करीब 50 साल से भी ज्यादा समय हो गए, जब भारत ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत बाघों को बचाने की मुहिम शुरू की थी। आज आलम ये है कि भारत दुनिया के तीन चौथाई बाघों का घर है। भारत में आज 3682 बाघ हैं (ये साल 2022 का आंकड़ा है, फिलहाल 2026 का आंकड़ा सामने नहीं आया है) और इंटरनेशनल टाइगर डे के मौके पर ये सक्सेस स्टोरी पूरी दुनिया के लिए उदाहरण है। इसमें पिछले पांच दशक से अधिक समय तक चली एक संगठित संरक्षण नीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति, वन अधिकारियों की मेहनत और सबसे अहम स्थानीय समुदायों की भूमिका रही है। आज भारत में 50 से ज्यादा टाइगर रिजर्व हैं।
हालांकि इस सफलता ने अब नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। भारत के कई प्रमुख टाइगर रिजर्व अपनी पारिस्थितिक क्षमता की सीमा तक पहुंच चुके हैं। दूसरे और आसान शब्दों में समझें तो एक क्षेत्र में जितने बाघ रखे जाने चाहिए या रखे जा सकते हैं, उसकी सीमा पार होने लगी है। इससे क्या परेशानी खड़ी हो रही है, आने वाले समय में किस तरह की चुनौती होगी और क्या देश अपने बढ़ते बाघों के लिए पर्याप्त सुरक्षित जगह तैयार कर पाएगा? आइए इसे समझते हैं।
1973 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट टाइगर
शिकार, जंगलों की कटाई और आवास के नुकसान ने बाघों को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया था। ये 1960 और 70 के दशक की बात है। इसी संकट को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की। आंकड़े बताते हैं कि तब भारत में अनुमान के अनुसार 1827 बाघ बच गए थे। अनुमान इसलिए कि तब बाघों की ठोस और शत-प्रतिशत गिनती के लिए पर्याप्त तकनीक उपलब्ध नहीं था।
यही वजह है कि अलग-अलग दशक में बाघों की संख्या को लेकर बहुत उलझाने वाले आंकड़े मिलते हैं। साल 2006 से कैमरा और दूसरे उपकरणों से बाघों की सटीक गिनती शुरू हुआ और तब भारत में केवल 1411 बाघ गिने गए।
माना जाता है कि 1900 के आसपास भारत के जंगलों में करीब एक लाख के आसपास बाघ हुआ करते थे। मध्यकालीन और औपनिवेशिक भारत में बहुत से बाघ मारे गए। बाघों का शिकार करना एक ‘मजेदार और रोमांच खेल माना जाता था। यहां तक कि आजादी के बाद भी करीब दो दशक तक भारत दुनिया भर के शौकिया शिकारियों को आकर्षित करता रहा। साल 1972 में भारत सरकार ने बाघों के शिकार पर रोक लगाया, जिसके बाद हालात बदले।

बहरहाल, 1973 में शुरू हुए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास, शिकार प्रजातियों और पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित करना भी था। इसमें कामयाब भी मिली। 2006 में जहां भारत में 1411 बाघ गिने गए, वहीं 2010 में बढ़कर ये 1706 हो गया। साल 2014 में बाघों की संख्या 2226 हुई और फिर 2018 में ये बढ़कर 2967 और साल 2022 में 3682 पहुंच गया।
बाघों की संख्या बढ़ रही, पर नई चुनौती क्या है?
बाघों को जंगल चाहिए और इंसान जंगल काटने पर तुले हैं। यही सबसे बड़ी चुनौती है। बाघों की संख्या बढ़ रही है, यानी उन्हें ज्यादा जंगल चाहिए।
देश के कई बेहतरीन टाइगर रिजर्व अब अपनी इकोलॉजिकल क्षमता की सीमा तक पहुँच रहे हैं, जिससे बाघों को और शिकार के लिए नए इलाकों की तलाश में सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलना पड़ रहा है। ऐसे में उनके सफर में अक्सर हाईवे, रेलवे लाइन, खेत और गाँव आते हैं, जिससे संरक्षण की पूरी नीति के अगले चरण को लेकर अहम सवाल खड़े होते है। सवाल ये कि क्या भारत अपनी बढ़ती बाघ आबादी के लिए पर्याप्त जगह बना पाएगा?
साल 2022 के भारत में बाघों की संख्या बता रही है बाघ वाले इलाकों पर दबाव बढ़ रहा है। राजस्थान का रणथंभौर अपनी क्षमता की सीमा तक पहुँच चुका है, जहाँ प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में अनुमानित 9.6 बाघ हैं। नीलगिरि इलाके जिसमें नागरहोल और बांदीपुर से लेकर मुदुमलाई और बीआरटी हिल्स तक शामिल हैं, वहां के बारे में माना जा रहा है कि वह अपनी क्षमता की सीमा तक पहुँच चुका है या पहुँचने वाला है।
ऐसे ही मध्य प्रदेश का पन्ना, जहाँ स्थानीय स्तर पर खत्म हो चुकी बाघों की आबादी को बहुत मेहनत से फिर से बसाया गया था, वह भी अपनी क्षमता की सीमा के करीब पहुँच रहा है। सुंदरबन इलाके की भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो चली है।
बाघों को बड़े इलाकों की जरूरत क्यों होती है?
बाघों के लिए फैलते रहना उनकी प्रकृति में है। नए और युवा बाघ अपने जन्म वाले स्थान को छोड़कर अपना नया इलाका बसाते हैं। ऐसे में बाघ घूमते चले जाते हैं। वे अकेले ही यात्रा करते हैं और जिस भी भू-भाग से उनका सामना होता है, उसके अनुसार खुद को ढाल लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कई बाघ सैकड़ों किलोमीटर तक भटकते हैं।
यह कई बाद बेहद अप्रत्याशित भी हो सकता है। एक ही अभ्यारण्य से निकलने वाले बाघ (भाई-बहन आदि) पूरी तरह से अलग-अलग रास्ते चुन सकते हैं। साल 2019 में एक खबर आई थी जिसमें ये बात सामने आई कि भारत में ही एक बाघ ने मिलन के लिए साथी की तलाश में 1,300 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारत में किसी बाघ द्वारा तय की गई यह अब तक की सबसे लंबी दूरी है। इस बाघ का नाम T1-C1 रखा गया था। पाँच महीने तक के अपने सफर में यह बाघ जंगलों और आबादी वाले शहरी इलाकों से गुजरा और आखिर में एक नेचर रिजर्व में बसा।
इस बाघ पर सैटेलाइट रेडियो कॉलर लगा था, जिससे उसकी यात्रा का खुलासा हुआ। उसने 2019 के जून के आखिर में पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र के टिपेश्वर वन्यजीव अभ्यारण्य से अपना सफर शुरू किया। वहां पहले से एक वयस्क नर बाघ का दबदबा था, इसलिए T1-C1 खाने और साथी की तलाश में निकल पड़ा। दरअसल, नर बाघ अपना इलाका तय करने की कुदरती प्रक्रिया के तहत एक ऐसी जगह की तलाश में निकलते हैं जहाँ वे अपना दबदबा बना सकें। ऐसे में वे अपनी मूल जगह से दूर चले जाते हैं, जहाँ पहले से ही बहुत सारे बाघ होते हैं।
यह बाघ कई बार तेलंगाना और महाराष्ट्र के बीच आता-जाता रहा और रास्ते में मवेशियों और जंगली जानवरों का शिकार करता रहा। इसके बाद वह महाराष्ट्र की ज्ञानगंगा अभ्यारण्य पहुँचा, जो उसके सफर की शुरुआत वाली जगह से लगभग 300 किलोमीटर दूर है। इस तरह की अप्रत्याशित घटनाओं में सबसे ज्यादा खतरा इंसानों और बाघों का संघर्ष का होता है।

बाघ अपने इलाके को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं, यानी हर बाघ का अपना अलग इलाका होता है। आम तौर पर एक नर बाघ को लगभग 60 से 150 वर्ग किलोमीटर के बड़े इलाके की जरूरत होती है, जबकि मादा बाघ आमतौर पर 20 से 60 वर्ग किलोमीटर के छोटे इलाके में रहती है। ये इलाके उसके लिए शिकार करने, प्रजनन करने और बच्चों को पालने के लिए जगह देते हैं, और बाघ दूसरे बाघों से अपने इन इलाकों की जोरदार तरीके से रक्षा भी करते हैं।
चुनौती तो है…पर निदान क्या है?
भारत ने बाघों के संरक्षण में बड़ी सफलता हासिल की है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि जानकार मानते हैं कि अगले दशक की कामयाबी को सिर्फ इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि भारत में बाघों की संख्या कितनी बढ़ती है। असली कसौटी यह है कि क्या नए और युवा बाघ बिना किसी शहरी इलाके, खेत-खलिहान, गांव या इंसानी बस्तियों से गुजरे शिकार से भरपूर किसी दूसरे जंगल तक पहुँच पाते हैं या नहीं।
दूसरे शब्दों में कहें तो बाघों के इलाकों को बचाना अब प्रजाति को बचाने से कहीं ज्यादा अहम है। इसमें ‘वाइल्डलाइफ कॉरिडोर’ की भूमिका अहम हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां संभव हो बड़ी परियोजनाओं को संवेदनशील वन क्षेत्रों से दूर रखा जाए। यदि ऐसा संभव न हो तो वैज्ञानिक तरीके से अंडरपास और ओवरपास बनाए जाएं ताकि वन्यजीव सुरक्षित आवाजाही कर सकें।
भारत आज के दौर में तेजी से सड़कें, रेलवे, खनन परियोजनाएं और औद्योगिक कॉरिडोर विकसित कर रहा है। लेकिन यही विकास कई बार जंगलों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देता है। इससे जहां तक संभव हो, बचने की जरूरत है।
इसके अलावा जिन जंगलों में अभी बाघ कम हैं, वहां उनकी प्रजातियों की संख्या बढ़ानी होगी। अवैध शिकार रोकना होगा और जंगलों के बीच संपर्क बहाल करना होगा। जानकार मानते हैं कि मध्य भारत, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना के कई वन क्षेत्र ऐसे हैं जहां उपयुक्त संरक्षण मिलने पर भविष्य में बड़ी संख्या में बाघ बस सकते हैं।
वैसे भी इस पूरी कहानी को सिर्फ बाघों को बचाने की कहानी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। बाघ दरअसल पूरे जंगल के स्वास्थ्य का भी संकेतक हैं। जहां बाघ सुरक्षित रहते हैं, वहां जंगल भी स्वस्थ रहते हैं। यही जंगल नदियों को पानी देते हैं, मिट्टी का कटाव रोकते हैं, बाढ़ का जोखिम कम करते हैं, कार्बन को अवशोषित करते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। इसलिए बाघों का बचना मतलब जंगलों का बचना भी है।
पिछले पांच दशकों में भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह बाघों को विलुप्त होने की कगार से वापस ला सकता है। अब अगली चुनौती यह पक्का करना होगा कि उन बाघों के पास आने-जाने के लिए पर्याप्त सुरक्षित जगहें मौजूद हो।
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