेकिन उसकी कथा-सृष्टि लगभग पूरी तरह पुरुष अनुभवों, पुरुष आशंकाओं और पुरुष दृष्टिकोणों से निर्मित है। इस संदर्भ में आलोचक अलका तिवारी का यह प्रश्न जायज है कि जब असद अपने पिता की मृत्य के समय महज एक महीने का था, उसे अपने पूर्वजों की कथा के बारे में कैसे पता चला? बहुत संभव है इसका माध्यम उसकी माँ रही हो। लेकिन कहानी माँ के अनुभव या उसकी स्मृतियों की तरफ जाती ही नहीं।

किसी कहानी का पुरुष अनुभव पर केंद्रित होना अपने आप में कोई दोष नहीं है। हर कहानी किसी विशिष्ट अनुभव-क्षेत्र से ही निर्मित होती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब कोई कहानी सीमित अनुभव के सहारे सार्वभौमिक अनुभव का दावा करने लगे। चाबी में यही स्थिति दिखाई देती है। कहानी जिस आर्थिक संकट को हमारे समय का ‘केंद्रीय संकट’ बताना चाहती है, वह वस्तुतः मध्यवर्गीय पुरुष के अनुभव के रूप में सामने आता है। ऐसे में समाज के आधे हिस्से की अनुपस्थिति के बीच लिखी गई कहानी को किसी समय के सम्पूर्ण समाज की त्रासदी का आख्यान कैसे माना जा सकता है?

यहाँ, प्रश्न यह भी है कि कहानी में जहाँ स्त्रियाँ दिखाई देती हैं, वहाँ वे किस रूप में दिखाई देती हैं? ‘चाबी’ में प्रसंगवश आई कोई भी स्त्री एक व्यक्तित्व की तरह सामने नहीं आती है। वह प्रायः पुरुष संकट की पृष्ठभूमि या उसके कारणों में से एक के रूप में उपस्थित होती है। उदाहरण के लिए जिगरी के प्रेम-संबंध के प्रसंग को देखा जा सकता है। जिगरी अपनी प्रेमिका के बारे में कहता है कि वह अच्छा कमाती है, आधुनिक है, लेकिन खर्च नहीं करना चाहती। वह चाहती है कि कैफ़े का बिल पुरुष चुकाए, शॉपिंग का खर्च पुरुष उठाए, नौकरी भी पुरुष करे और आर्थिक स्थिरता भी वही सुनिश्चित करे। पहली दृष्टि में यह आधुनिक संबंधों के भीतर मौजूद लैंगिक अंतर्विरोधों का यथार्थवादी चित्रण प्रतीत हो सकता है। संभव है ऐसे अनुभव भी सामाजिक जीवन में मौजूद हों। इसलिए समस्या इस प्रसंग की उपस्थिति में नहीं, उसकी एकतरफ़ा संरचना में है। कहानी हमें जिगरी का पक्ष विस्तार से सुनाती है, पर प्रेमिका का पक्ष बिल्कुल नहीं सुनाती। कहानी यह नहीं बताती कि वह क्यों आर्थिक सुरक्षा चाहती है, वह जिगरी के शेयर बाज़ार में डूबे जीवन और उसके ऋणों के बारे में क्या सोचती है, या विवाह और भविष्य को लेकर उसकी अपनी आकांक्षाएं और आशंकाएँ क्या हैं। पाठक के सामने केवल पुरुष का कथन है और स्त्री उसकी अनुपस्थित प्रतिवादी। स्वयं कथानायक असद के प्रेम संबंधों की चर्चा भी कहानी में एक पक्षीय ही है। परिणामतः कहानी में स्त्री पक्ष अपनी चारित्रिक जटिलता के साथ नहीं उभरता और ऐसे पाठ की संभावना बनने लगती है कि पाठक यहाँ स्त्रियों को पुरुष संकट का स्रोत ही समझने लगे।

कहानी की स्त्री दृष्टि को समझने के लिए सोशल मीडिया से संबंधित टिप्पणी को भी देखा जाना चाहिए-

“औरतें जानती हैं कि कैमरा का एंगल उनके किन अंगों पर कैसे फोकस करे कि ज़्यादा व्यूज़ आएँ।”

यहाँ स्त्री उस सामाजिक संरचना का हिस्सा नहीं है जिसकी आलोचना की जा रही है। वह स्वयं उस पतनशीलता का प्रतीक बन जाती है। यह स्त्री को समझने की नहीं, देखने की पुरुष दृष्टि है। यही कारण है कि कहानी स्वयं जिस व्यवस्था की आलोचना करना चाहती है, कई बार उसी व्यवस्था के कुछ पूर्वग्रहों का पुनरुत्पादन भी करती दिखाई देती है। उदाहरण के लिए यदि कहानी का केंद्रीय तर्क यह है कि उपभोक्तावादी आधुनिकता मनुष्य को ऋण, असुरक्षा और अकेलेपन के जाल में फँसा रही है, तो यह अपेक्षित था कि वह उन सांस्कृतिक तंत्रों की भी आलोचना करती जिनके माध्यम से यह उपभोक्तावाद संचालित होता है। किंतु कई प्रसंगों में उपभोक्तावाद की संरचनात्मक आलोचना की जगह स्त्री की उपभोग-केंद्रित छवि सामने आ जाती है। परिणामतः व्यवस्था की आलोचना का लक्ष्य धीरे-धीरे व्यक्ति, विशेषतः स्त्री, की ओर खिसकने लगता है।

यदि यह कहानी वास्तव में हमारे समय के भय का आख्यान है, तो स्त्रियों का भय कहाँ है? क्या ऋण-संकट केवल पुरुषों को प्रभावित करता है? क्या बेरोज़गारी, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक हिंसा और डिजिटल संस्कृति का दबाव स्त्रियों के जीवन में उपस्थित नहीं है? क्या विभाजन और 1984 जैसी ऐतिहासिक त्रासदियों का अनुभव स्त्रियों ने नहीं किया? इन प्रश्नों का उत्तर निस्संदेह ‘हाँ’ में है। लेकिन कहानी इन अनुभवों को अपनी संरचना में स्थान नहीं देती। इसीलिए उसका भय सार्वभौमिक होने का दावा करते हुए भी अंततः एक विशिष्ट पुरुष अनुभव का भय बनकर रह जाता है।

कहानी में स्त्री पक्ष की अनदेखी के संदर्भ में स्वयं लेखक (कैफ़ी हाशमी) के पक्ष पर भी विचार किया जाना चाहिए। कहानी के उत्तरार्द्ध में असद को उसकी खोई चाबी देनेवाली छोटी बच्ची की उपस्थिति को कैफ़ी, स्त्री पक्ष की अनुपस्थिति की आलोचना के जवाब की तरह रेखांकित करते हैं। उनका कहना है कि पुरुष पात्रों से भरी इस कहानी के उस दृश्य में कोई ‘बच्चा’ भी तो हो सकता था, लेकिन वह ‘बच्ची’ ही क्यों है? और इस तरह संकटग्रस्त समय की इस कहानी में ‘बच्ची’ यानी स्त्री की उपस्थिति को वे एक अकेली आशा की किरण की तरह देखने का आग्रह करते हैं। प्रथम दृष्टि में यह तर्क प्रभावित भी करता है। लेकिन जैसे ही आप कहानी के यथार्थ और उसके दावे के बरक्स इस तर्क को रखते हैं तो यह प्रश्न खड़ा हो जाता है कि समय के संकट को पूरी तरह स्त्रियों से विलग करके देखना और उसकी भरपाई में एक बच्ची की सांकेतिक उपस्थिति की रचना करना क्या पर्याप्त है? वह भी तब, जब खुद कहानी उस बच्ची की वास्तविक उपस्थिति को लेकर सशंकित है और उसमें किसी फ़रिश्ते की संभावाना को रेखांकित कर रही है। लेखक के उत्तर से यह स्पष्ट है कि उन्होंने सचेत रूप से बच्ची को एक सांकेतिक स्त्री-उपस्थिति के रूप में निर्मित किया है। ऐसे में यह प्रश्न तब भी बना रह जाता है कि यदि स्त्री, जीवन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है, तो उसके अनुभव, उसकी आशंकाएँ, उसकी स्मृतियाँ और उसके संघर्ष पूरी कहानी में क्यों अनुपस्थित हैं? ये प्रश्न लेखक या कहानी को स्त्री विरोधी नहीं साबित करते बल्कि पुरुष दृष्टि की उस सीमा की तरफ जरूर संकेत करते हैं, जो यथार्थ में तो स्त्री की उपस्थिति का कोई संज्ञान नहीं लेती पर उसकी सांकेतिक और अलौकिक उपस्थिति की कल्पना से स्त्री पक्ष के उद्घाटन और स्त्री सशक्तिकरण की संभावनाओं की भरपाई करना चाहती है। यहाँ जेरार्ड जेनेट की paratext की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। paratext के लिए हिन्दी में कोई पारिभाषिक शब्द है या नहीं मुझे नहीं मालूम। फिलहाल इसे ‘पाठ-परितंत्र’ कह लेता हूँ। पाठ-परितंत्र (paratext) की अवधारणा को प्रतिपादित करत हुए जेरार्ड जेनेट कहते हैं कि किसी रचना का अर्थ केवल मुख्य पाठ में निहित नहीं होता, बल्कि उसके बाहर के तत्व जैसे शीर्षक, प्रस्तावना, भूमिका, समर्पण, लेखकीय नोट्स आदि भी रचना के अर्थ निर्धारण में सहायक होते हैं। ‘चाबी’ में बच्ची की सांकेतिक उपस्थिति, स्त्री की प्रतीकात्मक प्रतिष्ठा तो करती है, लेकिन इससे कहानी में स्त्री की सामाजिक और अनुभवगत अनुपस्थिति की भरपाई नहीं की जा सकती। बल्कि पाठ-परितंत्र (paratext) की अवधारणा के आलोक में लेखक का स्पष्टीकरण इस तथ्य को और स्पष्ट कर देता है कि कहानी अपने समय के संकट की व्याख्या करते हुए स्त्री को सक्रिय एजेंसी की तरह नहीं देखती और उसे एक धार्मिक संकेत में सीमित कर देती है।

यह कहानी भय को जीवन के एक निर्णायक भाव की तरह देखती है। इसीलिए इसे केवल सामाजिक या राजनीतिक कहानी की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इसे भय और मृत्यु की मनोवैज्ञानिक संरचना की कहानी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

फ्रायड का मानना था कि मनुष्य के भीतर जीवन-संरक्षण की प्रवृत्ति के साथ-साथ एक ऐसी अचेतन प्रवृत्ति भी सक्रिय रहती है, जो उसे विनाश, जड़ता और अंत की ओर खींचती है। चाबी में असद का चरित्र कई बार इसी द्वंद्व से संचालित दिखाई देता है। वह जीवन बचाने के लिए भागता है, ऋण चुकाने की कोशिश करता है, नौकरी खोजता है, लेकिन साथ ही उसके भीतर लगातार मृत्यु की आशंका भी सक्रिय रहती है। 36 वर्ष की उम्र में पिता और दादा की मृत्य की स्मृति उसके भीतर मृत्युबोध की तरह हर वक्त उपस्थित है। यही कारण है कि कहानी में वर्णित बाहरी संसार धीरे-धीरे मृत्यु की अचेतन कल्पनाओं का विस्तार बन जाता है। असद का वास्तविक खतरों से कहीं अधिक, अपने भीतर सक्रिय मृत्यु-बोध से आतंकित होना भी इसी बात की तरफ इशारा करता है। ऐसे में, इस कहानी को ‘टेरर मैनेजमेंट थ्योरी’ के आलोक में भी पढ़ा जा सकता है। 1980 के दशक में तीन अमेरिकी सामाजिक मनोवैज्ञानिकों- जेफ़ ग्रीनबर्ग, शेल्डन सोलोमन और टॉम पिश्चिन्स्की ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए यह कहा था कि मनुष्य मृत्युबोध से उत्पन्न आतंक को नियंत्रित करने के लिए सांस्कृतिक विश्वासों, सामाजिक पहचानों और प्रतीकात्मक संरचनाओं का निर्माण करता है। ‘चाबी’ में अमानुल्लाह, सनाउल्लाह और असद तीनों अलग-अलग ऐतिहासिक क्षणों में ऐसी ही संरचनाओं पर निर्भर हैं। लेकिन हर बार वे संरचनाएँ विफल हो जाती हैं। विभाजन के समय समुदाय सुरक्षा नहीं दे पाता। 1984 में नागरिकता सुरक्षा नहीं दे पाती। समकालीन समय में नौकरी, बैंकिंग व्यवस्था और निजी संपत्ति सुरक्षा नहीं दे पाते। परिणामतः व्यक्ति स्वयं को लगातार असुरक्षित अनुभव करता है। कहानी का भय इसी विफलता से जन्म लेता है कि जिन संस्थाओं पर मनुष्य भरोसा करता है, वे उसे अंतिम सुरक्षा देने में असमर्थ सिद्ध होती हैं। तो क्या यही कारण है कि कहानी अंत में धार्मिक प्रतीकात्मकता की ओर संकेत करती है?

कहानी में अमानुल्लाह का भय सनाउल्लाह तक पहुँचता है और सनाउल्लाह का भय असद तक। यद्यपि कहानी इन अलग-अलग भयों के भावनात्मक प्रभाव को एक दूसरे से जोड़ती है, पर इस क्रम में इस बात पर विचार नहीं करती कि इन भयों के सामाजिक कारण क्या हैं? कहानी भय की निरन्तरता को एक स्थाई मनोवैज्ञानिक त्रासदी या ‘ट्रांसजेनरेशनल ट्रॉमा’ के रूप में रेखांकित करना चाहती है। ऐसा करते हुए कहानी में भय की मनोवैज्ञानिक संरचना तो अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित हो जाती है, लेकिन भय के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल नहीं हो पाती। यहाँ एक प्रश्न सहज ही उठता है कि क्या विभाजन का भय, हिंसा का भय और ऋण-संकट का भय एक ही तरह के भय हैं या इनके बीच कोई अंतर भी है? हर भय एक जैसा नहीं होता। किसी भीड़ द्वारा जिंदा जला दिए जाने का भय और होम लोन की किश्त न चुका पाने का भय दोनों गंभीर हो सकते हैं, लेकिन वे समान प्रकृति के अनुभव नहीं हैं। उनके सामाजिक कारण, राजनीतिक संदर्भ और नैतिक अर्थ अलग-अलग हैं। कहानी अपने आरंभिक हिस्से में वर्तमान समय के सांप्रदायिक संकटों की तरफ एक सूक्ष्म इशारा करती है। 1948 और 1984 के किस्सों से गुजरते हुए एक बार लगता है कि कहानी आगे चलकर शायद आज के उन संकटों से कोई तारतम्य कायम करेगी। लेकिन कहानी में ऐसा कुछ नहीं होता और कहानी अपनी आरंभिक घोषणा के अनुरूप पूरी तरह आर्थिक संकटों पर केंद्रित रहती है। इसके राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक निहितार्थों पर अलग से विचार किया जा सकता है।

भय की अनुभूति का आख्यान रचते हुए भय की भिन्न प्रकृतियों के बीच अंतर न कर पाना चाबी की एक बडी सीमा है। यही कारण है कि महत्त्वपूर्ण होते हुए भी विभाजन और 1984 की हिंसा के किस्से कहानी के मूल सरोकारों के साथ सम्बद्ध नहीं दिखते। असद की स्थिति ऐसी क्यों है? वह किन सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से होकर इस स्थिति तक पहुँचा है? कहानी भय को इस कदर एक स्वयंसिद्ध तथ्य मानकर चलती है कि उसे इन प्रश्नों की गहराई में जाने का ध्यान ही नहीं रहता। पाठक जानता है कि असद ऋणों के जाल में फँसा हुआ है, वह नौकरी खो चुका है, ईएमआई नहीं भर पा रहा, रिकवरी एजेंटों से भयभीत है। लेकिन यह सब जान लेने के बाद भी असद का जीवन उसके समक्ष लगभग अपारदर्शी बना रहता है। जीवनानुभाव से ज्यादा जब कहानी पूर्वसिद्ध निष्कर्षों से संचालित होने लगे तो ऐसी ही स्थितियाँ बनती हैं।

“हमारे समय का अभिशाप कई प्रेम-संबंधों का होना नहीं है बल्कि कई सारे लोन का होना है. यह आपको अंदर तक तोड़ देता है.”

यह कहानी का पहला वाक्य है, इसे चाबी के केन्द्रीय दावे का उद्घोष भी कह सकते हैं। उस लिहाज से यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि ऋण-संकट ही कहानी का केंद्रीय विषय है, तो यह जानना भी आवश्यक था कि असद को ऋण लेने के लिए विवश करने वाली सामाजिक-आर्थिक शक्तियाँ क्या थीं? क्या वह केवल उपभोक्तावाद का शिकार है? या मध्यवर्गीय सफलता का दबाव भी उस पर काम कर रहा था? क्या घर खरीदने की आकांक्षा उसके वर्गीय उन्नयन की इच्छा से जुड़ी थी? क्या पारिवारिक असुरक्षा उसे संपत्ति अर्जित करने की ओर धकेल रही थी? क्या उसके जीवन में ऐसी कोई भावनात्मक रिक्तता थी जिसे वह उपभोग और स्वामित्व के माध्यम से भरना चाहता था? कहानी इन प्रश्नों पर लगभग मौन है। ऐसे में कहानी असद के प्रति सहानुभूति तो उत्पन्न करती है, लेकिन उसके प्रति गहरी समझ विकसित नहीं कर पाती। पाठक उसके लिए दुखी हो सकता है, पर उसे पूरी तरह जान नहीं पाता। यह अंतर सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण है। सहानुभूति भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जबकि समझ चरित्र की आंतरिक संरचना तक पहुँचने से पैदा होती है। ‘चाबी’ पाठकों के मन में असद के लिए सहानुभूति तो अर्जित करती है, लेकिन उसकी आंतरिक संरचना तक पहुँचने का रास्ता नहीं बनाती। यही कारण है कि कहानी में परकाया-प्रवेश की कमी खटकती है। ऐसा हुआ होता तो असद और रिकवरी एजेंट प्रतिपक्षी की तरह नहीं बल्कि एक ही व्यवस्था के शिकार की तरह सामने आते, जो कॉरपोरेटीकृत समय के हाशिये के साझा नागरिक हैं।

चाबी को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक अपने समय की लगभग हर महत्वपूर्ण बेचैनी को कथा के भीतर दर्ज कर लेना चाहता है। ऋण और ईएमआई का संकट, बेरोज़गारी, ऐप-आधारित जीवन, शहरी अकेलापन, उपभोक्तावाद, सोशल मीडिया संस्कृति, सांप्रदायिक तनाव, विभाजन की स्मृति, 1984 का नरसंहार, मध्यवर्गीय असुरक्षा, पुरुष जीवन का दबाव, शेयर बाज़ार, गिग इकॉनॉमी, तकनीक और मानवीय संबंधों का विघटन- ये सब कहानी में उपस्थित हैं।

“सोशल मीडिया ने सबको एक्सपोज़ कर दिया है सर. यह इस बात का सबूत है कि हमारे देश में कितनी ग़रीबी है और लोग अपनी ग़रीबी से कितना फेड-अप हो चुके हैं. कोई अपने बाप को नचवा रहा है कोई अपनी बीवी के साथ गंदे-गंदे जोक्स पर रील बना रहा है. औरतें जानती है कि कैमरा का एंगल उनके किन अंगों पर कैसे फोकस करे कि ज़्यादा व्यूज़ आएँ. कोई कीचड़ खा रहा है. कोई चम्मच से दीवार खोद रहा है. यह सब किस लिए. क्योंकि सब वायरल होना चाहते हैं. चाहते हैं कि बस कैसे भी फेम मिल जाए. कॉलैब करें और पैसा आने लगे.”

तुम्हारी बातें सुनकर वह बूढ़ा आदमी संतुष्ट नहीं हुआ और अपने पालतू कुत्ते की गले से बंधे चैन को कस के पकड़ कर कहना लगा, “नो-नो, रियल प्रॉब्लम इज़ नोट पॉवर्टी, रियल प्रॉब्लम्स आर पॉपुलेशन और रिजर्वेशन माय फ्रेंड. तुम आजकल की जनरेशन समझती नहीं है लेकिन एक बार यूनिफोर्म सिविल कोड आ गया न फिर कंट्री देखो कैसे बुलेट ट्रेन की तरह भागेगी.”

ऊपर उद्धृत अंश में सोशल मीडिया पर वायरल संस्कृति, गरीबी और प्रदर्शन का संबंध, स्त्री-देह का वस्तुकरण, जनसंख्या, आरक्षण और समान नागरिक संहिता जैसे राजनीतिक विमर्श सब एक साथ उपस्थित हैं। प्रथम दृष्टि में यह कहानी की शक्ति लगती है। लेखक अपने समय के प्रति सजग है, उसकी दृष्टि बहुआयामी है, वह केवल एक निजी संकट की कथा नहीं लिख रहा बल्कि उस संकट को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखना चाहता है। लेकिन कहानी का संकट यह है कि वह इन सारी चिंताओं को अनुभव की तरह नहीं उकेर पाती। कहानी का दायरा जितना फैलता जाता है, उसकी ऊर्जा उतनी ही विभिन्न दिशाओं में विभाजित होने लगती है। परिणामस्वरूप कहानी अपने समय के प्रश्नों को खोलती नहीं, केवल छूकर आगे बढ़ जाती है। यहीं मुझे लगता है कि चाबी की संरचना में क्षैतिज विस्तार और ऊर्ध्वाधर गहराई के बीच असंतुलन पैदा होता है।

कहानी का केंद्रीय संकट ऋण है। लेकिन उसके साथ-साथ सोशल मीडिया, सांप्रदायिकता, तकनीक, उपभोक्तावाद और राजनीतिक विमर्श भी जुड़ जाते हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या ये सभी संकट वास्तव में असद की कहानी के लिए आवश्यक हैं, या वे केवल लेखक की वैचारिक बेचैनियों की उपस्थिति दर्ज कराते हैं? कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक के पास कहने के लिए इतना कुछ है कि वह किसी भी विचार को छोड़ना नहीं चाहता। परिणामतः कहानी एक ऐसे मंच में बदल जाती है जहाँ समय की अनेक समस्याएँ उपस्थित हैं, लेकिन उनके बीच का संबंध स्पष्ट नहीं है।

महान उपन्यास और लंबी कहानियाँ अक्सर अनेक विषयों को एक साथ समेटती हैं। इसलिए बहुस्तरीयता स्वयं में कोई दोष नहीं है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब विषयों का विस्तार कृति की संरचनात्मक क्षमता से बाहर चला जाता है। तब वे कथा के जैविक अंग न रहकर संकेतों और टिप्पणियों के रूप में उपस्थित होने लगते हैं। ‘चाबी’ में कई स्थानों पर यही स्थिति दिखाई देती है। लेखक का वैचारिक क्षितिज बहुत व्यापक है, उसके पास एक समृद्ध भाषा भी है, लेकिन कहानी का संरचनात्मक दायरा अपेक्षाकृत सीमित है। कहानी की उपलब्धि यह है कि वह हमारे समय की जटिलता को पहचानती है। वह जानती है कि आज का संकट केवल आर्थिक, केवल राजनैतिक या केवल मनोवैज्ञानिक नहीं। ये सभी परस्पर जुड़े हुए संकट हैं। लेकिन उसकी सीमा यह है कि वह इस जटिलता को कथा के भीतर पूरी तरह व्यवस्थित नहीं कर पाती। यदि इसे एक रूपक में कहें, तो चाबी एक ऐसी कहानी है जो अपने समय के पूरे आकाश को उनके तमाम पिंडों सहित एक ही कैनवास पर चित्रित करना चाहती है। परिणामस्वरूप चित्र अत्यंत समृद्ध और जीवंत बनता है, पर दर्शक की दृष्टि किसी एक तत्व पर देर तक ठहर नहीं पाती।

‘चाबी’ पर केंद्रित यह आलेख कहानी और कहानीकार के महत्व को कम आँकने के लिए नहीं, बल्कि समय और कहानी के उन संकटों-संभावनाओं के विश्लेषण की कोशिश में लिखा गया है, जिनके बीज इस कहानी में निहित हैं। यहाँ कहानी का अंतिम वाक्य, जो मेरी दृष्टि में कहानी का सबसे खूबसूरत वाक्य है, जरूर उद्धृत किया जाना चाहिए-

“तुम्हारी उँगलियाँ खुरदरी सड़क पर चाबी तलाश रही हैं।”

आज के संकटपूर्ण समय में कैफ़ी हाशमी इस कहानी के माध्यम से खुरदरी सड़क पर चाबी ही तो तलाश रहे हैं।

कथा प्रांतर सीरीज के बाकी के हिस्से पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं


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राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – [email protected]
राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – [email protected]
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1 COMMENT

  1. राकेश बिहारी की समीक्षा में कैफ़ी हाशमी की कहानी ‘चाबी’ को एक महत्वाकांक्षी, बहुस्तरीय और विचारोत्तेजक रचना के रूप में देखा गया है, जो समकालीन शहरी मध्यवर्गीय जीवन के भय, ऋणग्रस्तता, अकेलेपन और सांप्रदायिक स्मृतियों को एक साथ समेटने का प्रयास करती है। समीक्षक का मानना है कि कहानी अपने सामाजिक यथार्थ, द्वितीय पुरुष कथन-शैली और भय की मनोवैज्ञानिक संरचना के कारण प्रभावशाली बनती है, किंतु इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि ठोस आर्थिक-सामाजिक संकट को अंततः रहस्यात्मक और धार्मिक प्रतीकों में रूपांतरित कर दिया जाता है, जिससे अर्जित यथार्थ कुछ धुँधला पड़ जाता है। जिगरी, मित्तर और रहस्यमयी बच्ची जैसे पात्रों का प्रतीकात्मक रूपांतरण कथा में कलात्मक द्वंद्व पैदा करता है। साथ ही समीक्षा यह भी रेखांकित करती है कि कहानी व्यापक सामाजिक संकट का दावा करती हुई भी मुख्यतः पुरुष अनुभवों तक सीमित रह जाती है और स्त्री दृष्टि लगभग अनुपस्थित है। इस प्रकार ‘चाबी’ अपनी कलात्मक महत्त्वाकांक्षा, संरचनात्मक नवीनता और समकालीन बेचैनी के चित्रण के बावजूद विस्तार और गहराई के बीच पूर्ण संतुलन स्थापित नहीं कर पाती।

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