अमेरिका के साथ जारी कूटनीतिक बातचीत के बीच ईरान ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा। साथ ही तेहरान ने यह भी संकेत दिया है कि वार्ता की सफलता केवल तभी संभव है जब दोनों पक्ष तय प्रतिबद्धताओं का ईमानदारी से पालन करें।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि अमेरिका के साथ हुए 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) में ईरान की मिसाइल क्षमता शामिल नहीं है और भविष्य में भी इसे किसी समझौते का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा।
उन्होंने कहा, ईरान की मिसाइलें न तो एमओयू में थीं और न ही कभी होंगी। ईरानी राष्ट्रपति ने देश की रक्षा क्षमताओं का बचाव करते हुए कहा कि अगर ईरान के पास अपनी सुरक्षा के लिए मिसाइलें नहीं होतीं तो इजराइल और अमेरिका उसके साथ वही व्यवहार करते जो गाजा में किया गया। उन्होंने कहा कि तब ईरान के बूढ़ों और बच्चों तक को नहीं बख्शा जाता।
समझौते में क्या है, क्या नहीं?
पेजेश्कियन की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच तकनीकी स्तर की बातचीत आगे बढ़ रही है। पिछले सप्ताह अमेरिका ने 14 सूत्रीय समझौते का पाठ सार्वजनिक किया था। इसमें होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने, ईरान पर कुछ वित्तीय प्रतिबंधों में राहत देने और उसके परमाणु कार्यक्रम पर आगे की तकनीकी वार्ताओं की रूपरेखा तय करने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सार्वजनिक किए गए दस्तावेज में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम या उसकी रक्षा क्षमताओं पर किसी प्रकार की रोक का कोई उल्लेख नहीं है। हथियारों से जुड़ी एकमात्र शर्त यह है कि ईरान परमाणु हथियारों का विकास या अधिग्रहण नहीं करेगा।
ट्रंप के बदले सुर और मिसाइलों पर विवाद
हालांकि मिसाइलों का मुद्दा अब भी अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच सबसे संवेदनशील विषयों में बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर अंकुश लगाने की वकालत करते रहे हैं, लेकिन हालिया वार्ताओं के दौरान उनका रुख कुछ नरम दिखाई दिया।
फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने कहा था कि समस्या मिसाइलें नहीं हैं। उन्होंने यह भी माना कि यदि दूसरे देशों के पास मिसाइलें हैं तो ईरान को पूरी तरह इससे वंचित रखना उचित नहीं कहा जा सकता।
एएफपी के अनुसार, ईरान ने 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान अपनी कमजोर वायु रक्षा व्यवस्था की भरपाई के लिए मिसाइल कार्यक्रम विकसित करना शुरू किया था। समय के साथ इसकी मारक क्षमता और सटीकता दोनों बढ़ती गईं। इजराइल लंबे समय से इसे अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता रहा है।
पेजेश्कियन ने मिसाइल मुद्दे पर दो टूक रुख अपनाते हुए कहा कि हम अपनी रक्षात्मक क्षमताओं पर किसी से भी, किसी भी परिस्थिति में बातचीत नहीं करेंगे।
‘वार्ता की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि…‘
मिसाइलों को लेकर सख्त संदेश देने के साथ ही ईरानी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक अलग संदेश में वार्ता प्रक्रिया की सफलता को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दोनों पक्ष जिन दायित्वों पर सहमत हुए हैं, उनका पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन करें।
उन्होंने लिखा, “प्रगति का आकलन केवल व्यावहारिक अनुपालन के आधार पर किया जाएगा। सहमत पाठ से बाहर दिए जाने वाले बयान वार्ता को आगे बढ़ाने में मदद नहीं करते।”
हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन माना जा रहा है कि उनका संकेत हाल के दिनों में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए उन बयानों की ओर था जिनमें दावा किया गया था कि ईरान परमाणु निरीक्षणों की अनुमति देने और अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने के लिए धन का उपयोग करने पर सहमत हो गया है। ईरानी अधिकारियों ने इन दावों का खंडन किया है।
गालीबाफ बोले, बातचीत भी संघर्ष का हिस्सा
इस बीच ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालीबाफ ने भी अमेरिका के साथ चल रही बातचीत को रणनीतिक संघर्ष का हिस्सा बताया। स्विट्जरलैंड से लौटते समय उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में मिली सफलता को स्थायी राजनीतिक और कानूनी उपलब्धि में बदलने के लिए कूटनीति जरूरी है।
गालीबाफ ने कहा कि बातचीत भी संघर्ष का एक तरीका है। ईरान इसे कमजोरी नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनाई गई रणनीति के रूप में देखता है। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज अब युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा और उसका प्रबंधन ईरान अपने तरीके से करेगा, हालांकि अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन जारी रहेगा।
गालीबाफ ने अमेरिका के प्रति अविश्वास दोहराते हुए कहा, “हमने कभी अमेरिकियों पर भरोसा नहीं किया, आज भी नहीं करते और भविष्य में भी सतर्क रहना ही समझदारी होगी।”
ट्रंप का दावा- ईरान ने परमाणु हथियार छोड़ने पर सहमति दी
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने पर सहमत हो गया है। उन्होंने इसे होर्मुज स्ट्रेट में तनाव कम करने के लिए हुए एक ऐतिहासिक शांति समझौते का हिस्सा बताया।
वॉशिंगटन में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे और वे इस बात पर सहमत हो गए हैं।
ट्रंप ने दावा किया कि समझौते के जरिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक होर्मुज में स्थिरता आई है। उनके अनुसार, हाल ही में इस मार्ग से 1.9 करोड़ बैरल तेल की आवाजाही हुई, जो अब तक का सबसे बड़ा प्रवाह है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर भी बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा, “हम ईरान को बिना नौसेना, बिना वायुसेना, बिना एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, बिना मिसाइल क्षमता और बिना परमाणु कार्यक्रम के छोड़ रहे हैं।”
पाकिस्तान भी आया ईरान के समर्थन में
उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी ईरान के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा कि प्रारंभिक समझौते में बैलिस्टिक मिसाइलों का कोई उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि यह दोहरा मापदंड नहीं हो सकता कि कुछ देशों को मिसाइल रखने की अनुमति हो और ईरान को नहीं।
शरीफ ने कहा कि कुछ देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हों और ईरान के पास न हों, यह दोहरा रवैया है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नाराजगी, वॉकआउट….और फिर सहमति, ईरान-अमेरिका के बीच पहले राउंड की बातचीत से क्या कुछ निकला?

