वॉशिंगटन: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए व्यापार समझौते का स्वागत करते हुए क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को औपचारिक रूप देने पर सहमति जताई है। वॉशिंगटन में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर चर्चा की।
यह बैठक राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारत पर लगे पारस्परिक टैरिफ को 25% से घटाकर 18% करने की घोषणा के ठीक एक दिन बाद हुई है। विदेश मंत्री जयशंकर ने इस कटौती को ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन बताया है।
वॉशिंगटन में जयशंकर ने न केवल मार्को रुबियो, बल्कि ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के साथ भी लंबी चर्चा की। इन वार्ताओं का मुख्य उद्देश्य रविवार को हुए राजनीतिक समझौते को धरातल पर उतारने के लिए नीतियों को अंतिम रूप देना था। अधिकारियों के अनुसार, टैरिफ में इस कमी से भारतीय विनिर्माण, फार्मास्यूटिकल्स और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में बड़ी बढ़त मिलेगी।
बातचीत के केंद्र में रहा क्रिटिकल मिनरल्स
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (महत्वपूर्ण खनिजों) पर सहयोग बढ़ाना रहा। अमेरिका बुधवार को पहली ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ बैठक की मेजबानी कर रहा है, जिसमें जयशंकर भी शामिल होंगे। दोनों देशों ने खनिजों की खोज और प्रसंस्करण में साझेदारी को औपचारिक ढांचा देने पर चर्चा की।
इस रणनीतिक कदम का उद्देश्य रक्षा निर्माण, उन्नत तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करना और इस क्षेत्र में चीन के एकाधिकार को कम करना है। अमेरिकी आंतरिक सचिव डौग बर्गम के अनुसार, लगभग 50 देश इस आपूर्ति शृंखला को विविधता देने के प्रयासों में शामिल हो रहे हैं।
क्वाड और क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रतिबद्धता
विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट द्वारा जारी रीडआउट के अनुसार, जयशंकर और रुबियो ने ‘क्वाड’ (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने स्वीकार किया कि एक समृद्ध और सुरक्षित ‘इंडो-पैसिफिक’ क्षेत्र दोनों देशों के साझा हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जयशंकर ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि इस वार्ता में व्यापार, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, रक्षा और तकनीक जैसे रणनीतिक स्तंभों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

