नई दिल्ली: पिछले कुछ सालों में भारत में सर्दियों के ज्यादा गर्म महसूस करने और बेहद कम समय तक ठंड पड़ने जैसे अनुभव सामने आते रहे हैं। सर्दियां पहले के मुकाबले कम हो रही हैं और अचानक कुछ दिनों के लिए आती हैं। मौसम का ये बदला हुआ पैटर्न मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ों और सघन हिमालयी क्षेत्रों में भी नजर आ रहा है। लद्दाख में इस बार की सर्दियां कुछ ऐसी ही रही, जिसने बदलते जलवायु और पर्यावरण पर नजर रखने वालों को भी हैरत में डाल दिया है।
साल 2025-26 की लद्दाख की सर्दियां असमान्य रूप से गर्म रहीं। साथ ही बर्फ गिरने का पैटर्न बहुत असंतुलित रहा। इस बदलाव ने ऊंचाई वाले क्षेत्र में मौसम क पैटर्न को लेकर चिंताएं बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में लेह और कारगिल में सबसे गर्म सर्दियां दर्ज की गईं। इस बार तो तामपान सामान्य मानक से काफी ऊपर रहा।
डाउन टू अर्थ के अनुसार लद्दाख में आईएमडी की निदेशक सोनम लोटस ने बताया कि पिछले आठ सालों (2019-2026) में सर्दियों लेह का औसत तापमान -4.3 डिग्री सेल्सियस रहा है। वहीं, इस सर्दी में औसत तापमान करीब 2 डिग्री बढ़कर -2.3 डिग्री सेल्सियस हो गया। इस तरह इस अवधि में यह लेह की सबसे गर्म सर्दी थी।
लेह के अलावा कारगिल में भी इसी तरह का पैटर्न दिखा। पिछले 14 वर्षों में कारगिल का औसत शीतकालीन तापमान -4.9 डिग्री सेल्सियस रहा है। इस सर्दी में यह बढ़कर -1.4 डिग्री सेल्सियस हो गया, जो सामान्य से लगभग 3.5 डिग्री सेल्सियस अधिक है। इस तरह यह 2012 से 2026 के बीच कारगिल की सबसे गर्म सर्दी बन गई।
कहीं बहुत ज्यादा, कहीं कम…बर्फबारी में असंतुलन
आंकड़े बता रहे हैं कि बदलते साल के साथ हिमपात का पैटर्न भी काफी अनियमित होता जा रहा है। लद्दाख में सर्दी का मौसम आमतौर पर दिसंबर से फरवरी तक रहता है। पिछले 14 सालों में लेह में औसतन 15.3 सेंटीमीटर हिमपात हुआ है। हालांकि, इस वर्ष के आंकड़े और हैरान करने वाले हैं। इस साल क्षेत्र में केवल 4.2 सेंटीमीटर (जनवरी में 3.3 सेंटीमीटर और फरवरी में 0.9 सेंटीमीटर) हिमपात हुआ।
यह औसत हिमपात का महज 27.7 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में कहें तो हिमपात में 72 प्रतिशत की कमी रही। इसके उलट कारगिल में सामान्य से अधिक हिमपात हुआ। पिछले सात सालों में यहां सर्दियों में हिमपात लगभग 17 सेंटीमीटर रहा है, लेकिन इस सर्दी में यह 42.2 सेंटीमीटर तक पहुंच गया, जो औसत से करीब 248 प्रतिशत अधिक है। इसमें भी ज्यादातर हिमपात जनवरी में हुआ, जबकि फरवरी में केवल लगभग 2 सेंटीमीटर हिमपात हुआ।
लद्दाख क्षेत्र के लिए ऐसा असंतुलन आने वाले दिनों कई चुनौतियों को बढ़ा सकता है। लद्दाख एक शुष्क क्षेत्र या पर्वतीय शीत रेगिस्तान की तरह है। ऐसे में सिंचाई, पेयजल, कृषि और बागवानी के लिए सर्दियों में यहां बर्फबारी बहुत जरूरी हो जाता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के लिहाज से पर्वतीय क्षेत्र सबसे संवेदनशील माने जाते हैं। ये भी है कि केवल एक साल के आंकड़े से किसी नतीजे तक पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन इसने चिंताएं जरूर बढ़ा दी है।
खेती से लेकर जानवरों तक पर असर
लद्दाख जैसे क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में मौसम के पैटर्न में बदलाव का असर बहुत हद तक नजर भी आने लगा है। इसमें खेती से लेकर कीटों के बढ़ते प्रकोप और जंगली जानवरों के व्यवहार में दिखता बदलाव शामिल है। उदाहरण के तौर पर कम सर्दियों की वजह से एप्रिकॉट, सेब और चेरी जैसे फल, जो पारंपरिक रूप से निचले इलाकों में उगाए जाते थे, अब ऊंचे क्षेत्रों में भी उगाए जाने लगे हैं। इस बदलाव की एक बड़ी वजह सर्दियों के तापमान में हो रहा परिवर्तन है।
ऐसे फलों को करीब 500 से 1500 घंटे के लिए 0 से 7 डिग्री सेल्सियस के बीच ठंडे तापमान की जरूरत होती है, जिसे ‘चिलिंग आवर्स’ कहा जाता है। पहले सर्दियों में यह जरूरत पूरी हो जाती थी, लेकिन अब सर्दियां अपेक्षाकृत गर्म होने से नीचले इलाकों में यह समय हमेशा नहीं मिल पाता। जब चिलिंग आवर्स पूरे नहीं होते, तो पेड़ों की वृद्धि प्रक्रिया प्रभावित होती है।
इसके अलावा हल्की सर्दियों के कारण इस क्षेत्र में कीटों की स्थिति में भी बदलाव आ रहा है। लद्दाख की पारंपरिक रूप से कठोर सर्दियाँ पहले कीटों की आबादी को नियंत्रण में रखती थीं। जब सर्दियाँ हल्की हो जाती हैं, तो कीड़े जल्दी निकलने लगे हैं और उनके जैविक चक्र में बदलाव आ रहा है है। एक तरह से कीटों की आबादी में वृद्धि हो रही है। इसकी शिकायत स्थानीय किसान भी करते हैं।
लगभग हर दूसरे दिन, किसान अपनी फसलों को प्रभावित करने वाले विभिन्न कीटों के बारे में रिपोर्ट कर रहे हैं। अहम ये भी है कि इनमें से अधिकांश कीट पूरी तरह से नए नहीं हैं, लेकिन गर्म मौसम के कारण वे तेजी से बढ़ रहे हैं और अधिक तेजी से फैल रहे हैं। इसका एक उदाहरण 2016 में लेह में एप्रिकॉट के पत्तों को खाने वाले कीट का प्रकोप सामने आया था, जिससे भारी नुकसान हुआ था।
इन सबके अलावा हिम तेंदुओं और जंगली याक जैसी प्रजातियां, जो बेहद ठंडे तापमान के अनुकूल विकसित हुई हैं, उनके लिए बदलता मौसम नई चुनौती लेकर आ रहा है। जानकार मानते हैं कि तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी इनके लिए समस्या पैदा कर सकती है।
बढ़ते तापमान से व्यापक पारिस्थितिक परिवर्तन भी हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में ग्लेशियरों का पिघलना तेज हो रहा है, जिससे हिमनदी झीलों का निर्माण हो रहा है, जो आखिरकर टूटकर पर्वतीय घाटियों में बाढ़ का कारण बन सकती हैं।
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