न्यूयॉर्क: स्वीडन और अमेरिका की टीमों द्वारा किए गए एक प्रमुख शोध से अब इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिल रहे हैं कि स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय बच्चों की एकाग्रता को कैसे प्रभावित करते हैं। शोध के नतीजे एक विशेष पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं। शोध में ये सामने आया है कि वीडियो गेम या टेलीविजन पर बिताया गया समय एकाग्रता को उस प्रकार से प्रभावित नहीं करता, जिससे इसे सही से मापा जा सके, लेकिन ये साफ हुआ है कि सोशल मीडिया का उपयोग धीरे-धीरे बच्चे की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कम कर सकता है।
अमेरिका में एडॉलेसेंट ब्रेन एंड कॉग्निटिव डेवलपमेंट (ABCD) के कई सीरीज में किए गए अध्ययन में बचपने के अंतिम चरण से लेकर किशोरावस्था के शुरुआती चरण तक के 8,300 से अधिक बच्चों को शामिल किया गया। दिलचस्प है कि हाल ही में पीडियाट्रिक्स ओपन साइंस में प्रकाशित ये निष्कर्ष सोशल मीडिया की आदतों और ध्यान न देने के लक्षणों के बीच एक सतत संबंध की पहचान करते हैं।
बच्चों में डिजिटल आदतों का अध्ययन
शोध टीमों ने शोध की शुरुआत में नौ या दस साल के बच्चों पर नजर रखी और इस बारे में विस्तृत वार्षिक जानकारी एकत्र की कि उन्होंने विभिन्न प्रकार के डिजिटल मीडिया पर कितना समय बिताया और उम्र बढ़ने के साथ उनके व्यवहार में कैसे बदलाव आया।
बच्चों ने खुद डेली स्क्रीन यूज के बारे में जानकारी दी। इसमें सोशल मीडिया, टेलीविजन या ऑनलाइन वीडियो और वीडियो गेम सहित अपने रोजमर्रा के काम आदि के लिए स्क्रीन इस्तेमाल शामिल थे।
इस बीच माता-पिता ने व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त बाल व्यवहार जाँच सूची का उपयोग करके एकाग्रता संबंधी और आवेगी प्रवृत्ति संबंधी व्यवहारों का मूल्यांकन किया। अध्ययन में शामिल किए गए 8,324 बच्चों में लड़के और लड़कियों की लगभग समान संख्या थी और औसत प्रारंभिक आयु लगभग 9.9 वर्ष थी।
औसतन, ये बच्चे प्रतिदिन लगभग 2.3 घंटे टेलीविजन या ऑनलाइन वीडियो देखने में, लगभग 1.5 घंटे वीडियो गेम खेलने में और लगभग 1.4 घंटे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने में बिताते हैं।
इन प्लेटफॉर्म में इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक, फेसबुक, ट्विटर और मैसेजिंग सर्विस शामिल थीं जो तत्काल बातचीत, शेयरिंग और फीडबैक के लिए इस्तेमाल होती हैं। शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या ये विभिन्न डिजिटल गतिविधियाँ एकाग्रता या अतिसक्रियता में किसी दीर्घकालिक परिवर्तन से जुड़ी हैं। उन्होंने इस स्टडी में हर बच्चे के लिए सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और आनुवंशिक प्रवृत्ति को भी ध्यान में रखा।
4 साल चला शोध, सोशल मीडिया का असर हैरान करने वाला…
शोध के तहत चार साल की निगरानी के दौरान सबसे स्पष्ट पैटर्न सोशल मीडिया के उपयोग और ध्यान न देने की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच संबंध का रहा। अध्ययनों में लगातार पाया गया कि जिन बच्चों ने सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताया, उनमें समय के साथ ध्यान देने की कठिनाइयों में लगातार वृद्धि देखी गई।
यह संबंध वीडियो गेम के उपयोग या टेलीविजन या ऑनलाइन वीडियो देखने में बिताए गए समय के लिए नहीं पाया गया। शोध से आए नतीजों के विश्लेषण बताते है कि कि सोशल मीडिया का उपयोग एकाग्रता कम होने के लक्षणों से जुड़ा था, और बच्चों के बड़े होने के साथ-साथ यह और मजबूत होता गया।
शोध इस बात पर भी जोर देता है कि हालाँकि मापा गया प्रभाव किसी एक बच्चे के लिए सीमित हो सकता है, पर सामूहिक व्यवहार परिवर्तनों के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं। खासकर पिछले एक दशक में युवा किशोरों के बीच सोशल मीडिया के संपर्क में तेज वृद्धि को देखते हुए यह असर अलग-अलग हो सकता है।
वैसे, शोध टीमों को इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं मिला कि जिन बच्चों को पहले से ही एकाग्रता में कठिनाई होती थी, उनमें बाद में सोशल मीडिया का अधिक उपयोग करने की संभावना ज्यादा थी।
सोशल मीडिया एकाग्रता को क्यों प्रभावित करता है?
अध्ययन पर काम करने वाले विशेषज्ञों ने इस बात की भी व्याख्या की कि केवल सोशल मीडिया ही इस तरह से ध्यान क्यों प्रभावित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की बनावट, नियमित और लगातार जुड़ाव और सूचनाओं, संदेशों और अपडेट को लगातार देखने की प्रवृत्ति मूल रूप से एकाग्रता को प्रभावित करती है। ये चीजें बच्चे के मस्तिष्क को निरंतर बदलाव की अपेक्षा करने के लिए ट्रेन कर सकती हैं, जिससे लंबे समय तक ध्यान देने वाले कार्यों के दौरान एकाग्रता बनाए रखने की क्षमता कम हो जाती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्ययन में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल से अतिसक्रियता या आवेगशीलता बढ़ी है। इस प्रोजेक्ट के पीछे के शोधकर्ताओं ने इसे भी लेकर आगाह किया कि इन परिणामों को इस तरह नहीं लेना चाहिए सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले प्रत्येक बच्चे को एकाग्रता में कठिनाई का अनुभव होगा।

