Wednesday, April 8, 2026
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ट्रंप की ईरानी सभ्यता मिटाने की धमकी, क्या यह ‘नरसंहार और युद्ध अपराध’ की श्रेणी में है? क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?

ट्रंप की धमकी के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। कनाडा और बेल्जियम के शीर्ष नेतृत्व ने साफ किया है कि युद्ध के दौरान नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सीधा उल्लंघन भी है।

एक महीने से ज्यादा समय से चल रहे अमेरिका, इजराइल-ईरान संघर्ष में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को कई बार डेडलाइन दी। इस बार ट्रंप की धमकी थोड़ी ज्यादा सख्त नजर आई। उन्होंने ट्रुथ पोस्ट में लिखा कि अगर आज रात 8 (भारतीय समयानुसार सुबह 5 बजे) बजे तक संतोषजनक समझौता नहीं हुआ, तो एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि चार घंटे के भीतर देश के हर पुल और पावर प्लांट को “तबाह” कर दिया जाएगा। हालांकि यह भी कहा कि मैं नहीं चाहता कि ऐसा हो, लेकिन शायद हो जाए।

ट्रंप द्वारा दी गई ‘पूरी सभ्यता को खत्म करने’ की धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के नजरिए से अत्यंत गंभीर मानी जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह धमकी कई अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत ‘अपराध’ की श्रेणी में आ सकती है या कम से कम एक गंभीर उल्लंघन मानी जा सकती है।

क्या नागरिक बुनियादी ढांचों पर हमला ‘युद्ध अपराध’ है, क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?

ट्रंप की इस सभ्यता खत्म करने वाली भाषा पर अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताई है। रॉयटर्स से बात करते हुए ‘इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप’ के वरिष्ठ सलाहकार ब्रायन फिनुकेन ने कहा कि इस तरह के बयान को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ‘नरसंहार’ की धमकी के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि 1949 के जेनेवा कन्वेंशन नागरिक आबादी के लिए अनिवार्य बुनियादी ढांचों पर हमले को युद्ध अपराध मानते हैं।

युद्ध के दौरान मानवीय आचरण को विनियमित करने वाले 1949 के जेनेवा कन्वेंशन उन संपत्तियों पर हमले को पूरी तरह वर्जित करते हैं जो नागरिक आबादी के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं। कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि ऐसी किसी भी कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जा सकती जिससे आम जनता के पास भोजन या पानी की इतनी कमी हो जाए कि वे भुखमरी का शिकार हों या उन्हें जबरन पलायन करना पड़े। इसमें खाद्य सामग्री, कृषि क्षेत्र, फसलें, पशुधन और पीने के पानी की आपूर्ति प्रणालियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है और इन्हें निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने पहले भी कई संघर्षों में नागरिक बुनियादी ढांचों पर हमलों को लेकर कड़े कदम उठाए हैं। बता दें कि जुलाई 2024 में, आईसीसी ने रूस के पूर्व रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु और जनरल वैलेरी गेरासिमोव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे, क्योंकि उन पर सर्दियों के दौरान यूक्रेन के बिजली ग्रिड को जानबूझकर निशाना बनाने का आरोप था।

इसी तरह, इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ वारंट जारी करते हुए अदालत ने पाया था कि गाजा की नागरिक आबादी को भोजन, पानी और बिजली जैसे अस्तित्व के अनिवार्य साधनों से वंचित करना मानवता के खिलाफ अपराध है, जिससे बच्चों सहित कई निर्दोषों की जान गई।

ये भी पढ़ेंः ट्रंप की धमकी के बीच ईरान में भारतीयों के लिए दूतावास ने जारी किया 48 घंटे का ‘शेल्टर-इन-प्लेस’ अलर्ट

क्या ये ‘सैन्य लक्ष्य’ हो सकते हैं, सजा कहां और कैसे मिल सकती है?

जेनेवा कन्वेंशन और रोम स्टैच्यू के अनुसार, युद्ध में शामिल पक्षों के लिए यह अनिवार्य है कि वे ‘नागरिक संपत्तियों’ और ‘सैन्य लक्ष्यों’ के बीच स्पष्ट अंतर करें। किसी भी नागरिक बुनियादी ढांचे को केवल तब सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है जब वह सैन्य कार्रवाई में प्रभावी योगदान दे रहा हो और उसे नष्ट करने से सेना को कोई निश्चित और बड़ा रणनीतिक लाभ मिलता हो। केवल जनता का मनोबल तोड़ने या उन्हें सजा देने के उद्देश्य से बिजली या पानी की आपूर्ति काटना कानूनी तौर पर अपराध की श्रेणी में आता है, भले ही इसके पीछे कोई भी तर्क दिया जाए।

पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में युद्ध अपराधों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता काफी जटिल और चुनौतीपूर्ण है। इसका मुख्य कारण यह है कि ईरान, इजराइल और अधिकांश खाड़ी देश आईसीसी के सदस्य नहीं हैं। वहीं, अमेरिका व चीन जैसी महाशक्तियां भी इस अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास मामलों को ‘द हेग’ भेजने की शक्ति है, लेकिन परिषद के भीतर देशों के बीच गहरे मतभेद और वीटो पावर के इस्तेमाल की संभावना किसी भी ठोस अंतरराष्ट्रीय कानूनी कार्रवाई के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

ट्रंप की धमकी पर कनाडा और बेल्जियम ने क्या कहा?

उधर ट्रंप की धमकी के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। कनाडा और बेल्जियम के शीर्ष नेतृत्व ने साफ किया है कि युद्ध के दौरान नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सीधा उल्लंघन भी है। इन देशों ने सभी पक्षों से संयम बरतने और युद्ध के नियमों का पालन करने की पुरजोर अपील की है।

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मीडिया से बातचीत करते हुए सभी पक्षों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करने की याद दिलाई। उन्होंने जोर देकर कहा कि कनाडा यह उम्मीद करता है कि इस संघर्ष, या किसी भी अन्य संघर्ष में शामिल सभी पक्ष ‘रूल्स ऑफ एंगेजमेंट’ यानी युद्ध के नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे।

प्रधानमंत्री कार्नी ने कहा कि इसका सीधा अर्थ यह है कि आम नागरिकों या नागरिक बुनियादी ढांचों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि कनाडा ने सार्वजनिक और निजी दोनों ही स्तरों पर अपनी इस चिंता से संबंधित पक्षों को अवगत करा दिया है और यह प्रत्येक देश की जिम्मेदारी है कि वे युद्ध के दौरान मानवीय सीमाओं को न लांघें।

बेल्जियम के विदेश मंत्री मैक्सिम प्रेवोट ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि नागरिक बुनियादी ढांचों पर जानबूझकर किए जाने वाले हमले अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का खुला उल्लंघन हैं। प्रेवोट ने चेतावनी दी कि इस तरह की सैन्य कार्रवाइयों का एकमात्र परिणाम नागरिक आबादी के बीच बढ़ती पीड़ा और तबाही के रूप में सामने आता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि युद्धरत पक्षों को हर हाल में नागरिकों के जीवन और उनके अस्तित्व के लिए जरूरी संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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